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Sunday, April 25, 2021

आक्सीजन के बारे में इमाम हज़रत अली(अ.) का बयान

 आक्सीजन के बारे में इमाम हज़रत अली(अ.) का बयान जो नहजुल बलाग़ा के खुत्बा - 131 मे इस तरह मौजूद है, ‘और तरोताज़ा शादाब दरख्त सुबह व शाम उसके आगे सर बसुजूद हैं और अपनी शाखों से चमकती हुई आग भड़काते हैं...’

इस जुमले पर गौर करने पर दो चीज़ें नज़र आती हैं। पहली ये कि इसमें शादाब दरख्तों के सुबह व शाम सजदे में होने का ज़िक्र है। और दूसरी ये कि इसमें उन दरख्तों की शाखों का चमकती हुई आग भड़काने का ज़िक्र है। यानि तरोताज़ा शादाब दरख्तों में कोई ऐसा अमल हो रहा है जो सुबह व शाम के वक्त कुछ अलग होता है और दिन के बाक़ी अवक़ात में अलग। और इस अमल से तरोताज़ा शादाब दरख्तों की शाखों से कोई ऐसी चीज़ बनती है जो चमकती हुई आग को भड़काती है।
अगर यहाँ इमाम(अ.) शादाब दरख्तों की बजाय सूखे दरख्तों की बात करते तो ये जुमला एक मामूली जुमला होता। क्योंकि सूखे दरख्तों से आग भड़कने की बात हर एक की समझ में आती है। लेकिन जब शादाब दरख्तों से चमकीली आग के भड़कने का ज़िक्र हो तो इस जुमले का राज़ बहुत गहरा हो जाता है। और कम से कम इमाम अली(अ.) के ज़माने की साइंस उस राज़ तक नहीं पहुंच पायी थी।
और वह राज़ है हरे पौधों में फोटोसिंथेसिस का और उसके ज़रिये आक्सीजन के बनने का। इमाम(अ.) के इस जुमले में फोटोसिंथेसिस के ज़रिये आक्सीजन के ही बनने का ज़िक्र हो रहा है।
लेकिन ये दोनों ही अमल उस वक्त रुके होते हैं या उनकी रफ्तार न के बराबर हो जाती है जब इंसान अल्लाह की इबादत में और खासतौर से सज्दे में सर रखे होता है। उस वक्त न तो वह अपनी ज़रूरत की चीज़ें हासिल करता है, न ही दूसरों की ज़रूरत की चीज़ें तैयार करता है। उसका ज़हन व जिस्म उस वक्त सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की इबादत में मशगूल होता है।
तरोताज़ा शादाब दरख्त भी दो तरह के अमल करते हैं। पहला तो ये कि ज़मीन से पानी व नाईट्रेट और हवा से कार्बन डाई आक्साइड लेते हैं। साथ में साँस लेने के लिये आक्सीजन लेते हैं। जबकि दूसरे अमल में सूरज की रोशनी में फोटोसिंथेसिस करते हुए आक्सीजन बनाकर हवा में छोड़ते हैं। जो कि हर तरह के जानदारों के सांस लेने में काम आती है। इसी फोटोसिंथेसिस के ज़रिये वह तमाम जानदारों के लिये फल व अनाज वगैरा की शक्ल में खाने की अशिया भी बनाते हैं। चूंकि दिन के वक्त सूरज की रोशनी ज़्यादा होती है लिहाज़ा फोटोसिंथेसिस का अमल भी तेज़ होता है। यानि दरख्त फिज़ा में आक्सीजन ज़्यादा छोड़ते हैं और इसकी बनिस्बत साँस लेने में कम आक्सीजन लेते हैं। जबकि रात में इसका उलटा होता है, क्योंकि सूरज की रोशनी की गैरमौजूदगी में फोटोसिंथेसिस का अमल रुक जाता है जबकि पौधों का साँस लेना जारी रहता है।
लेकिन पूरे रात दिन में दो वक्त ऐसे होते हैं जब पौधे जितनी आक्सीजन साँस के ज़रिये लेते हैं उतनी ही फोटोसिंथेसिस के ज़रिये छोड़ते हैं। ये दो वक्त हैं सुबह तड़के फजिर का वक्त और शाम को मग़रिब का वक्त। हम कह सकते हैं कि इन दोनों अवक़ात में न तो नबातात फिज़ा को कुछ देते हैं, न लेते हैं। साइंसदानों ने इसे नाम दिया है Compensation Point यह ठीक वही सिचुएशन है जैसे इंसानों में सज्दे व इबादत के वक्त होती है।
इस तरह इमाम अली(अ.) तरोताज़ा शादाब दरख्तों के सज्दे के ज़रिये न सिर्फ Respiration और Photosynthesis की तरफ इशारा कर रहे हैं बल्कि दिन के अलग अलग अवक़ात में इसके बदलने की भी बात कर रहे हैं।
इमाम(अ.) के बयान के दूसरे हिस्से से पूरी तरह साफ हो जाता है कि इमाम अली(अ.) न सिर्फ फोटोसिंथेसिस की बात कर रहे हैं बल्कि उस अमल में आक्सीजन मिलती है, इस राज़ को भी ज़ाहिर कर रहे हैं। जैसा कि इमाम(अ.) फरमा रहे हैं कि , ‘तरोताज़ा शादाब दरख्त .... अपनी शाखों से चमकती हुई आग भड़काते हैं ’ यानि हरे व शादाब दरख्तों की शाखों में जो अमल होता है उसके नतीजे में कोई ऐसी चीज़ मिलती है जो चमकती हुई आग को भड़का देती है।
साइंस ने दरियाफ्त किया है कि आग को भड़काने में फिज़ा में मौजूद एक ही गैस का रोल होता है, और वह गैस है आक्सीजन। और यही गैस फोटोसिंथेसिस के अमल के दौरान हरे पौधों की शाखों पर मौजूद पत्तियों से बनकर निकलती है। साइंसी तारीख के मुताबिक आक्सीजन की दरियाफ्त सन 1772 में शीले नाम के साइंसदाँ ने की। इससे पहले कोई इस गैस के बारे में नहीं जानता था। लैवोज़िये ने इसी ज़माने में दरियाफ्त किया कि आक्सीजन जलने में मदद करती है। बिना आक्सीजन के किसी भी चीज़ का जलना नामुमकिन है। फोटोसिंथेसिस की दरियाफ्त वाॅन हेल्मोन्ट ने सत्रहवीं सदी में की। लेकिन उसे यह पता नहीं चला था कि इस प्रोसेस में आक्सीजन पैदा होती है। इसे मालूम किया जोसेफ प्रीस्टले ने अट्ठारहवीं सदी में। जब आक्सीजन की दरियाफ्त उसी वक्त में हुई थी।
प्रीस्टले ने बताया कि पौधे सूरज की रोशनी में आक्सीजन पैदा करते हैं। लेकिन आक्सीजन पैदा करने की प्रोसेस यानि फोटोसिंथेसिस दरख्तों की पत्तियों में होती है, जो कि दरख्तों की शाखों पर होती हैं यह बीसवीं सदी में पहले दुनिया नहीं जानती थी। बीसवीं सदी में वान नील नाम के साइंसदाँ ने इस बारे में बताया।
लेकिन इन सब साइंसदानों से बहुत पहले इमाम अली(अ.) पाँचवीं-छठी सदी में साफ साफ बता रहे हैं कि शादाब दरख्तों की शाखों में (फोटोसिंथेसिस का) अमल होता है जिसमें चमकती हुई आग को भड़काने वाली शय (आक्सीजन) पैदा होती है। यहाँ पर इमाम(अ.) आक्सीजन की खासियत को भी साफ साफ बयान कर रहे हैं। आक्सीजन आग को भड़काती है यानि जलने में मदद देती है, लेकिन खुद आग को पैदा नहीं करती। यानि किसी और तरीके से पैदा हुई आग को आगे जलते रहने के लिये आक्सीजन काम आती है, लेकिन हम अगर चाहें कि सिर्फ आक्सीजन की मदद से आग को पैदा भी कर दें तो यह मुमकिन नहीं। अगर ऐसा मुमकिन होता तो पूरी दुनिया में हर तरफ आग ही आग नज़र आती क्योंकि फिज़ा में बीस फीसदी आक्सीजन ही होती है।

इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुल बलाग़ाह का साइंसी इल्म
लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी
प्रकाशक : अब्बास बुक एजेंसी, लखनऊ 
ई बुक के तौर पर यह किताब इस लिंक से हासिल की जा सकती है :

Saturday, May 25, 2019

इमाम हज़रत अली का बयान दुनिया के बारे में

इमाम हज़रत अली (अ.) नहजुल बलाग़ा के खुत्बा नं 109 में बयान करते हैं, ‘वह (दुनिया) धोकेबाज़ है और उसकी हर चीज़ धोका।’

यकीनन पल पल बदलती दुनिया को धोकेबाज़ ही कहा जा सकता है, जिसकी इंसान ख्वाहिश करता है लेकिन नतीजे में उसे मौत के सिवा कुछ हासिल नहीं होता। लेकिन यहाँ खास बात ये है कि जदीद साइंस भी दुनिया को ‘धोका’ ही बता रही है। देखते हैं किस तरह।

हमारे आसपास दो तरह की चीज़ें पायी जाती हैं। अलमारी, मेज़, कुर्सी वगैरा को हम छूकर महसूस कर सकते हैं। ये चीज़ें जगह घेरती हैं। यानि अगर किसी जगह पर एक मेज़ रखी है, तो उस जगह पर दूसरी मेज़ या कोई और चीज़ नहीं रखी जा सकती। इस तरह की चीज़ों में हम कहते हैं कि मैटर या द्रव्यमान मौजूद है, जिसकी वजह से वह चीज़ जगह घेर रही है। इनके अलावा कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो मौजूद तो होती हैं लेकिन जगह नहीं घेरतीं। जैसे कि रोशनी, रेडियो वेव्स वगैरा। एक कामन लफ्ज़ इनके लिये एनर्जी का है। यानि एनर्जी जैसी चीज़ जगह नहीं घेरती, इसलिए इसमें द्रव्यमान नहीं होता। लेकिन अब क्वांटम फिज़िक्स के मौजूदा नज़रियात ये बता रहे हैं कि जिन चीज़ों को हम छूकर महसूस कर रहे हैं, वह सिर्फ एक धोका है और द्रव्यमान भी दरअसल एनर्जी की ही शक्ल है। यानि द्रव्यमान का अलग से कोई वजूद नहीं होता।

जदीद साइंस के मुताबिक जो चीज़ें जगहें घेरती हैं, यानि जिनमें द्रव्यमान होता है वो फर्मियान्स नाम के ज़र्रात से मिलकर बनी होती हैं। फर्मियान्स में द्रव्यमान होता है और अगर किसी जगह पर एक फर्मियान मौजूद है तो वहाँ दूसरा फर्मियान नहीं आ सकता। दूसरी तरफ बोसान्स नाम के ज़र्रात होते हैं जो ऐसी चीज़ों को बनाते हैं जो जगह नहीं घेरतीं। जैसे कि रोशनी या ताक़तें। 

इनका रेस्ट मास (रुका हुआ द्रव्यमान) ज़ीरो होता है। अगर किसी जगह पर एक बोसान मौजूद है तो वहाँ दूसरा बोसॉन भी आ सकता है।
जब साइंसदानों ने बिग बैंग का नज़रिया दरियाफ्त किया जिसके मुताबिक एक महाधमाके ने यूनिवर्स की पैदाइश की और उसके बाद ही द्रव्यमान रखने वाले फर्मियान्स पैदा हुए। उससे पहले पूरा यूनिवर्स एनर्जी की हालत में एक प्वाइंट में सिमटा हुआ था। यानि जितना भी द्रव्यमान पैदा हुआ वह एनर्जी के बाद ही पैदा हुआ। इस दरियाफ्त ने साइंसदानों को यह सोचने पर मजबूर किया कि हो न हो, द्रव्यमान भी दरअसल एनर्जी की ही हालत है। सन 1964 ई. में पीटर हिग्स नाम के साइंसदाँ ने ‘गॉड पार्टिकिल’ का कान्सेप्ट दिया।

उसके मुताबिक दुनिया के तमाम फर्मियान्स में द्रव्यमान खास तरह के बोसान्स के मिलने से पैदा होता है। ये बोसान्स गॉड पार्टिकिल कहलाते हैं। गॉड पार्टिकिल पूरे यूनिवर्स में हिग्स फील्ड की सूरत में बिखरे हुए हैं। जब इनमें से बहुत से पार्टिकिल एक जगह पर इकट्ठा हो जाते हैं तो एक फर्मियान ज़र्रे की पैदाइश करते हैं जिसे महसूस किया जा सकता है। जबकि खुद गॉड पार्टिकिल को महसूस नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये लगातार ज़ाहिर व ग़ायब होते रहते हैं। यानि इन्हें हम एक ‘धोका’ कह सकते हैं। तो फिर इनसे बनी तमाम दुनिया भी एक ‘धोके’ के सिवा कुछ नहीं, ऐसा जदीद साइंस के नज़रिये से साबित हो जाता है।

इससे पूरी तरह अलग साइंस के कुछ और नज़रियों के मुताबिक भी दुनिया एक धोके के सिवा कुछ नहीं। साइंस ने दरियाफ्त किया है कि, ‘जिसे हम बाहरी दुनिया के तौर पर देखते व महसूस करते हैं, वह सिर्फ दिमाग़ के ज़रिये पैदा एक नज़रिया होता है जो हमारे हास्सों से आने वाले इलेक्ट्रिकल सिग्नल पर आधारित होता है।’
दुनिया के रंग जो हम देखते हैं, चीज़ों को छूकर उनकी सख्ती या नर्मी जो हम महसूस करते हैं। चीज़ों की लज़्ज़तें जो हमारी ज़बान चखती है। तरह तरह की आवाज़ें जो हम अपने कानों से सुनते हैं। खुश्बुएं जो हम सूंघते हैं और इसके अलावा अपने आसपास की हर चीज़, हमारा काम, हमारा घर, फर्नीचर, बच्चे, जिन्हें हम अपने क़रीब या दूर देखते हैं, जिनका हमें एहसास होता है वह सब सिर्फ और सिर्फ इलेक्ट्रिक सिग्नल होते हैं जिन्हें हमारे हास्से हमारे दिमाग तक भेजते हैं। 

इसको देखते हुए बर्टरैण्ड रसेल और एलक विटिगेन्स्टाइन का कहना है, ‘एक नींबू दरहक़ीक़त वजूद में है या नहीं और यह कैसे वजूद में आया इसे मालूम नहीं किया जा सकता। एक नींबू दरअसल एक ग्रुप होता है ज़ायके, जिसे ज़बान से महसूस करते हैं, खुशबू जिसे नाक महसूस करती है, रंग व सूरत जिसे आँख महसूस करती है, और सिर्फ यही फीचर्स नापे जा सकते हैं यानि इनका मुतालिया किया जा सकता है। साइंस कभी भी फिज़िकल दुनिया को नहीं जान सकती।

फ्रेडरिक वेस्टर का कहना है कि, ‘कुछ साइंसदानों का बयान कि ‘‘इंसान एक इमेज है। सब कुछ जिसका तजुर्बा किया जाता है वह टेम्प्रेरी है और बदलने वाला है और ये पूरा यूनिवर्स एक साये की तरह है’ एक दिन साइंस यकीनन इस बयान को साबित कर देगी।’’

इस तरह बहुत से साइंसदाँ इस दुनिया को एक साये की तरह मानते हैं जिसका असलियत में कोई वजूद नहीं।
हम सिर्फ एक बात को ही कन्फर्मेशन के साथ कह सकते हैं कि दुनिया को देखने का तजुर्बा हर शख्स का अपना ज़ाती होता है, जिसे ‘फिश आई तजुर्बा’ भी कह सकते हैं। पानी में तैरने वाली मछली को जो दुनिया कर्व दिखाई देती है वह हमारी नज़र में सीधी होती है। बड़ी मछली व छोटी मछली को भी एक ही दुनिया अलग अलग शक्लों में नज़र आती है और उनके लिये दुनिया की वही शक्ल असली होती है जबकि हकीकत कुछ और ही होती है।

लिहाज़ा ये साबित हुआ कि दुनिया एक धोके (Mirage) के सिवा कुछ नहीं। इमाम अली(अ.) के फरमान पर जदीद साइंस मोहर लगा चुकी है।

इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुल बलाग़ाह का साइंसी इल्म
लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी
प्रकाशक : अब्बास बुक एजेंसी
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Friday, May 24, 2019

इमाम हज़रत अली का बयान अल्लाह की अब्दियत के बारे में

आज से ठीक चौदह सौ साल पहले एक ज़ालिम की ज़हर बुझी तलवार ने एक ऐसी अज़ीम हस्ती को क़त्ल कर दिया था जो हर मज़लूम का सहारा था और इंसाफ चाहने वाली हर नज़र उसी की तरफ उठती थी और उससे तलब करने वाला कभी मायूस नहीं होता था। इमाम हज़रत अली इल्म, अदालत, सखावत, बहादुरी हर गुण में बेमिसाल थे। उनके इल्म की एक हल्की सी झलक नहजुल बलाग़ा के खुत्बा नं 107 के इन अलफाज़ में मिलती है, ‘तू अबदी है जिसकी कोई हद नहीं और तू ही मंज़िले मुनतहा है कि जिससे कोई गुरेज़ की राह नहीं।’’ यानि अल्लाह के लिये किसी हद का तसव्वुर नहीं। इमाम(अ.) ने यहाँ पर ‘अब्दी’ लफ्ज़ का इस्तेमाल किया है जिसका एक खास मफहूम है।

साइंसदाँ आज ये देख चुके हैं कि यूनिवर्स लगातार फैल रहा है। यानि यूनिवर्स की तमाम चीज़ें सितारे व गैलेक्सीज़ वगैरा एक दूसरे से दूर जा रहे हैं। ये फैलाव किसी गुब्बारे की तरह हो रहा है। इस फैलाव की मुनासिबत से देखते हुए अगर तारीख में पीछे की तरफ जाया जाये तो यूनिवर्स छोटा और छोटा होता जायेगा और आखिर में एक प्वाइंट में जाकर सिमट जायेगा। इस नतीजे से साइंसदानों को एक थ्योरी मिलती है ‘बिग बैंग’। 

बिग बैंग थ्योरी में दिखने वाले यूनिवर्स की शुरूआत आइंस्टीन की रिलेटिविटी समीकरणों में भी दिखाई देती है और यह शुरूआत एक ऐसे प्वाइंट को दिखाती है जहाँ पर टेम्प्रेचर, घनापन (Density) और यूनिवर्स का टेढ़ापन (Curvature) सब कुछ अनन्त या ‘अबदी’ है। इस अबदी प्वाइंट को साइंस ‘सिंगुलैरिटी (Singularity)’ नाम से पुकारती है। साइंसदानों के मुताबिक इस तरह की सिचुएशन का तसव्वुर ही नहीं किया जा सकता, लिहाज़ा उनके मुताबिक थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी यहाँ पर आकर रुक जाती है। यानि शुरूआत के बाद यूनिवर्स कैसे फैला, ये तो बताया जा सकता है, लेकिन शुरूआत हुई कैसे इस बारे में बताने से थ्योरी फेल हो जाती है। 

यूनिवर्स की सिंगुलैरिटी एक ऐसा प्वाइंट है जिसके बारे में बताने से रिलेटिविटी समीकरणें लाचार हैं। लेकिन साथ ही ये समीकरणें उस प्वाइंट के वजूद को कन्फर्म भी करती हैं। ठीक इसी तरह अल्लाह इस मायने में अबदी है कि दुनिया की तमाम समीकरणें उसके बारे में बताने से लाचार हैं, लेकिन साथ ही उसके वजूद को कन्फर्म भी करती हैं।

मैथेमैटिक्स व साइंस की तमाम इक्वेशंस तरह तरह की सिंगुलैरिटीज़ से भरी पड़ी हैं। मसलन काम्प्लेक्स नंबर इक्वेशन में पोल्स (Poles) की सिंगुलैरिटी, या फिर डोमेन वाल नाम की सिंगुलैरिटी जो टू डाईमेन्शन में दिखाई देती है। फिज़िकल साइंस में ग्रैविटेशनल फील्ड (Gravitational Field) की सिंगुलैरिटी स्पेस-टाइम में नज़र आती है जहाँ पर ग्रैविटेशनल फील्ड को नापने वाली क्वांटिटीज़ इनफाईनाइट हो जाती हैं। ब्लैक होल के भीतर या शिवर्ज़चाइल्ड रेडियस से बड़े सितारे के खात्मे में भी सिंगुलैरिटी की झलक दिखती है।

इस तरह हम देखते हैं कि अब्दियत या सिंगुलैरिटी साइंस के लिये जानी पहचानी हक़ीक़त है जो जगह जगह नज़र आती है, ऐसे प्वाइंट की शक्ल में जहाँ पर कोई इक्वेशन इन्फार्मेशन देने से लाचार हो जाती है। यानि उस प्वाइंट की इन्फार्मेशन हमारे डाईमेन्शन सिस्टम से बाहर निकल जाती है, लेकिन साथ ही ऐसे प्वाइंट का वजूद भी कन्फर्म होता है। इस तरह अब्दियत (Singularity) की ये मिसालें अल्लाह के वजूद की अब्दियत को साबित करती हैं। 

हम अल्लाह की अब्दियत को इस तरह कह सकते हैं कि अगर तमाम कायनात की खिलक़तों को इक्वेशन माना जाये तो इन खिलक़त की इक्वेशन्स की सिंगुलैरिटी ही है अल्लाह की अब्दियत। खिलक़त की इक्वेशन्स एक सिंगुलैरिटी यानि खालिक़ की तरफ इशारा करती हैं, लेकिन उस खालिक़ के बारे में इन्फार्मेशन किसी इक्वेशन के ज़रिये हासिल होना नामुमकिन है। यही है खालिक़ की अब्दियत।
लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं लेना चाहिए कि अल्लाह किसी सिंगुलर प्वाइंट की तरह किसी जगह में सिमटा हुआ है। दरअसल यहाँ पर उस गुण की बात हो रही है जिसका नाम ‘सिंगुलैरिटी’ है। और अपने इन अलफाज़ के ज़रिये इमाम अली(अ.) ‘सिंगुलैरिटी’ के कान्सेप्ट को ज़ाहिर कर रहे हैं, जहाँ तक साइंस की पहुंच इमाम अली(अ.) के बहुत बाद के ज़माने में हुई। और खिलक़त की अब्दियत को तो साइंस ने चौदह सौ साल बाद समझा। वह भी पूरी तरह नहीं। 

इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुल बलाग़ाह का साइंसी इल्म
लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी
प्रकाशक : अब्बास बुक एजेंसी
ई बुक के तौर पर यह किताब इस लिंक से हासिल की जा सकती है :

Sunday, September 24, 2017

इमाम हज़रत अली(अ.) का साइंसी इल्म - Part 1

इमाम हज़रत अली(अ.) के कलाम नहजुलबलाग़ा के पहले खुत्बे में बयान है कि ‘‘हर सिफत शाहिद है कि वह अपने मौसूफ की ग़ैर है और हर मौसूफ शाहिद है कि वह सिफत के अलावा कोई चीज़ है।’’

यहाँ पर इमाम अली (अ.) यूनिवर्स की बहुत बड़ी हकीक़त को ज़ाहिर कर रहे हैं। सिफत यानि कि गुण (property) और मौसूफ, जिसमें वह गुण पाया जाये। गुस्सा, प्यार, ताकत, कमज़ोरी वगैरा गुण हैं, और इंसान में ये गुण हैं इसलिये वह मौसूफ है। ग्रैविटेशन फोर्स एक गुण है और माद्दा जिसमें ये गुण पाया जाता है मौसूफ है। ऑक़्सीजन मौसूफ है और ‘जलने में मदद देना’ इसकी सिफत यानि गुण है। 

अब यूनिवर्स की हकीक़त ये है कि हर मौसूफ को उसकी सिफत से अलग किया जा सकता है। और ये बात साइंटिफिक एक्सपेरिमेन्ट्स से ज़ाहिर होती है। किसी चुम्बक का चुम्बकीय गुण एक खास टेम्प्रेचर (क्यूरी टेम्प्रेचर) के बाद खत्म हो जाता है। इलेक्ट्रान पर निगेटिव चार्ज होता है। देखा ये गया है कि घूमने (spin) की एक खास कण्डीशन में उसका निगेटिव चार्ज खत्म हो जाता है। हर चीज़ में कुछ ऐसी सिफत होती हैं जिनसे उस चीज़ की पहचान होती है। इसके बावजूद उस चीज़ से वे सिफतें हटाई जा सकती हैं। हालांकि अभी साइंस उस लेवेल तक नहीं पहुंच पायी है। लेकिन हो सकता है आने वाले कल में ऐसी बॉडीज़ बनने लगें जिसमें ग्रैविटेशन का गुण न मौजूद हो। ज़ाहिर है कि इसका रिवर्स भी मुमकिन होना चाहिये। यानि ग्रैविटेशन फोर्स मौजूद होना चाहिये बिना किसी बॉडी की मौजूदगी के। बिना चुम्बक चुम्बकीय गुण मौजूद होना चाहिये। साइंस अभी इसपर रिसर्च कर रही है कि क्या बिना किसी ज़रिये (source) के चुम्बकीय क्षेत्र पैदा किया जा सकता है? या ग्रैविटेशन फोर्स ऐसी जगह मौजूद हो सकता है जहाँ किसी बॉडी का असर न हो? 

कुछ हद तक साइंस को इसमें कामयाबी मिली है। साइंस उन ज़र्रात (particles) को ढूंढने में कामयाबी पा चुकी है जो इलेक्ट्रोमैग्नीटिक फोर्स और न्यूक्लियर फोर्स को पैदा करने के जिम्मेदार हैं। ये ज़र्रात हैं फोटॉन और मेसॉन। और माना जाता है कि ग्रैविटेशन फोर्स की पैदाइश के लिये ग्रैविटॉन नाम के ज़र्रे ज़िम्मेदार हैं। ज़ाहिर है कि चूँकि ये ज़र्रे उन बॉडीज़ से अलग हैं जिनमें ये ताकतें मौजूद होती हैं। इसका मतलब हुआ कि इन ताकतों को उन बाडीज़ से अलग करके पैदा किया जा सकता है। इस तरह इमाम हज़रत अली(अ.) की इमामत का इल्म चौदह सौ साल पहले उन ज़र्रात को देख रहा था जो सिफत की पैदाईश करते हैं।

इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुलबलाग़ा का साइंसी इल्म
लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी
प्रकाशक : अब्बास बुक एजेंसी, रुस्तम नगर, दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ - 226003 
मो. : 9415102990, 9369444864

Sunday, July 9, 2017

नहजुल बलाग़ह का साइंसी इल्म

मेरी नई किताब "नहजुल बलाग़ह का साइंसी इल्म" का कवर पेज.


किताब शीघ्र ही आपके सामने होगी। जिसके  प्रकाशक हैं 
अब्बास बुक एजेंसी,
दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ
Ph : (+91) 9415102990, (+91) 9369444864