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Saturday, January 3, 2026

इमामे मुबीन हज़रत अली (अ) इब्ने अबी तालिब

 13 रजब को इमामे मुबीन हज़रत अली (अ) इब्ने अबी तालिब की विलादत खानए काबा के अन्दर हुई थी.

इमाम हज़रत अली (अ) पैगम्बर मुहम्मद (स) के जानशीन थे जिनके बारे में रसूल ने फ़रमाया “जिसका मैं मौला हूँ उसके अली मौला हैं।“ और ये भी फ़रमाया 'मैं शहर ए इल्म हूँ और अली उसका दरवाज़ा हूँ।
माना जाता है की जीवों में कोशिका (cell) की खोज 17 वीं शताब्दी में लीवेन हुक ने की. लेकिन नहजुल बलागा का निम्न कथन ज़ाहिर करता है कि अली(अ.) कोशिका के बारे में चौदह सौ साल पहले बता चुके थे. ‘‘जिस्म के हर हिस्से में बहुत से अंग होते हैं. जिनकी रचना उपयुक्त और उपयोगी है. सभी को

ज़रूरतें पूरी करने वाले शरीर दिए गए हैं. सभी को काम सौंपे गए हैं और उनको एक छोटी सी उम्र दी गई है. ये अंग पैदा होते हैं और अपनी उम्र पूरी करने के बाद मर जाते हैं. (खुत्बा-81)’’ स्पष्ट है कि ‘अंग’ से अली का मतलब कोशिका ही था.
खुत्बा 81 में ही इमाम अली (अ) ने इंसानी जिस्म के इम्यून सिस्टम (immune system) के बारे में बताया इन अलफ़ाज़ के साथ ‘और सलामती के हिसारों के....’। यहां पर इमाम फरमा रहे हैं कि हमारे जिस्म की सलामती के लिये परवरदिगार ने कुछ हिसार यानि घेरे (protection covers) भी अता किये हैं। दरअसल न सिर्फ इंसानी जिस्म बल्कि दूसरे जानदारों के जिस्म में भी कुछ ऐसे सिस्टम मौजूद होते हैं जो बाहरी हमलों यानि बीमारियों के जरासीमों (बैक्टीरिया, वायरस वगैरा) से जिस्म की हिफाज़त करते हैं। ये जिस्म के लिये खतरनाक जरासीमों की पहचान करते हैं और उनके जिस्म पर असर करने से पहले ही उन्हें खत्म कर देते हैं। हमारे जिस्म पर न जाने कितनी बीमारियों के वायरस या बैक्टीरिया व दूसरे माइक्रोआर्गेनिज़्म हमला करते रहते हैं लेकिन जिस्म का हिफाज़ती सिस्टम उन्हें असरअंदाज़ नहीं होने देता।
दुनिया की नज़र में इम्म्यून सिस्टम की खोज अट्ठारहवीं सदी के आखिर में लुइस पाश्चर ने की.
हज़रत अली सितारों द्वारा भविष्य जानने के खिलाफ थे, लेकिन खगोलशास्त्र सीखने के हामी थे, उनके शब्दों में ‘‘ज्योतिष सीखने से परहेज़ करो, हाँ इतना ज़रूर सीखो कि ज़मीन और समुद्र में रास्ते मालूम कर सको.’’ (77वाँ खुत्बा - नहजुल बलागा)
कुरआन को पैगम्बर मोहम्मद(स.) के बाद सबसे बेहतर समझाने वाले इमाम हज़रत अली(अ.) थे। कुरआन और इस्लाम पर आज भी हर तरफ बहस चल रही है। इमाम हज़रत अली(अ.स.) के सामने अक्सर लोगों ने कुरआन से मुताल्लिक़ एतराज़ात पेश किये और इमाम हज़रत अली(अ.स.) ने उनका जवाब दिया।
एक बार किसी ने सवाल उठाया, ‘(सूरे क़यामत आयत 22-23) उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ और दूसरी जगह वह कहता है, ‘(सूरे इनाम आयत 104) उस को आँखें नहीं देख सकती हैं और वह (लोगों की) निगाहों को देखता है। वह लतीफ खबीर है। तो ये दो बातें विरोधी हैं।
जवाब में हजरत इमाम अली (अ.स.) ने फरमाया कि जिस जगह पर औलिया अल्लाह (अल्लाह के करीबी बन्दे) हिसाब से फारिग होने के बाद अपनी जगह से अपने परवरदिगार की तरफ से देखेंगे कि वह उनको किस तरह का बदला यानि फल देता है और उनमें से कुछ लोग जन्नत में दाखिल हो जायेंगे। इसी बिना पर अल्लाह का कौल है, ‘उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ यहाँ अल्लाह की तरफ देखने से मतलब ये है कि वह उस के सवाब को देखेंगे।
मगर उस के कौल ‘उस को आँखें नहीं देख सकती हैं’ का मतलब ये है कि इंसानी अक्ल व आँखें उस तक नहीं पहुंच सकतीं। और ‘वह (लोगों की) निगाहों को देखता है।’ का मतलब कि वह उन तक पहुंच सकता है और वह लतीफ खबीर है। और यह एक तारीफ है जिस के जरिये हमारे रब ने अपनी ज़ात की तारीफ फरमाई है। और इन्तिहाई बलन्दी के साथ पाक व पाकीजा हुआ। कोई भी मखलूक अपने इल्म यानि ज्ञान के जरिये अल्लाह की हस्ती तक नहीं पहुंच सकती। क्योंकि उस अल्लाह की बुलन्द ज़ात ने लोगों के दिलों पर परदा डाल दिया है। न कोई अक्ल व दिमाग उस की कैफियत से वाकिफ हो सकता है और न कोई दिल उसकी हदों या सीमाओं से वाकिफ हो सकता है। फिर न कोई उसका गुण बयान कर सकता है जिस तरह कि उस ने अपने गुणों को बयान किया है। उस जैसी कोई शय नहीं है। वह समीअ-बसीर है वही अव्वल व आखिर है। वही जाहिर व बातिन है। वह ख़ालिक़ है। उस ने चीजों को खल्क किया। चीज़ों में से कोई चीज उस की तरह नहीं है। उस की ज़ात बाबरकत और बुलन्द व बाला है।
उस ज़माने के जाहिलों ने कभी इल्म के इस दरिया को चैन की सांस नहीं लेने दी और आखिर में उस वक़्त ज़हर बुझी तलवार से शहीद कर दिया जब वो मस्जिद में सुबह की नमाज़ अदा कर रहे थे।

Sunday, March 31, 2024

क्यों कहा जाता है अज़ान में चार मरतबा ‘अल्लाहो अकबर’ ?

इमाम हज़रत अली (अ.) ने ही पहली बार इस्लामिक थिओलोजी को तर्क के साथ पेश किया और तौहीद का सही कांसेप्ट दुनिया के सामने पेश किया।   

इमाम हज़रत अली (अ.) ने अज़ान में चार मरतबा कहे जाने वाले ‘अल्लाहो अकबर’ की तफसीर इस तरह बयान की है - अज़ान में पहली बार ‘अल्लाहो अकबर’ कहना अल्लाह की क़दामत, अज़लियत, अब्दियत, इल्म, क़ूव्वत, हिक्म व करम, जूद व अता व किबरियाई पर दलालत करता है। अल्लाह वह है कि जिसके लिये खल्क़ व अम्र है। और उसकी मशीयत से खल्क़ है और उसी की वजह से हर शय मख्लूक़ के लिये है, उसी की तरफ मख्लूक़ रुजूअ होती है। वह हर शय से पहले अव्वल है और हर शय के बाद आखिर है। लाईज़ाल है। वह हर शय पर ज़ाहिर है। मगर उसका अदराक नहीं किया जा सकता। और हर चीज़ के बगैर वह बातिन है कि जिसको महदूद नहीं किया जा सकता। पस वह बाक़ी है और उसके सिवा तमाम अशिया फानी है। और दूसरी मरतबा ‘अल्लाहो अकबर’ कहने के माअनी ये हैं कि वह अलीम व खबीर है। उसको तमाम अशिया का इल्म है। ख्वाह वह पैदा हुईं और क़िब्ल इसके वह पैदा हों। और तीसरे माअनी ‘अल्लाहो अकबर’ के ये हैं कि अल्लाह हर शय पर क़ादिर है और जो चाहता है उसपर कुदरत रखता है और अपनी क़ुदरत में क़वी है और अपनी मख्लूक़ पर मुक़्तदिर है। उसकी क़ुदरत तमाम अशिया पर क़ायम है। जब वह किसी अम्र का फैसला करता है तो कहता है कि हो जा पस वह हो जाता है। और चौथा ‘अल्लाहो अकबर’ उसके हलम व करम के मायने में है। वह हलम के साथ पेश आता है गोया उसको इल्म नहीं हुआ। वह दरगुज़र करता है गोया देख नहीं रहा और वह ऐब पोशी  करता है गोया उसकी नाफरमानी नहीं की गयी। वह करम, हलम, और दरगुज़री की बिना पर सज़ा में जल्दी नहीं करता है। वह जव्वाद है। बेइंतिहा इनाम देने वाला और अफआल में करम करने वाला है।

(सन्दर्भ : किताब अल तौहीद, शेख सदूक़ अ र )

Thursday, July 6, 2023

इमाम हज़रत अली (अ) के खुत्बा अल बयान के कुछ अंश

 इमाम हज़रत अली (अ) खुत्बा अल बयान में अपनी फ़ज़ीलत इस तरह बयान करते हैं 

* मैं वह हूँ जिसके बारे में रसूल (स) ने फ़रमाया मैं इल्म का शहर हूँ और अली (अ) उसका दरवाज़ा हैं। 
* मैं हर चीज़ की हक़ीक़त से खबरदार और आगाह हूँ। 
* मैं वह हूँ कि ख़िलक़त के आदाद व गिनती को शुमार करता और मालूम करता हूँ अगर चे वह बहुत हैं यहाँ तक कि अल्लाह तआला की तरफ उनको पहुंचाऊं। 
* मैं हूँ अली इब्ने अभी तालिब जिसकी आवाज़ जंगों में बिजली की आवाज़ों की तरह है। 
* मैं ज़मीन में खुदा का वली हूँ और अम्र खुदा मेरे सुपुर्द किया गया है 
*  मैं वह नूर हूँ कि जिस से मूसा (अ) ने रौशनी तलब की तो हिदायत पाई  
* मैं वह हूँ की मैंने सातों आसमानों को बुलाया। उन्होंने मेरे हुक्म को क़ुबूल किया।  मैंने उनको हुक्म दिया और वह क़ायम हो गये। 
* मैं वह हूँ कि जिसके लिये आफ़ताब को दो बार पलटाया गया। 
* मैं हूँ चीज़ों का ज़ाहिर करने वाला और मौजूदात का पैदा करने वाला जिस तरह चाहूँ। 
* मैं हूँ वह की पहली उम्मतों में से हज़ार उम्मत ने मेरी विलायत का इंकार किया पस अल्लाह तआला ने उनको मस्ख कर दिया। 
* मैं वह हूँ कि सब्ज़ी मलकूत में खड़ा हूँ जहाँ रूहें हरकत करती हैं।  वहां मेरे सिवा कोई हरकत करने वाला नहीं।  
* मैं हूँ वह जो जो दुनिया की हर लुग़त व ज़बान में कलाम करता है।

Sunday, February 5, 2023

अल्लाह के वजूद के निशानात

इमाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के खुत्बा 49 में फरमाते हैं ‘वह (अल्लाह) ज़ात ऐसी है कि जिसके वजूद के निशानात इस तरह उसकी शहादत देते हैं कि इंकार करने वाले का दिल भी इक़रार किये बगैर नहीं रह सकता।’

कायनात के बनने में लोग तरह तरह की थ्योरीज़ पेश करते हैं। जो अल्लाह को मानते हैं उनकी बात अगर छोड़ दी जाये तो इवोल्यूशन थ्योरी, बिग बैंग, स्टेडी स्टेट थ्योरी, ग्रेंड डिज़ाईन जैसी बहुत सी थ्योरीज़ साइंस पेश करती है। कुछ का मानना है कि यूनिवर्स खुद ही अपने को बनाता बिगाड़ता रहता है, तो कुछ मानते हैं कि फिज़िकल लॉज़ (Physical Laws) यूनिवर्स को बनाने में अहम किरदार निभाते हैं। अल्लाह के वजूद से इंकार करने वाले भी कहीं न कहीं किसी ताकत या Reason को इस कायनात के बनाने में शामिल मानते हैं।
इमाम जाफर सादिक(अ.) ने फरमाया कि खुदा वन्दे तआला का इंकार जहालत की पहचान है और आलिम ज़रूर खुदा पर ईमान रखता है। अगर चै वह खालिक के लिये खुदा के अलावा और किसी नाम को चुन लेता है।
आज के दौर में भी जो लोग खुदा के वजूद से इंकार करते हैं, उनमें से कोई इवोल्यूशन (Evolution) को खुदा मानता है। कुछ लोग ग्रेविटॉन (Graviton) को ग्रैविटेशनल फोर्स पैदा करने वाला ज़र्रा मानते हैं। इन लोगों के मुताबिक दुनिया का ख़ुदा जो इस कायनात का पैदा करने वाला और इस कायनात का मुहाफिज़ है वह ग्रैविटॉन है, क्योंकि कायनात में ग्रैविटॉन से ज़्यादा ताकतवर और तेज़ रफ्तार कोई चीज़ नहीं। ग्रैविटॉन 1 सेकंड में कायनात के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुंचता है फिर वापस आ जाता है, जिसका फासला वैज्ञानिकों के मुताबिक तीन हज़ार मिलियन लाइट इयर था। मौजूदा डिस्कवरीज़ इस फासले को और ज्यादा बताती हैं। इस वक्त के हिसाब के मुताबिक़ सबसे ज़्यादा फासले की चीज़  जो हम रोशनी की किरण के ज़रिये देख सकते हैं हमारी आँखों से इतने मीटर दूर है कि चार के आगे 26 ज़ीरो जोड़ दिये जायें। इस अधिकतम फासले के गोले को नाम दिया गया है हब्बल वोल्यूम।
मौजूदा दौर में साइंसदां एक नये पार्टिकिल की दरियाफ्त की संभावनाएं बताते हैं जिसका नाम उन्होंने हिग्स बोसोन रखा है। क्वांटम फिजिक्स के माहिर दुनिया के तमाम पार्टिकिल्स को हिग्स बोसोन से बना हुआ मानते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि कोई भी पदार्थ एटम्स से मिलकर बना होता है। और इन एटम्स का ज्यादातर द्रव्यमान उनके मरकज़ में मौजूद प्रोटॉनों व न्यूट्रानों की वजह से होता है। ये ज़र्रे मैटर के फंडामेन्टल पार्टिकिल्स कहलाते हैं। इनमें से हर पार्टिकिल यानि प्रोटॉन या न्यूट्रान तीन सब पार्टिकिल्स से मिलकर बना होता है। जिन्हें क्वार्क (Quark) कहते हैं। इन क्वार्कों का द्रव्यमान भी नापा जा चुका है।
मज़े की बात ये है कि जब तीनों क्वार्कों का कुल द्रव्यमान लिया जाता है तो वह उस फंडामेन्टल पार्टिकिल से बहुत ही कम यानि उसका एक फीसद आता है जिस पार्टिकिल को वे क्वार्क मिलकर बनाते हैं। यानि ज़र्रे का निन्यानवे फीसद द्रव्यमान किसी और वजह से पैदा होता है।
अब क्वांटम नज़रिया ये बताता है कि यह द्रव्यमान एक ताकत के ज़रिये पैदा होता है जो क्वार्कों को आपस में जोड़ती है। यह ताकत है उच्च नाभिकीय बल (Strong Nuclear Force). यह ताकत पैदा होती है मायावी (Virtual) ज़र्रात के एक मैदान के ज़रिये जिन्हें ग्लूऑन नाम दिया गया है। ये ज़र्रे मैदान में कहीं भी लम्हे भर के लिए ज़ाहिर होते हैं, और फिर फौरन ही गायब हो जाते हैं। इसी को कहते हैं क्वांटम थरथराहट (Quantum Fluctuation)। इस थरथराहट से पैदा हुई एनर्जी प्रोटॉन और न्यूट्रान के द्रव्यमान में जुड़ जाती है। चूंकि ग्लूआन का द्रव्यमान जीरो होता है, यानि ये मैटर के जर्रे नहीं होते। इनमें सिर्फ एनर्जी होती है। यही एनर्जी ये फंडामेन्टल पार्टिकिल के द्रव्यमान में जोड़कर खुद गायब हो जाते हैं। एक ग्लूआन कितना द्रव्यमान जोड़ता है, यह मालूम होता है आइंस्टीन के द्रव्यमान ऊर्जा समीकरण से (E=mc2)। जहां E ग्लूआन के ज़रिये पैदा हुई एनर्जी है और m फंडामेन्टल पार्टिकिल के द्रव्यमान में बढ़ोत्तरी है।
अब एक सवाल और पैदा होता है। जिस तरंह प्रोटान और न्यूट्रान के द्रव्यमान में मैटर पार्टिकिल क्वार्क और मायावी कण ग्लूआन शामिल है, क्या इसी तरंह क्वार्क भी मायावी कणों से मिलकर बने हैं? जिनका द्रव्यमान ज़ीरो हो और वे सिर्फ एनर्जी देकर गायब हो जाते हैं? साइंसदानों ने इसका जवाब सकारात्मक दिया है। और इन मायावी कणों को नाम दिया गया है हिग्स बोसॉन (Higgs Boson)।
इस तरह हम देखते हैं कि खुदा से अलग हटकर सोचने वाले तरह तरह की थ्योरीज़ पर विचार कर रहे हैं और किसी न किसी तरीके से ऐसी ताकत को कुबूल करते हैं जो इस पूरी कायनात को बनाने के लिये जिम्मेदार है कभी वो उसे पार्टिकिल की शक्ल में मानते हैं तो कभी फिजिकल लॉज़ की शक्ल में। यही बात इमाम अली अलैहिस्सलाम के बयान से ज़ाहिर हो रही है।
इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुल बलाग़ाह का साइंसी इल्म 
ई बुक के तौर पर यह किताब इस लिंक से हासिल की जा सकती है :

Tuesday, February 15, 2022

इमाम अली और मिस्र के पिरामिड्स की उम्र

इमाम हज़रत अली अलैहिस्सलाम के इल्म व हिकमत के बारे में पैग़म्बर मुहम्मद(स.) फरमाते हैं कि मैं शहरे इल्म हूं और अली उसका दरवाज़ा हैं। और खुद इमाम अली(अ.) फरमाते हैं कि मैं ज़मीन से ज़्यादा आसमान के रास्तों को जानता हूं। इस इल्म की एक मिसाल मेजर इफ्तिखार हैदर ज़ैदी कि किताब ‘वजूद ए कायनात मौला अली और ग़दीरे खुम (पेज 237) में मिलती है। जब इमाम अली ने मिस्र के पिरामिड्स की उम्र का मसला एस्ट्रोनोमी की मदद से हल किया। किताब के मुताबिक साहबे ग़यासुल्लुग़ात अहराम मिस्र की बहस में तहरीर फरमाते हैं कि हज़रत इमाम अली (अ.) से जब किसी ने मिस्र के अहरामों (Pyramids) की उम्र के बारे में सवाल किया तो आपने पूछा - उसपर कोई क़ुत्बा या तस्वीर है? तो पूछने वाले ने कहा - जी हाँ एक गिद्ध की तस्वीर है जो अपने पंजों में केकड़ा दबाये हुए है। ये सुनकर इमाम(अ.) ने फरमाया, मामला साफ है, मिस्र के पिरामिडों की बुनियाद उस वक्त रखी गयी जब ‘सितारा नुस्र’ बुर्ज सरतान में था। ‘नुस्र’ दो हज़ार साल में एक बुर्ज से दूसरे बुर्ज में जाता है और आजकल (यानि इमाम अली(अ.) के ज़माने में) बुर्ज जदी में है। और इस तरह उन इमारतों की बुनियाद बारह हज़ार साल पहले रखी गयी।

मौजूदा दौर तहक़ीक़ात के मुताबिक अहराम मिस्र की उम्र 3000-4000 के लगभग बतायी जाती थी, लेकिन अब कुछ नयी तहक़ीकात में इस थ्योरी को रिजेक्ट करते हुए गेरी कैनन और मैलकम हटन जैसे हिस्टोरियन पिरामिड्स की उम्र 12500 साल के लगभग बताते हैं। यानि आइस एज से भी पहले।

Sunday, May 2, 2021

इमाम हज़रत अली (अ.) - नायाब मोती 2

 इमाम हज़रत अली (अ.) का अपने गवर्नर के नाम सन्देश : लोगों से अख़लाक़ के साथ मिलना, उनसे नरमी का बर्ताव करना, बड़े दिल के साथ पेश आना, और सबको एक नज़र से देखना कि बड़े लोग तुमसे अपनी नाहक़ तरफ़दारी की उम्मीद न रखें और छोटे लोग तुमसे अद्ल व इन्साफ में उनके मुक़ाबले में नाउम्मीद न हो जायें  

... अल्लाह के बन्दों मौत और उसकी आमद से डरो. उसके लिये सरोसामान फ़राहम करो. वह आयेगी और एक बड़े हादसे और सानिहे के साथ आएगी जिसमें या तो भलाई ही भलाई होगी कि जिसमें बुराई का कभी गुज़र न होगा या ऐसी बुराई होगी कि जिसमें कभी भलाई का शायबा न होगा
(नहजुल बलाग़ा - खत 27)

Saturday, May 1, 2021

इमाम हज़रत अली (अ.) - नायाब मोती 1

 कभी कभी बीमारी दवा और दवा बीमारी बन जाया करती है - इमाम हज़रत अली (अ.)

दुनिया में बस इतना ही अपना समझो जिससे अपनी आख़िरत की मंज़िल संवार सको।  अगर तुम हर उस चीज़ पर जो तुम्हारे हाथ से जाती रहे वावैला मचाते हो तो फिर हर उस चीज़ पर रंज व अफ़सोस करो कि जो तुम्हें नहीं मिली - इमाम हज़रत अली (अ.)

(नहजुल बलाग़ा - खत 31 वसीयतनामा) 

Sunday, April 25, 2021

आक्सीजन के बारे में इमाम हज़रत अली(अ.) का बयान

 आक्सीजन के बारे में इमाम हज़रत अली(अ.) का बयान जो नहजुल बलाग़ा के खुत्बा - 131 मे इस तरह मौजूद है, ‘और तरोताज़ा शादाब दरख्त सुबह व शाम उसके आगे सर बसुजूद हैं और अपनी शाखों से चमकती हुई आग भड़काते हैं...’

इस जुमले पर गौर करने पर दो चीज़ें नज़र आती हैं। पहली ये कि इसमें शादाब दरख्तों के सुबह व शाम सजदे में होने का ज़िक्र है। और दूसरी ये कि इसमें उन दरख्तों की शाखों का चमकती हुई आग भड़काने का ज़िक्र है। यानि तरोताज़ा शादाब दरख्तों में कोई ऐसा अमल हो रहा है जो सुबह व शाम के वक्त कुछ अलग होता है और दिन के बाक़ी अवक़ात में अलग। और इस अमल से तरोताज़ा शादाब दरख्तों की शाखों से कोई ऐसी चीज़ बनती है जो चमकती हुई आग को भड़काती है।
अगर यहाँ इमाम(अ.) शादाब दरख्तों की बजाय सूखे दरख्तों की बात करते तो ये जुमला एक मामूली जुमला होता। क्योंकि सूखे दरख्तों से आग भड़कने की बात हर एक की समझ में आती है। लेकिन जब शादाब दरख्तों से चमकीली आग के भड़कने का ज़िक्र हो तो इस जुमले का राज़ बहुत गहरा हो जाता है। और कम से कम इमाम अली(अ.) के ज़माने की साइंस उस राज़ तक नहीं पहुंच पायी थी।
और वह राज़ है हरे पौधों में फोटोसिंथेसिस का और उसके ज़रिये आक्सीजन के बनने का। इमाम(अ.) के इस जुमले में फोटोसिंथेसिस के ज़रिये आक्सीजन के ही बनने का ज़िक्र हो रहा है।
लेकिन ये दोनों ही अमल उस वक्त रुके होते हैं या उनकी रफ्तार न के बराबर हो जाती है जब इंसान अल्लाह की इबादत में और खासतौर से सज्दे में सर रखे होता है। उस वक्त न तो वह अपनी ज़रूरत की चीज़ें हासिल करता है, न ही दूसरों की ज़रूरत की चीज़ें तैयार करता है। उसका ज़हन व जिस्म उस वक्त सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की इबादत में मशगूल होता है।
तरोताज़ा शादाब दरख्त भी दो तरह के अमल करते हैं। पहला तो ये कि ज़मीन से पानी व नाईट्रेट और हवा से कार्बन डाई आक्साइड लेते हैं। साथ में साँस लेने के लिये आक्सीजन लेते हैं। जबकि दूसरे अमल में सूरज की रोशनी में फोटोसिंथेसिस करते हुए आक्सीजन बनाकर हवा में छोड़ते हैं। जो कि हर तरह के जानदारों के सांस लेने में काम आती है। इसी फोटोसिंथेसिस के ज़रिये वह तमाम जानदारों के लिये फल व अनाज वगैरा की शक्ल में खाने की अशिया भी बनाते हैं। चूंकि दिन के वक्त सूरज की रोशनी ज़्यादा होती है लिहाज़ा फोटोसिंथेसिस का अमल भी तेज़ होता है। यानि दरख्त फिज़ा में आक्सीजन ज़्यादा छोड़ते हैं और इसकी बनिस्बत साँस लेने में कम आक्सीजन लेते हैं। जबकि रात में इसका उलटा होता है, क्योंकि सूरज की रोशनी की गैरमौजूदगी में फोटोसिंथेसिस का अमल रुक जाता है जबकि पौधों का साँस लेना जारी रहता है।
लेकिन पूरे रात दिन में दो वक्त ऐसे होते हैं जब पौधे जितनी आक्सीजन साँस के ज़रिये लेते हैं उतनी ही फोटोसिंथेसिस के ज़रिये छोड़ते हैं। ये दो वक्त हैं सुबह तड़के फजिर का वक्त और शाम को मग़रिब का वक्त। हम कह सकते हैं कि इन दोनों अवक़ात में न तो नबातात फिज़ा को कुछ देते हैं, न लेते हैं। साइंसदानों ने इसे नाम दिया है Compensation Point यह ठीक वही सिचुएशन है जैसे इंसानों में सज्दे व इबादत के वक्त होती है।
इस तरह इमाम अली(अ.) तरोताज़ा शादाब दरख्तों के सज्दे के ज़रिये न सिर्फ Respiration और Photosynthesis की तरफ इशारा कर रहे हैं बल्कि दिन के अलग अलग अवक़ात में इसके बदलने की भी बात कर रहे हैं।
इमाम(अ.) के बयान के दूसरे हिस्से से पूरी तरह साफ हो जाता है कि इमाम अली(अ.) न सिर्फ फोटोसिंथेसिस की बात कर रहे हैं बल्कि उस अमल में आक्सीजन मिलती है, इस राज़ को भी ज़ाहिर कर रहे हैं। जैसा कि इमाम(अ.) फरमा रहे हैं कि , ‘तरोताज़ा शादाब दरख्त .... अपनी शाखों से चमकती हुई आग भड़काते हैं ’ यानि हरे व शादाब दरख्तों की शाखों में जो अमल होता है उसके नतीजे में कोई ऐसी चीज़ मिलती है जो चमकती हुई आग को भड़का देती है।
साइंस ने दरियाफ्त किया है कि आग को भड़काने में फिज़ा में मौजूद एक ही गैस का रोल होता है, और वह गैस है आक्सीजन। और यही गैस फोटोसिंथेसिस के अमल के दौरान हरे पौधों की शाखों पर मौजूद पत्तियों से बनकर निकलती है। साइंसी तारीख के मुताबिक आक्सीजन की दरियाफ्त सन 1772 में शीले नाम के साइंसदाँ ने की। इससे पहले कोई इस गैस के बारे में नहीं जानता था। लैवोज़िये ने इसी ज़माने में दरियाफ्त किया कि आक्सीजन जलने में मदद करती है। बिना आक्सीजन के किसी भी चीज़ का जलना नामुमकिन है। फोटोसिंथेसिस की दरियाफ्त वाॅन हेल्मोन्ट ने सत्रहवीं सदी में की। लेकिन उसे यह पता नहीं चला था कि इस प्रोसेस में आक्सीजन पैदा होती है। इसे मालूम किया जोसेफ प्रीस्टले ने अट्ठारहवीं सदी में। जब आक्सीजन की दरियाफ्त उसी वक्त में हुई थी।
प्रीस्टले ने बताया कि पौधे सूरज की रोशनी में आक्सीजन पैदा करते हैं। लेकिन आक्सीजन पैदा करने की प्रोसेस यानि फोटोसिंथेसिस दरख्तों की पत्तियों में होती है, जो कि दरख्तों की शाखों पर होती हैं यह बीसवीं सदी में पहले दुनिया नहीं जानती थी। बीसवीं सदी में वान नील नाम के साइंसदाँ ने इस बारे में बताया।
लेकिन इन सब साइंसदानों से बहुत पहले इमाम अली(अ.) पाँचवीं-छठी सदी में साफ साफ बता रहे हैं कि शादाब दरख्तों की शाखों में (फोटोसिंथेसिस का) अमल होता है जिसमें चमकती हुई आग को भड़काने वाली शय (आक्सीजन) पैदा होती है। यहाँ पर इमाम(अ.) आक्सीजन की खासियत को भी साफ साफ बयान कर रहे हैं। आक्सीजन आग को भड़काती है यानि जलने में मदद देती है, लेकिन खुद आग को पैदा नहीं करती। यानि किसी और तरीके से पैदा हुई आग को आगे जलते रहने के लिये आक्सीजन काम आती है, लेकिन हम अगर चाहें कि सिर्फ आक्सीजन की मदद से आग को पैदा भी कर दें तो यह मुमकिन नहीं। अगर ऐसा मुमकिन होता तो पूरी दुनिया में हर तरफ आग ही आग नज़र आती क्योंकि फिज़ा में बीस फीसदी आक्सीजन ही होती है।

इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुल बलाग़ाह का साइंसी इल्म
लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी
प्रकाशक : अब्बास बुक एजेंसी, लखनऊ 
ई बुक के तौर पर यह किताब इस लिंक से हासिल की जा सकती है :

Saturday, July 11, 2020

इम्यून सिस्टम के बारे में बताया इमाम हज़रत अली (अ.) ने

कोरोना महामारी के इस वक्त में जो चीज़ सबसे ज़्यादा सुनने को मिलती है वो है जिस्म का इम्यून सिस्टम। इस वक्त यही एक चीज़ है जो इस बीमारी को मात दे रही है। ये इम्यून सिस्टम क्या है? दरअसल न सिर्फ इंसानी जिस्म बल्कि दूसरे जानदारों के जिस्म में भी कुछ ऐसे सिस्टम मौजूद होते हैं जो बाहरी हमलों यानि बीमारियों के जरासीमों (बैक्टीरिया, वायरस वगैरा) से जिस्म की हिफाज़त करते हैं। ये जिस्म के लिये खतरनाक जरासीमों की पहचान करते हैं और उनके जिस्म पर असर करने से पहले ही उन्हें खत्म कर देते हैं। हमारे ऊपर न जाने कितनी बीमारियों के वायरस या बैक्टीरिया व दूसरे माइक्रोआर्गेनिज़्म हमला करते रहते हैं लेकिन जिस्म का हिफाज़ती सिस्टम उन्हें असरअंदाज़ नहीं होने देता। 

इम्यून सिस्टम की खोज अट्ठारहवीं सदी की मानी जाती है। उस ज़माने में पियरे लुइस नाम के साइंटिस्ट ने देखा कि कुछ कुत्तों और चूहों पर ज़हरीले साँपों के काटने का कोई असर नहीं होता। उसने अंदाज़ा लगाया कि इनके जिस्म के अन्दर कोई ऐसा सिस्टम है जो इस ज़हर का तोड़ है। 

बाद में लुइस पाश्चर ने बताया कि बदन में बीमारियों के लिये निहायत महीन कीड़े, जर्म या जरासीम ज़िम्मेदार होते हैं। उसने बताया कि इस तरह के जरासीम साँस लेने में या खाते पीते वक्त हवा, पानी या खाने के ज़रिये हमारे जिस्म में पहुंच जाते हैं और बीमारियों को फैलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन जिस्म में एक मज़बूत हिफाज़ती सिस्टम (Immunological System) पाया जाता है जो इन जरासीमों के खिलाफ लड़ता रहता है। अगर कभी ये सिस्टम कमज़ोर पड़ जाता है या किसी नये जरासीम की पहचान नहीं कर पाता तो वहीं से इंसान बीमारी में घिर जाता है। लुइस पाश्चर ने जिस्म के इम्म्यून सिस्टम का गहराई के साथ अध्ययन किया और ये पाया कि जब कोई बैक्टीरिया या वायरस वगैरा पहली बार जिस्म में दाखिल होता है तो यह सिस्टम उसकी पहचान अपनी मेमोरी में स्टोर कर लेता है और उसके खिलाफ एण्टीबाडीज़ डेवलप कर लेता है। जिससे कि दोबारा वो बैक्टीरिया या वायरस कभी दाखिल हो जाये तो इम्म्यून सिस्टम तुरंत उसे पहचान कर उसे खत्म कर दे। इसी फैक्ट का इस्तेमाल करके वैक्सीन बनायी जाती है। वैक्सीन दरअसल जिंदा या मुर्दा बैक्टीरिया या वायरस की कोई कमज़ोर हालत होती है। जिसे जिस्म में दाखिल कराया जाता है। इससे जिस्म में उस खास जरासीम के लिये इम्म्यूनिटी डेवलप हो जाती है। और आगे जब भी उस तरह के जरासीम का कोई खतरनाक हमला होता है तो जिस्म का सिस्टम उसके खिलाफ लड़ लेता है। 

अब एक सवाल पैदा होता है क्या अट्ठारहवीं सदी से पहले दुनिया इम्यून सिस्टम के बारे में जानकारी रखती थी? हज़ार साल पुरानी किताब नहजुल बलाग़ा का एक बयान इसका जवाब हाँ में देता है। 

इमाम हज़रत अली का ये बयान खुत्बा नंबर 81 के तौर पर इस किताब में दर्ज है और इसमें कहा गया है, ‘उसने तुम्हारे लिये कान बनाये ताकि ज़रूरी और अहम चीज़ों को सुनकर महफूज़ रखें और उसने तुम्हें आँखें दी हैं ताकि वह कोरी व बे बसरी से निकल कर रोशन व ज़ियाबार हों और जिस्म के मुख्तलिफ हिस्से ...... अलावह दीगर बड़ी नेमतों और एहसानमन्द बनाने वाली बख़्शिशों और सलामती के हिसारों के।’ इमाम अली(अ.) के इस बयान के आखिरी अलफाज़ पर गौर करें - ‘और सलामती के हिसारों के....’। इंसानी जिस्म के बारे में बताते हुए यहां पर इमाम फरमा रहे हैं कि हमारे जिस्म की सलामती के लिये परवरदिगार ने कुछ हिसार यानि घेरे ( Protection covers ) भी अता किये हैं। 

क्या मतलब है इन घेरों का? क्या हमारे जिस्म पर कछुए की तरह कोई कवच है? या हमारी खाल गेंडे की तरह सख्त है? या हाथी की तरह मोटी है? जिसपर सर्दी, गर्मी या चोट का कोई असर नहीं होता?
लेकिन हमारे जिस्म की न तो खाल मोटी है और न ही अल्लाह ने हमें कोई कुदरती कवच बख्शा है। तो फिर इमाम अली(अ.) के ‘सलामती के हिसार’ का क्या मतलब हुआ? साफ है कि इनसे इमाम का मतलब इम्यून सिस्टम ही था।

जिस्म का ये हिफाज़ती सिस्टम कितना अहम है इसका पता एड्स जैसी बीमारियों में चलता है, जब ये घेरा टूट जाता है। उस वक्त एक मामूली वायरस या बैक्टीरिया भी जानलेवा साबित होता है। जिस्म का यही हिफाज़ती सिस्टम है ‘सलामती का हिसार’ जिसकी तरफ साइंस ने ध्यान दिया अट्ठारहवीं सदी में, यानि इमाम अली(अ.) के बयान के पूरे तेरह सौ साल बाद।

जिस्म का हिफाज़ती सिस्टम ऐसा हैरतअंगेज़ सिस्टम है जो माबूद ने न सिर्फ इंसानों को बल्कि हर एक जानदार को बख्शा है। अगर ये न हो तो शायद इंसान एक दिन भी ज़िन्दा न रह सके। यह सिस्टम खामोशी से लगातार अपना काम करता रहता है और हमें जिन्दा व सेहतमन्द रखता है। अट्ठारहवीं सदी से पहले दुनिया इस सिस्टम से पूरी तरह अंजान थी लेकिन इमाम अली(अ.) की इमामत की नज़र इसे भरपूर तरीके से देख रही थी और सामने वाले को ‘....और सलामती के हिसारों’ जैसी आम फहम ज़बान में बता भी रही थी। ज़रूरत थी तो बस इमाम(अ.) के अलफाज़ पर गौर करने की।

इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुल बलाग़ाह का साइंसी इल्म
लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी
प्रकाशक : अब्बास बुक एजेंसी
ई बुक के तौर पर यह किताब इस लिंक से हासिल की जा सकती है :

Saturday, May 25, 2019

इमाम हज़रत अली का बयान दुनिया के बारे में

इमाम हज़रत अली (अ.) नहजुल बलाग़ा के खुत्बा नं 109 में बयान करते हैं, ‘वह (दुनिया) धोकेबाज़ है और उसकी हर चीज़ धोका।’

यकीनन पल पल बदलती दुनिया को धोकेबाज़ ही कहा जा सकता है, जिसकी इंसान ख्वाहिश करता है लेकिन नतीजे में उसे मौत के सिवा कुछ हासिल नहीं होता। लेकिन यहाँ खास बात ये है कि जदीद साइंस भी दुनिया को ‘धोका’ ही बता रही है। देखते हैं किस तरह।

हमारे आसपास दो तरह की चीज़ें पायी जाती हैं। अलमारी, मेज़, कुर्सी वगैरा को हम छूकर महसूस कर सकते हैं। ये चीज़ें जगह घेरती हैं। यानि अगर किसी जगह पर एक मेज़ रखी है, तो उस जगह पर दूसरी मेज़ या कोई और चीज़ नहीं रखी जा सकती। इस तरह की चीज़ों में हम कहते हैं कि मैटर या द्रव्यमान मौजूद है, जिसकी वजह से वह चीज़ जगह घेर रही है। इनके अलावा कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो मौजूद तो होती हैं लेकिन जगह नहीं घेरतीं। जैसे कि रोशनी, रेडियो वेव्स वगैरा। एक कामन लफ्ज़ इनके लिये एनर्जी का है। यानि एनर्जी जैसी चीज़ जगह नहीं घेरती, इसलिए इसमें द्रव्यमान नहीं होता। लेकिन अब क्वांटम फिज़िक्स के मौजूदा नज़रियात ये बता रहे हैं कि जिन चीज़ों को हम छूकर महसूस कर रहे हैं, वह सिर्फ एक धोका है और द्रव्यमान भी दरअसल एनर्जी की ही शक्ल है। यानि द्रव्यमान का अलग से कोई वजूद नहीं होता।

जदीद साइंस के मुताबिक जो चीज़ें जगहें घेरती हैं, यानि जिनमें द्रव्यमान होता है वो फर्मियान्स नाम के ज़र्रात से मिलकर बनी होती हैं। फर्मियान्स में द्रव्यमान होता है और अगर किसी जगह पर एक फर्मियान मौजूद है तो वहाँ दूसरा फर्मियान नहीं आ सकता। दूसरी तरफ बोसान्स नाम के ज़र्रात होते हैं जो ऐसी चीज़ों को बनाते हैं जो जगह नहीं घेरतीं। जैसे कि रोशनी या ताक़तें। 

इनका रेस्ट मास (रुका हुआ द्रव्यमान) ज़ीरो होता है। अगर किसी जगह पर एक बोसान मौजूद है तो वहाँ दूसरा बोसॉन भी आ सकता है।
जब साइंसदानों ने बिग बैंग का नज़रिया दरियाफ्त किया जिसके मुताबिक एक महाधमाके ने यूनिवर्स की पैदाइश की और उसके बाद ही द्रव्यमान रखने वाले फर्मियान्स पैदा हुए। उससे पहले पूरा यूनिवर्स एनर्जी की हालत में एक प्वाइंट में सिमटा हुआ था। यानि जितना भी द्रव्यमान पैदा हुआ वह एनर्जी के बाद ही पैदा हुआ। इस दरियाफ्त ने साइंसदानों को यह सोचने पर मजबूर किया कि हो न हो, द्रव्यमान भी दरअसल एनर्जी की ही हालत है। सन 1964 ई. में पीटर हिग्स नाम के साइंसदाँ ने ‘गॉड पार्टिकिल’ का कान्सेप्ट दिया।

उसके मुताबिक दुनिया के तमाम फर्मियान्स में द्रव्यमान खास तरह के बोसान्स के मिलने से पैदा होता है। ये बोसान्स गॉड पार्टिकिल कहलाते हैं। गॉड पार्टिकिल पूरे यूनिवर्स में हिग्स फील्ड की सूरत में बिखरे हुए हैं। जब इनमें से बहुत से पार्टिकिल एक जगह पर इकट्ठा हो जाते हैं तो एक फर्मियान ज़र्रे की पैदाइश करते हैं जिसे महसूस किया जा सकता है। जबकि खुद गॉड पार्टिकिल को महसूस नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये लगातार ज़ाहिर व ग़ायब होते रहते हैं। यानि इन्हें हम एक ‘धोका’ कह सकते हैं। तो फिर इनसे बनी तमाम दुनिया भी एक ‘धोके’ के सिवा कुछ नहीं, ऐसा जदीद साइंस के नज़रिये से साबित हो जाता है।

इससे पूरी तरह अलग साइंस के कुछ और नज़रियों के मुताबिक भी दुनिया एक धोके के सिवा कुछ नहीं। साइंस ने दरियाफ्त किया है कि, ‘जिसे हम बाहरी दुनिया के तौर पर देखते व महसूस करते हैं, वह सिर्फ दिमाग़ के ज़रिये पैदा एक नज़रिया होता है जो हमारे हास्सों से आने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल पर आधारित होता है।’
दुनिया के रंग जो हम देखते हैं, चीज़ों को छूकर उनकी सख्ती या नर्मी जो हम महसूस करते हैं। चीज़ों की लज़्ज़तें जो हमारी ज़बान चखती है। तरह तरह की आवाज़ें जो हम अपने कानों से सुनते हैं। खुश्बुएं जो हम सूंघते हैं और इसके अलावा अपने आसपास की हर चीज़, हमारा काम, हमारा घर, फर्नीचर, बच्चे, जिन्हें हम अपने क़रीब या दूर देखते हैं, जिनका हमें एहसास होता है वह सब सिर्फ और सिर्फ इलेक्ट्रिक सिग्नल होते हैं जिन्हें हमारे हास्से हमारे दिमाग तक भेजते हैं। 

इसको देखते हुए बर्टरैण्ड रसेल और एलक विटिगेन्स्टाइन का कहना है, ‘एक नींबू दरहक़ीक़त वजूद में है या नहीं और यह कैसे वजूद में आया इसे मालूम नहीं किया जा सकता। एक नींबू दरअसल एक ग्रुप होता है ज़ायके, जिसे ज़बान से महसूस करते हैं, खुशबू जिसे नाक महसूस करती है, रंग व सूरत जिसे आँख महसूस करती है, और सिर्फ यही फीचर्स नापे जा सकते हैं यानि इनका मुतालिया किया जा सकता है। साइंस कभी भी फिज़िकल दुनिया को नहीं जान सकती।

फ्रेडरिक वेस्टर का कहना है कि, ‘कुछ साइंसदानों का बयान कि ‘‘इंसान एक इमेज है। सब कुछ जिसका तजुर्बा किया जाता है वह टेम्प्रेरी है और बदलने वाला है और ये पूरा यूनिवर्स एक साये की तरह है’ एक दिन साइंस यकीनन इस बयान को साबित कर देगी।’’

इस तरह बहुत से साइंसदाँ इस दुनिया को एक साये की तरह मानते हैं जिसका असलियत में कोई वजूद नहीं।
हम सिर्फ एक बात को ही कन्फर्मेशन के साथ कह सकते हैं कि दुनिया को देखने का तजुर्बा हर शख्स का अपना ज़ाती होता है, जिसे ‘फिश आई तजुर्बा’ भी कह सकते हैं। पानी में तैरने वाली मछली को जो दुनिया कर्व दिखाई देती है वह हमारी नज़र में सीधी होती है। बड़ी मछली व छोटी मछली को भी एक ही दुनिया अलग अलग शक्लों में नज़र आती है और उनके लिये दुनिया की वही शक्ल असली होती है जबकि हकीकत कुछ और ही होती है।

लिहाज़ा ये साबित हुआ कि दुनिया एक धोके (Mirage) के सिवा कुछ नहीं। इमाम अली(अ.) के फरमान पर जदीद साइंस मोहर लगा चुकी है।

इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुल बलाग़ाह का साइंसी इल्म
लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी
प्रकाशक : अब्बास बुक एजेंसी
ई बुक के तौर पर यह किताब इस लिंक से हासिल की जा सकती है :

Sunday, September 24, 2017

इमाम हज़रत अली(अ.) का साइंसी इल्म - Part 1

इमाम हज़रत अली(अ.) के कलाम नहजुलबलाग़ा के पहले खुत्बे में बयान है कि ‘‘हर सिफत शाहिद है कि वह अपने मौसूफ की ग़ैर है और हर मौसूफ शाहिद है कि वह सिफत के अलावा कोई चीज़ है।’’

यहाँ पर इमाम अली (अ.) यूनिवर्स की बहुत बड़ी हकीक़त को ज़ाहिर कर रहे हैं। सिफत यानि कि गुण (property) और मौसूफ, जिसमें वह गुण पाया जाये। गुस्सा, प्यार, ताकत, कमज़ोरी वगैरा गुण हैं, और इंसान में ये गुण हैं इसलिये वह मौसूफ है। ग्रैविटेशन फोर्स एक गुण है और माद्दा जिसमें ये गुण पाया जाता है मौसूफ है। ऑक़्सीजन मौसूफ है और ‘जलने में मदद देना’ इसकी सिफत यानि गुण है। 

अब यूनिवर्स की हकीक़त ये है कि हर मौसूफ को उसकी सिफत से अलग किया जा सकता है। और ये बात साइंटिफिक एक्सपेरिमेन्ट्स से ज़ाहिर होती है। किसी चुम्बक का चुम्बकीय गुण एक खास टेम्प्रेचर (क्यूरी टेम्प्रेचर) के बाद खत्म हो जाता है। इलेक्ट्रान पर निगेटिव चार्ज होता है। देखा ये गया है कि घूमने (spin) की एक खास कण्डीशन में उसका निगेटिव चार्ज खत्म हो जाता है। हर चीज़ में कुछ ऐसी सिफत होती हैं जिनसे उस चीज़ की पहचान होती है। इसके बावजूद उस चीज़ से वे सिफतें हटाई जा सकती हैं। हालांकि अभी साइंस उस लेवेल तक नहीं पहुंच पायी है। लेकिन हो सकता है आने वाले कल में ऐसी बॉडीज़ बनने लगें जिसमें ग्रैविटेशन का गुण न मौजूद हो। ज़ाहिर है कि इसका रिवर्स भी मुमकिन होना चाहिये। यानि ग्रैविटेशन फोर्स मौजूद होना चाहिये बिना किसी बॉडी की मौजूदगी के। बिना चुम्बक चुम्बकीय गुण मौजूद होना चाहिये। साइंस अभी इसपर रिसर्च कर रही है कि क्या बिना किसी ज़रिये (source) के चुम्बकीय क्षेत्र पैदा किया जा सकता है? या ग्रैविटेशन फोर्स ऐसी जगह मौजूद हो सकता है जहाँ किसी बॉडी का असर न हो? 

कुछ हद तक साइंस को इसमें कामयाबी मिली है। साइंस उन ज़र्रात (particles) को ढूंढने में कामयाबी पा चुकी है जो इलेक्ट्रोमैग्नीटिक फोर्स और न्यूक्लियर फोर्स को पैदा करने के जिम्मेदार हैं। ये ज़र्रात हैं फोटॉन और मेसॉन। और माना जाता है कि ग्रैविटेशन फोर्स की पैदाइश के लिये ग्रैविटॉन नाम के ज़र्रे ज़िम्मेदार हैं। ज़ाहिर है कि चूँकि ये ज़र्रे उन बॉडीज़ से अलग हैं जिनमें ये ताकतें मौजूद होती हैं। इसका मतलब हुआ कि इन ताकतों को उन बाडीज़ से अलग करके पैदा किया जा सकता है। इस तरह इमाम हज़रत अली(अ.) की इमामत का इल्म चौदह सौ साल पहले उन ज़र्रात को देख रहा था जो सिफत की पैदाईश करते हैं।

इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुलबलाग़ा का साइंसी इल्म
लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी
प्रकाशक : अब्बास बुक एजेंसी, रुस्तम नगर, दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ - 226003 
मो. : 9415102990, 9369444864

Saturday, June 17, 2017

ज़मीन का वायुमण्डल, आसमान का रंग और सूरज की परिधि इमाम हज़रत अली (अ.) ने बताई

 शेख सुद्दूक (अ.र.) की किताब एललुश्शरा में दर्ज हदीस के मुताबिक़ एक मरतबा हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम मस्जिदे कूफा में थे। मजमे से एक मर्द शामी उठा और अर्ज किया या अमीरलमोमिनीन में आपसे चन्द चीजों के मुताल्लिक कछ दरियाफ्त करना चाहता हूं। आपने फरमाया सवाल करना है तो समझने के लिये सवाल करो। महज़ परेशान करने के लिये सवाल न करना। उसके बाद सायल ने सवाल किये उनमें से तीन सवाल इस तरह थे,

उसने सवाल किया कि ये दुनियावी आसमान किस चीज़ से बना? आपने फरमाया आँधी और बेनूर मौजों से। उसने सूरज का तूल व अर्ज (परिधि) के मुताल्लिक पूछा। आपने फरमाया नौ सौ फरसख को नौ सौ फरसख से ज़र्ब दे दो। उसने सातों आसमान के रंग और उनके नाम दरियाफ्त किये। तो आपने फरमाया पहले आसमान का नाम रफीअ है और उसका रंग पानी व धुएं की मानिन्द है।....

अब हम इन सवालो व जवाबों को मौजूदा साइंस की रोशनी में गौर करते हैं।

अगर ज़मीन के आसमान की बात की जाये तो पूछने वाले का मतलब वायुमंडल से था जो ज़मीन के ऊपर हर तरफ मौजूद है। हम जानते हैं कि वायुमंडल में गैसें हैं और साथ में आयनोस्फेयर है जहां पर आयनों की शक्ल में गैसों की लहरें हैं। ये गैसें कभी एक जगह पर तेजी के साथ इकट्ठा होती हैं तो आँधियों की शक्ल में महसूस होती हैं और कभी बिखरती है तो मौसम पुरसुकून होता है। इसके बावजूद फिज़ा कभी इन गैसों से खाली नहीं होती। 

अगर आम आदमी को समझाने के लिये कहा जाये तो ज़मीन की फिज़ा में आँधियां हैं और लहरें या मौजें। चूंकि ये मौजें रोशनी की नहीं है बल्कि मैटर की हैं लिहाज़ा हम इन्हें बेनूर मौजें कह सकते हैं। और यही बात इमाम अली अलैहिस्सलाम के जवाब में आ रही है।  

सवाली का दूसरा सवाल सूरज के तूल व अर्ज़ यानि कि परिधि के मुताल्लिक था। जवाब में हज़रत अली (अ.) ने फर्सख में ये लम्बाई बतायी जो उस वक्त लम्बाई नापने की आम यूनिट थी। फर्सख फासला नापने की फारसी यूनिट होती है। ये उस फासले के बराबर होती है जो एक घोड़ा एक घण्टे में तय करता है। 19 वीं सदी में इसे 6.23 किलोमीटर के बराबर माना गया। जबकि अरब में इसे 4.83 किलोमीटर के बराबर माना गया। 
सूरज की डायमीटर नासा के अनुसार 1391000 किलोमीटर है। इस तरह इसकी परिधि की लम्बाई हुई 4370000 यूनिट्स। 900 को 900 से ज़र्ब देने पर नतीजा आता है 810000 फर्सख। अगर इसे फारसी यूनिट के अनुसार किलोमीटर में बदला जाये तो नतीजा आयेगा 5046300 यूनिट्स। जबकि अरबी यूनिट के अनुसार नतीजा होगा 3912300 यूनिट्स। 

अगर फर्सख को किलोमीटर में बदलने में अलग अलग जगहों के फर्क को नज़र में रखा जाये तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सरूज की परिधि के बारे में जो बताया वह पूरी तरह मौजूदा साइंस की कैलकुलेशन से मैच कर रहा है। 

चाँद का साइज़ बताने में कई दूसरे साइंसदानों जैसे कि आर्यभट वगैरा का भी जिक्र आता है। और ये उतनी हैरत की बात भी नहीं क्योंकि चाँद की तरफ नज़र की जा सकती है और यह ज़मीन के करीब भी है। लेकिन सूरज जिसकी तरफ नज़र टिक ही नहीं सकती, उसके बारे में इतनी सटीक कैलकुलेशन यकीनन इमाम अली अलैहिस्सलाम की इमामत का चमत्कार ही कहा जायेगा।  

तीसरा सवाल आसमान के रंग के मुताल्लिक था। जब हम ज़मीन पर रहते हुए आसमान की तरफ नज़र करते हैं तो यह नीले रंग का दिखाई देता है। जबकि शाम या सुबह के वक्त इसका रंग थोड़ा बदला हुआ लाल या काला मालूम होता है। 
लेकिन जो लोग स्पेसक्राफ्ट के ज़रिये ज़मीन से बाहर जा चुके हैं। उन्हें न तो ये आसमान नीला दिखाई दिया और न ही लाल। इसलिए क्योंकि ये रंग ज़मीन पर इसलिए दिखाई देते हैं क्योंकि ज़मीन का वायुमंडल सूरज की रोशनी में से खास रंग को हर तरफ बिखेर देता है। 
चूकि ज़मीन के बाहर वायुमंडल नहीं है इसलिए वहां ये रंग नहीं दिखाई देते। तो फिर वहां कौन सा रंग दिखाई देगा? ज़ाहिर है कि वहां चारों तरफ ऐसा कालापन दिखाई देगा जिसमें पानी की तरह रंगहीनता (colorlessness) होगी। यही रंग बाहर जाने वाले फिज़ाई मुसाफिरों ने देखी और यही बात इमाम अली अलैहिस्सलाम अपने जवाब में बता रहे हैं कि पहले आसमान का रंग पानी व धुएं की मानिन्द है। 
पानी का रंग नहीं होता और धुएं का रंग काला होता है। दोनों को मिक्स करने पर जो रंग बनता है वही फिज़ाई मुसाफिरों को ज़मीन से बाहर निकलने पर दिखाई देता है।
जो बातें आज साइंसदानों को ज़मीन से बाहर निकलने पर मालूम हुई हैं वह इमाम अली अलैहिस्सलाम चौदह सौ साल पहले मस्जिद में बैठे हुए बता रहे थे। और इस्लाम के सच और इल्म की गवाही दे रहे थे। वह इल्म जो दुनिया के सामने चौदह सौ साल बाद आने वाला था।
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इस तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिये मेरी किताब "51 जदीद साइंसी तहक़ीक़ात जो दरअस्ल इस्लाम की हैं" देखें जो अब्बास बुक एजेंसी लखनऊ ने प्रकाशित  है. 

Friday, June 2, 2017

मोर मोरनी की किवंदती और इमाम हज़रत अली(अ.)

मोर मोरनी की कहानी भी बहुत पुरानी किवंदती है और हज़ारों साल से बड़े बड़े जस्टिस शर्मा जैसे विद्वान भी इसे सच मानते आ रहे हैं। लेकिन आज से चौदह सौ साल पहले ही इस्लाम के धर्माधिकारी इसे गलत बता चुके हैं। आज से चौदह सौ साल पहले का इमाम हज़रत अली(अ.) का मोर के बारे में यह बयान किताब नहजुल बलाग़ा में खुत्बा नंबर 163 में दर्ज है। किताब ‘नहजुल बलाग़ा’ आसानी से हर जगह लगभग हर भाषा में उपलब्ध है।

इमाम अली(अ.) नहजुल बलाग़ा के इस खुत्बे में कहते हैं कि ‘‘मोर भी और मुरगों की तरह जफ्ती खाता है और (अपनी मादा को) गर्भवती करने के लिये जोश व हीजान में भरे हुए नरों की तरह जोड़ खाता है। मैं इस (बयान) के लिये ‘एक्सपेरीमेन्ट’ को तुम्हारे सामने पेश करता हूं। अटकल लगाने वालों की ये सिर्फ अटकल या वहम है कि वह अपने आँख के बहाये हुए उस आँसू से अपनी मादा को अण्डों पर लाता है कि जो उसकी पलकों के दोनों किनारों में आकर ठहर जाता है और मोरनी उसे पी लेती है और फिर वह अण्डे देने लगती है।’’
इस तरह चौदह सौ साल पहले ही इमाम अली(अ.) मोर के बारे में उस ज़माने में फैली गलत मान्यताओं को नकार रहे हैं। गलत मान्यता ये है कि मोर अपनी आँखों में बसे आँसुओं के क़तरे से मोरनी को अण्डे देने के लिये तैयार करता है। जब मोरनी उन आँसुओं को पी लेती है तो अण्डे देने लगती है।

इमाम अली(अ.) फरमाते हैं कि इन बातों में कोई सच्चाई नहीं। हक़ीक़त ये है कि मोर व मोरनी के बीच उसी तरह ताल्लुक क़ायम होता है जिस तरह दूसरे परिन्दों में नर व मादा के बीच, जैसे कि मुर्ग व मुर्गी। 

Sunday, April 24, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-3)

उस शख्स ने कुरआन पर अगला एतराज़ कुछ यूं किया, ‘(अश-शूरा 51) और किसी आदमी के लिये ये मुमकिन नहीं कि खुदा उससे बात करे मगर 'वही' (दिल में सीधे उतारना) के जरिये या पर्दे के पीछे से, या कोई रसूल (फ़रिश्ता भेज दे) यानि वह अपने अज्ऩ व अख्तियार से जो चाहता है पैगाम भेजता है।’ और उस ने फरमाया ‘(निसा 164) अल्लाह ने मूसा से बातें कीं।’ उसने ये भी कहा, ‘(आराफ 22) और उन दोनों के परवरदिगार ने उन को आवाज़ दी।’ और उसने ये भी फरमाया ‘(अहज़ाब 59) ऐ नबी तुम अपनी बीबियों और लड़कियों से कह दो।’ और उसने ये फरमाया, ‘(मायदा 67) ऐ रसूल जो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से नाजिल हुआ है उसे पहुंचा दो।’ तो ये सब बातें कैसे एक साथ सच हैं?

अब जवाब में इमाम हजरत अली (अ-) ने फरमाया, कि किसी बशर के लिये मुनासिब नहीं कि अल्लाह से बगैर 'वही' कलाम करे और ऐसा वाकिया होने वाला नहीं है मगर पर्दे के पीछे से या किसी फ़रिश्ते को भेजे फिर वह उसकी इजाज़त से जो चाहे वही करे। इस वास्ते अल्लाह ने अपने लिये ‘बहुत बलन्द’ फरमाया है। रसूल पर आसमानी रसूलों (फरिश्तों) के जरिये वही की जाती थी। तो फ़रिश्ते ज़मीन के रसूलों तक पहुंचते थे। और ज़मीन के रसूलों और उस के दरमियान गुफ्तगू बगैर उस कलाम के होती थी जो आसमानी रसूलों के जरिये भेजा जाता था। रसूल अल्लाह (स-अ-) ने फरमाया ऐ जिब्रील क्या तुमने अपने रब को देखा है? तो जिब्रील ने अर्ज़ किया कि बेशक मेरा रब देखा नहीं जा सकता। तब रसूल (स-अ-) ने फरमाया तुम ‘वही’ कहां से लेते हो? उन्होंने कहा इस्राफील से लेता हूं। आप ने फरमाया इस्राफील कहां से लेते हैं? जिब्रील कहने लगे कि वह उस फ़रिश्ते से लेते हैं जो रूहानीन से बुलन्द है। आप ने फरमाया कि वह फ़रिश्ता कहां से लेता है? जिब्रील ने कहा कि उस के दिल में तेजी के साथ बगैर किसी रुकावट के ऊपर से आती है तो यही ‘वही’ है। और यह अल्लाह का कलाम है और अल्लाह का कलाम एक तरह का नहीं होता। वह रसूलों से बात करता है तो वह उसी की तरफ से होता है और उस के जरिये से वह दिल में डालता है। और उसी की तरफ से रसूलों को ख्वाब दिखाता है और उसी की तरफ से ‘वही’ लिखी है जो तिलावत की जाती है और पढ़ी जाती है वही कलाम अल्लाह है।

आगे उस शख्स ने कहा कि मैं अल्लाह को कहते हुए पाता हूं, ‘(यूनुस 61) और तुम्हारे रब से न ज़मीन में न आसमान में जर्रा बराबर शय गायब रह सकती है।’ और वह फरमाता है ‘(आले इमरान 77) और अल्लाह कयामत के दिन उन की तरफ रहमत की नज़र से न देखेगा और न उन को पाक करेगा।’ 
वह किस तरह नज़र व रहमत करेगा जो उस से छुपे होंगे?

इसके जवाब में इमाम हज़रत अली (अ-स-) ने फरमाया, ‘कि हमारा रब इसी तरह का है कि जिस से कोई शय गायब व पोशीदा नहीं है और ये क्योंकर हो सकता है कि जिसने चीजों को खल्क किया उस को मालूम न हो कि उसने क्या खल्क फरमाया और वह तो सब से बड़ा पैदा करने वाला इल्म वाला है। उसके दूसरे जुमले का मतलब है वह बता रहा है कि उन को खैर में से कुछ नहीं पहुंचेगा जैसे कि कहावत है क़सम खुदा की फलां हमारी तरफ नहीं देखता। इस से वह ये मतलब लेते हैं कि उससे हमें खैर में से कुछ नहीं पहुंचता। तो इसी तरह अल्लाह का अपनी मखलूक के साथ नज़र से मतलब है। उस की मखलूक की तरफ नज़र से मुराद रहमत है।

इसके बाद उस शख्स ने कहा, ‘(मुल्क 16) क्या तुम उस की ज़ात से जो आसमानों पर है बेखौफ हो के वह तुम को जमीन में धंसा दे फिर वह जोश में आकर उलटने पलटने लगे।’ उस ने ये भी फरमाया, ‘(ताहा 5) वह रहमान है जो अर्श पर तैयार हो।’ और उसने ये भी फरमाया ‘(ईनाम 3) वही अल्लाह आसमानों और जमीन में है वह तुम्हारी खुफिया और एलानिया बातों को जानता है।’ फिर उसने कहा, ‘(हदीद 3) वही जाहिर और पोशीदा है।’ और उसने फरमाया, ‘(हदीद 4) और वह तुम्हारे साथ है जहाँ कहीं भी हो।’ और उसने कहा कि ‘(क़ाफ 16) और हम तो उसकी शह रग से भी ज्यादा करीब हैं।’ तो ये बातें एक दूसरे से कितनी अलग हैं।

जवाब में इमाम अली इब्ने अबी तालिब (अ-स-) ने फरमाया कि अल्लाह की जात बुलन्द व अलग है उससे कि जो कुछ मखलूक से सरज़द हो, उस से सरज़द हो वह तो लतीफ व खबीर है (आप जो कुछ भी मखलूक के बारे में सोचते हैं या देखते हैं, अल्लाह तआला की ज़ात उससे अलग है।) वह जलील तर है इसलिये कि उस से कोई चीज़ ऐसी जाहिर हो जो उस की मखलूक से जाहिर हो रही हो। मिसाल के तौर पर मखलूक अगर सामने है तो पोशीदा नहीं हो सकती। लेकिन अल्लाह की जात के लिये यह कायदा नहीं है। अगर अर्श की बात की जाये तो उस का इल्म अर्श पर छाया हुआ है। वह हर राज व सरगोशी का गवाह है और वह हर शय पर किफायत करने वाला है और तमाम अशिया का मुदबिर है। अल्लाह तआला की ज़ात बहुत बुलन्द है इस से कि वह अर्श पर हो।

इस तरह उस शख्स ने इमाम हज़रत अली (अ-स-) से कुरआन के मुताल्लिक अनेकों सवाल किये और उन के मुनासिब जवाब पाकर इत्मिनान जाहिर किया। यकीनन पूरे कुरआन का इल्म हर एक को नहीं हासिल है जिसकी वजह से लोग अक्सर शक में मुब्तिला हो जाते हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि कुरआन हर लिहाज से अल्लाह का कलाम है। और जिस तरह अल्लाह की बनाई दुनिया राजों से भरी हुई है लेकिन उन राजों से परदा उठाने के लिये गौरो फिक्र जरूरी है उसी तरह कुरआन के बारे में भी गौरो फिक्र तमाम शक व शुबहात को दूर कर देती है।  
   
सन्दर्भ : शेख सुद्दूक (अ र)  की किताब अल तौहीद

Thursday, April 21, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-2)

आगे उस शख्स ने कुरआन पर एतराज़ करते हुए कहा, ‘(सूरे क़यामत आयत 22-23) उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ और दूसरी जगह वह कहता है, ‘(सूरे इनाम आयत 104) उस को आँखें नहीं देख सकती हैं और वह (लोगों की) निगाहों को देखता है। वह लतीफ खबीर है। और कहता है कि ‘(नज्म 13-14) और उन्होंने उस को एक बार और देखा है सिदरतुल मुन्तहा के नज़दीक।’ और ये भी फरमाता है कि ‘(ताहा 109-110) उस दिन किसी की सिफारिश काम न आयेगी मगर जिस को खुदा ने इजाज़त दी हो और उस का कौल उस को पसंद आये। जो कुछ उन के सामने है और जो कुछ उन के पीछे है वह जानता है और ये लोग अपने इल्म के जरिये उसपर हावी नहीं हो सकते।’
और जिस की निगाहें उस तक पहुंच जायें तो गोया उन का इल्म हावी हो गया। तो भला ये किस तरह हो सकता है?

अब जवाब में हजरत इमाम अली (अ-स-) ने फरमाया कि जिस जगह पर औलिया अल्लाह (अल्लाह के करीबी बन्दे) हिसाब से फारिग होने के बाद एक नहर पर पहुंचेंगे जिस का नाम नहरे हीवान होगा तो वह उसमें गुस्ल करेंगे और उस का पानी पियेंगे तो उन के चेहरे चमक दमक के साथ खूबसूरत नज़र आयेंगे और उन से हर तरह की परेशानी दूर हो जायेगी। फिर उनको जन्नत में दाखिल होने का हुक्म दिया जायेगा तो इस जगह से वह अपने परवरदिगार की तरफ से देखेंगे कि वह उनको किस तरह का बदला यानि फल देता है और उनमें से कुछ लोग जन्नत में दाखिल हो जायेंगे। इसी बिना पर अल्लाह का कौल है, ‘उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ यहाँ अल्लाह की तरफ देखने से मतलब ये है कि वह उस के सवाब को देखेंगे। मगर उस के कौल ‘उस को आँखें नहीं देख सकती हैं’ का मतलब ये है कि इंसानी अक्ल व आँखें उस तक नहीं पहुंच सकतीं। और ‘वह (लोगों की) निगाहों को देखता है।’ का मतलब कि वह उन तक पहुंच सकता है और वह लतीफ खबीर है। और यह एक तारीफ है जिस के जरिये हमारे रब ने अपनी ज़ात की तारीफ फरमाई है। और इन्तिहाई बलन्दी के साथ पाक व पाकीजा हुआ।

और अल्लाह के इस कौल ‘और उन्होंने उस को एक बार और देखा है सिदरतुल मुन्तहा के नज़दीक’ से मतलब ये है कि हज़रत मोहम्मद(स-अ-) ने जिब्रील को सिदरतुल मुन्तहा के मुकाम पर देखा जहाँ मखलूके खुदा में किसी का गुजर नहीं हो सकता। और आखिरी आयत में उसका ये कहना कि ‘(नज्म 17-18) उन की आँख किसी दूसरी तरफ मायल हुई और न हद से आगे बढ़ी उन्होंने अपने परवरदिगार की बड़ी निशानियाँ देखीं।’ उन्होंने जिब्रील को उस की खिलकत की सूरत में दूसरी बार देखा। और इस का सबब ये है कि अल्लाह ने जिब्रील को पैदा किया जो उन रूहानियों में से है जिन के खल्क के राज़ो का परदा सिवाय अल्लाह के कोई नहीं हटा सकता। ‘ये लोग अपने इल्म के जरिये उसपर हावी नहीं हो सकते।’ से मतलब ये है कि कोई भी मखलूक अपने इल्म यानि ज्ञान के जरिये अल्लाह की हस्ती तक नहीं पहुंच सकती। क्योंकि उस अल्लाह की बुलन्द ज़ात ने लोगों के दिलों पर परदा डाल दिया है। न कोई अक्ल व दिमाग उस की कैफियत से वाकिफ हो सकता है और न कोई दिल उसकी हदों या सीमाओं से वाकिफ हो सकता है। फिर न कोई उसका गुण बयान कर सकता है जिस तरह कि उस ने अपने गुणों को बयान किया है। उस जैसी कोई शय नहीं है। वह समीअ-बसीर है वही अव्वल व आखिर है। वही जाहिर व बातिन है। वह खलिक है। उस ने चीजों को खल्क किया। चीज़ों में से कोई चीज उस की तरह नहीं है। उस की ज़ात बाबरकत और बुलन्द व बाला है।
(-----जारी है।)

सन्दर्भ : शेख सुद्दूक(र-) की किताब अल तौहीद

Wednesday, April 20, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-1)

कुरआन नाजिल होने के चौदह सौ सालों के भीतर बहुत से काबिल लोग इसपर उंगली उठा चुके हैं। सैंकड़ों किताबें लिखी जा चुकी हैं इसके खिलाफ। लेकिन आखिरी नतीजा यही रहा कि सबने मुंह की खायी। कुरआन के खिलाफ लिखी हर बात का जवाब हमारे इमामों व विद्वानों द्वारा दिया जा चुका है। आज और इसके बाद के कुछ ब्लागों में मैं इसी तरह के एतराज़ात और उनके जवाबात को लिखूंगा।

यह एतराज़ात इमाम हज़रत अली(अ-स-) के सामने एक शख्स ने पेश किये थे और हज़रत अली(अ-स-) ने उनका जवाब दिया था। गुफ्तगू काफी लम्बी है इसलिये इसको दो तीन किस्तों में पेश करूंगा।

पहला एतराज उस शख्स ने इस तरह पेश किया, 
‘‘सूरे आराफ की 51वीं आयत में है, ‘तो हम(अल्लाह) भी आज उनको भूल जायेंगे जिस तरह ये आज के दिन की मुलाकात को भूल गये।’ जबकि सूरे मरियम की 65 वीं आयत में है, ‘और तुम्हारा रब भूलने वाला नहीं।’ तो कभी अल्लाह खबर देता है कि वह भूल जाता है तो कभी आगाह करता है कि वह नहीं भूलता। ये किस तरह मुमकिन है?’’

इसके जवाब में इमाम हजरत अली(अ-स-) ने फरमाया, ‘‘पहली आयत से मतलब ये निकलता है कि जो लोग दुनिया में अल्लाह को भूल गये यानि उसकी बातों पर अमल नहीं किया तो ऐसे लोगों को वह अपने सवाब में से कुछ भी नहीं देगा यानि ऐसे लोगों को कयामत के दिन अल्लाह की मेहरबानियों में से कुछ भी हासिल नहीं होगा।
जबकि दूसरी आयत में भूलने से मतलब गाफिल होने से है। यानि जैसे कि किसी के ज़हन से कोई बात निकल जाये। तो अल्लाह इससे बहुत बुलन्द है।

दूसरा एतराज उस शख्स ने ये पेश किया, ‘‘सूरे नबा की 38 वीं आयत है ‘जिस दिन रूह और फ़रिश्ते सफबस्ता खड़े होंगे उस से कोई बात नहीं कर सकेगा मगर जिस को इन्तिहाई मेहरबान अल्लाह इजाज़त दे और दुरुस्त बात कहे।’ और उसने कहा कि उन को बोलने की इजाज़त दी गयी तो वह कहने लगे, ‘(सूरे अनाम की 23 वीं आयत ) और अल्लाह की कसम जो हमारा रब है हम मुशरिक नहीं हैं।’ फिर सूरे अन्कुबूत की 25 वीं आयत है, ‘फिर कयामत के दिन तुममें से एक दूसरे का इंकार करेगा और एक दूसरे पर लानत करेगा।’ और उसने ये भी कहा कि (सूरे साद 64 वीं आयत) ‘बेशक अहले जहन्नुम का आपस में लड़ना बिल्कुल दुरुस्त है।’ और ये भी फरमाया (सूरे क़ाफ 28 वीं आयत) ‘मेरे सामने झगड़ा न करो और मैंने पहले ही अज़ाब की खबर दे दी थी।’ सूरे यास की 65 वीं आयत में उसने कहा, ‘हम उनके लबों पर मुहर लगा देंगे और उन के हाथ हम से बातें करेंगे और उन के पाँव गवाही देंगे उस के मुताल्लिक जो वह करते रहे हैं।
इस तरह कभी अल्लाह कहता है कि वह कलाम करेंगे तो कभी खबर देता है कि वह बात नहीं करेंगे मगर जिस को रहमान इजाज़त दे और सही बात कहे। और कभी यह कहता है कि मखलूक गुफ्तगू नहीं करेगी और फिर उनकी गुफ्तगू के बारे में कहता है ‘कसम खुदा की वह हमारा रब है हम मुशरिक नहीं हैं।’ और कभी ये बताता है कि वह झगड़ा करते हैं। ये किस तरह मुमकिन है?’’

इसके जवाब में इमाम हजरत अली(अ-स-) ने फरमाया, कि ये सारी बातें कयामत के रोज अलग अलग वक्त में होंगी। कयामत का दिन पचास हज़ार साल लंबा है, जिसमें अल्लाह तमाम लोगों को जमा करेगा जो अलग अलग जगहों में होंगे और एक दूसरे से कलाम करेंगे। और एक दूसरे के लिये भलाई की दुआ करेंगे। ये वो लोग होंगे जो हक़वालों के सरदारों में से होंगे, जिन्होंने दुनिया में अल्लाह की इताअत की होगी। और उन गुनाहगार लोगों पर लानत करेंगे जिन से नफरत व अदावत का इजहार हुआ और जिन्होंने दुनिया में जुल्म व जबर पर एक दूसरे की मदद की। 
गुनाहगार व जालिम एक दूसरे को काफिर कहेंगे और एक दूसरे पर लानत करेंगे। फिर वह एक दूसरी जगह पर जमा होंगे जहाँ वह रोएंगे। अगर ये आवाजें दुनिया वाले सुन लें तो अपने सारे काम धंधे छोड़ दें और उनके दिल फट जायें। इसके बाद वह दूसरी जगह जमा होंगे तो बातें करेंगे और कहेंगे कि ‘कसम खुदा की हमारे रब, हम मुशरिक नहीं थे।’ फिर अल्लाह उन के मुंह पर मुहर लगा देगा और हाथ पैर व खालें बोलने लगेंगी। फिर जिस्म के हिस्से उन के हर गुनाह की गवाही देंगे। फिर उन की जबानों से मुहरों को हटा लिया जायेगा तो वह अपने जिस्म के हिस्सों से कहेंगे तुमने हमारे खिलाफ किस वजह से गवाही दी? तो वह कहेंगे कि हम को उस अल्लाह ने बोलने की ताकत दी जिसने हर शय को कूव्वते फहम अता की।

इस तरह कुरआन की ये आयतें एक दूसरे से अलग नहीं हैं।
(-----जारी है।)

सन्दर्भ : शेख सुद्दूक(र.) की किताब अल तौहीद