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Sunday, February 5, 2023

कुरआन की शान्ति का पैगाम देती हुई आयतें

 [2:256]  दीन में किसी तरह की जबरदस्ती नहीं क्योंकि हिदायत गुमराही से (अलग) ज़ाहिर हो चुकी तो जिस शख्स ने झूठे खुदाओं बुतों से इंकार किया और अल्लाह ही पर ईमान लाया तो उसने वो मज़बूत रस्सी पकड़ी है जो टूट ही नहीं सकती और अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है

[2:272] (ऐ रसूल) उनका मंज़िले मक़सूद तक पहुँचाना तुम्हारा काम नहीं (तुम्हारा काम सिर्फ़ रास्ता दिखाना है) मगर हॉ अल्लाह जिसको चाहे मंज़िले मक़सूद तक पहुंचा दे 
[7:56] (लोगों) अपने परवरदिगार से गिड़गिड़ाकर और चुपके - चुपके दुआ करो  वह हद से तजाविज़ करने वालों को हरगिज़ दोस्त नहीं रखता और ज़मीन में असलाह के बाद फसाद न करते फिरो और (अज़ाब) के ख़ौफ से और (रहमत) की आस लगा के अल्लाह से दुआ मांगो
[2:11-12] और जब उनसे कहा जाता है कि मुल्क में फसाद न करते फिरो (तो) कहते हैं कि हम तो सिर्फ इसलाह करते हैं. ख़बरदार हो जाओ बेशक यही लोग फसादी हैं लेकिन समझते नहीं .
[88:21-22] तो तुम नसीहत करते रहो तुम तो बस नसीहत करने वाले हो. तुम कुछ उन पर दरोग़ा तो हो नहीं
[109:5-6] और जिसकी मैं इबादत करता हूँ उसकी तुम इबादत करने वाले नहीं. तुम्हारे लिए तुम्हारा दीन मेरे लिए मेरा दीन
[9:6] और (ऐ रसूल) अगर मुशरिकीन में से कोई तुमसे पनाह मागें तो उसको पनाह दो यहाँ तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन ले फिर उसे उसकी अमन की जगह वापस पहुँचा दो ये इस वजह से कि ये लोग नादान हैं 
[4 : 80] जिसने रसूल की इताअत की तो उसने अल्लाह की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो तुम कुछ खयाल न करो (क्योंकि) हमने तुम को पासबान (मुक़र्रर) करके तो भेजा नहीं है
[6 : 107] और अगर अल्लाह चाहता तो ये लोग शिर्क ही न करते और हमने तुमको उन लोगों का निगेहबान तो बनाया नहीं है और न तुम उनके ज़िम्मेदार हो
[10 : 99&100] और (ऐ पैग़म्बर) अगर तेरा परवरदिगार चाहता तो जितने लोग रुए ज़मीन पर हैं सबके सब इमान ले आते तो क्या तुम लोगों पर ज़बरदस्ती करना चाहते हो ताकि सबके सब इमानदार हो जाएँ हालॉकि किसी शख्‍स को ये इखतियार नहीं कि बगै़र अल्लाह की मर्जी ईमान ले आए और जो लोग अक़ल से काम नहीं लेते उन्हीं लोगों पर अल्लाह गन्दगी डाल देता है 
[11 : 28] (नूह ने) कहा ऐ मेरी क़ौम क्या तुमने ये समझा है कि अगर मैं अपने परवरदिगार की तरफ से एक रौशन दलील पर हूँ और उसने अपनी सरकार से रहमत (नुबूवत) अता फरमाई और वह तुम्हें सुझाई नहीं देती तो क्या मैं उसको (ज़बरदस्ती) तुम्हारे गले मंढ़ सकता हूँ
[16 : 82] तुम उसकी फरमाबरदारी करो उस पर भी अगर ये लोग (इमान से) मुँह फेरे तो तुम्हारा फर्ज़ सिर्फ (एहकाम का) साफ पहुँचा देना है
[17 : 53&54] और (ऐ रसूल) मेरे (सच्चे) बन्दों (मोमिनों से कह दो कि वह (काफिरों से) बात करें तो अच्छे तरीक़े से (सख्त कलामी न करें) क्योंकि शैतान तो (ऐसी ही) बातों से फसाद डलवाता है इसमें तो शक ही नहीं कि शैतान आदमी का खुला हुआ दुश्मन है 
[21 : 107 & 109] और (ऐ रसूल) हमने तो तुमको सारे दुनिया जहाँन के लोगों के हक़ में अज़सरतापा रहमत बनाकर भेजा-----फिर अगर ये लोग (उस पर भी) मुँह फेरें तो तुम कह दो कि मैंने तुम सबको यकसाँ ख़बर कर दी है और मैं नहीं जानता कि जिस (अज़ाब) का तुमसे वायदा किया गया है क़रीब आ पहुँचा या (अभी) दूर है
[22 : 67] इसमें शक नहीं कि इन्सान बड़ा ही नाशुक्रा है (ऐ रसूल) हमने हर उम्मत के वास्ते एक तरीक़ा मुक़र्रर कर दिया कि वह इस पर चलते हैं फिर तो उन्हें इस दीन (इस्लाम) में तुम से झगड़ा न करना चाहिए और तुम (लोगों को) अपने परवरदिगार की तरफ बुलाए जाओ
[24 : 54] (ऐ रसूल) तुम कह दो कि अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो इस पर भी अगर तुम सरताबी करोगे तो बस रसूल पर इतना ही (तबलीग़) वाजिब है जिसके वह ज़िम्मेदार किए गए हैं और जिसके ज़िम्मेदार तुम बनाए गए हो तुम पर वाजिब है और अगर तुम उसकी इताअत करोगे तो हिदायत पाओगे और रसूल पर तो सिर्फ साफ तौर पर (एहकाम का) पहुँचाना फर्ज़ है
[36 : 16&17] तब उन पैग़म्बरों ने कहा हमारा परवरदिगार जानता है कि हम यक़ीन्न उसी के भेजे हुए (आए) हैं और (तुम मानो या न मानो) हम पर तो बस खुल्लम खुल्ला एहकामे अल्लाह का पहुँचा देना फर्ज़ है
[39 : 41] (ऐ रसूल) हमने तुम्हारे पास (ये) किताब (क़ुरआन) सच्चाई के साथ लोगों (की हिदायत) के वास्ते नाज़िल की है  पस जो राह पर आया तो अपने ही (भले के) लिए और जो गुमराह हुआ तो उसकी गुमराही का वबाल भी उसी पर है और फिर तुम कुछ उनके ज़िम्मेदार तो हो नहीं
[42 : 6] और जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़ कर (और) अपने सरपरस्त बना रखे हैं अल्लाह उनकी निगरानी कर रहा है (ऐ रसूल) तुम उनके निगेहबान नहीं हो
[42 : 48] फिर अगर मुँह फेर लें तो (ऐ रसूल) हमने तुमको उनका निगेहबान बनाकर नहीं भेजा तुम्हारा काम तो सिर्फ (एहकाम का) पहुँचा देना है और जब हम इन्सान को अपनी रहमत का मज़ा चखाते हैं तो वह उससे ख़ुश हो जाता है और अगर उनको उन्हीं के हाथों की पहली करतूतों की बदौलत कोई तकलीफ पहुँचती (सब एहसान भूल गए) बेशक इन्सान बड़ा नाशुक्रा है
[64 :12] और अल्लाह की इताअत करो और रसूल की इताअत करो फिर अगर तुमने मुँह फेरा तो हमारे रसूल पर सिर्फ़ पैग़ाम का वाज़ेए करके पहुँचा देना फर्ज़ है
[60 : 8&9] जो लोग तुमसे तुम्हारे दीन के बारे में नहीं लड़े भिड़े और न तुम्हें घरों से निकाले उन लोगों के साथ एहसान करने और उनके साथ इन्साफ़ से पेश आने से अल्लाह तुम्हें मना नहीं करता बेशक अल्लाह इन्साफ़ करने वालों को दोस्त रखता है. अल्लाह तो बस उन लोगों के साथ दोस्ती करने से मना करता है जिन्होने तुमसे दीन के बारे में लड़ाई की और तुमको तुम्हारे घरों से निकाल बाहर किया  और तुम्हारे निकालने में (औरों की) मदद की और जो लोग ऐसों से दोस्ती करेंगे वह लोग ज़ालिम हैं 
[4 : 80] जिसने रसूल की इताअत की तो उसने अल्लाह की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो तुम कुछ खयाल न करो (क्योंकि) हमने तुम को पासबान (मुक़र्रर) करके तो भेजा नहीं है
[6 : 107] और अगर अल्लाह चाहता तो ये लोग शिर्क ही न करते और हमने तुमको उन लोगों का निगेहबान तो बनाया नहीं है और न तुम उनके ज़िम्मेदार हो.
[5.32]हमने बनी इसराईल पर वाजिब कर दिया था कि जो “शख्स किसी को न जान के बदले में और न मुल्क में फ़साद फैलाने की सज़ा में (बल्कि नाहक़) क़त्ल कर डालेगा तो गोया उसने सब लोगों को क़त्ल कर डाला और जिसने एक आदमी को जिला दिया तो गोया उसने सब लोगों को जिला लिया और उन (बनी इसराईल) के पास तो हमारे पैग़म्बर (कैसे कैसे) रौशन मौजिज़े लेकर आ चुके हैं (मगर) फिर उसके बाद भी यक़ीनन उसमें से बहुतेरे ज़मीन पर ज़्यादतियॉ करते रहे
[5:33] जो लोग अल्लाह और उसके रसूल से लड़ते भिड़ते हैं (और एहकाम को नहीं मानते) और फ़साद फैलाने की ग़रज़ से मुल्को (मुल्को) दौड़ते फिरते हैं उनकी सज़ा बस यही है कि (चुन चुनकर) या तो मार डाले जाएँ या उन्हें सूली दे दी जाए या उनके हाथ पॉव हेर फेर कर एक तरफ़ का हाथ दूसरी तरफ़ का पॉव काट डाले जाएँ या उन्हें (अपने वतन की) सरज़मीन से शहर बदर कर दिया जाए यह रूसवाई तो उनकी दुनिया में हुयी और फिर आख़ेरत में तो उनके लिए बहुत बड़ा अज़ाब ही है
इसका मतलब साफ़ है की अगर कोई तुमसे झगडा नहीं कर रहा है तो तुम्हें उससे झगड़ने या उसे तकलीफ पहुंचाने का कोई हक नहीं. मोमिन मियाँ ने दीने इस्लाम लगता है किसी तालिबानी मुल्ला से पढ़ा है, वरना वह ऐसी बातें हरगिज़ न कहते. 
अब बात करते हैं सुलह की जो मोहम्मद (स.अ.) ने मक्के के काफिरों से की थी, उस सुलह के नियमों की अवहेलना मक्के वाले खुले आम कर रहे थे और मुसलमानों को परेशान कर रहे थे. उसके बाद सूरे तौबा नाजिल हुई. <b>हर  कानून में IF - Then होता है.</b>  मोमिन मियाँ इस सूरे की 1, 5, 23 आयत तो पढ़ रहे हैं लेकिन आयत नं 12, 13  और 6 पढना भूल गए या टाल गए,
[तौबा आयत नं 12] और अगर ये लोग एहद कर चुकने के बाद अपनी क़समें तोड़ डालें और तुम्हारे दीन में तुमको ताना दें तो तुम कुफ्र के सरवर आवारा लोगों से खूब लड़ाई करो उनकी क़समें का हरगिज़ कोई एतबार नहीं ताकि ये लोग (अपनी शरारत से) बाज़ आएँ.
[तौबा आयत नं 13] (मुसलमानों) भला तुम उन लोगों से क्यों नहीं लड़ते जिन्होंने अपनी क़समों को तोड़ डाला 

Sunday, April 24, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-3)

उस शख्स ने कुरआन पर अगला एतराज़ कुछ यूं किया, ‘(अश-शूरा 51) और किसी आदमी के लिये ये मुमकिन नहीं कि खुदा उससे बात करे मगर 'वही' (दिल में सीधे उतारना) के जरिये या पर्दे के पीछे से, या कोई रसूल (फ़रिश्ता भेज दे) यानि वह अपने अज्ऩ व अख्तियार से जो चाहता है पैगाम भेजता है।’ और उस ने फरमाया ‘(निसा 164) अल्लाह ने मूसा से बातें कीं।’ उसने ये भी कहा, ‘(आराफ 22) और उन दोनों के परवरदिगार ने उन को आवाज़ दी।’ और उसने ये भी फरमाया ‘(अहज़ाब 59) ऐ नबी तुम अपनी बीबियों और लड़कियों से कह दो।’ और उसने ये फरमाया, ‘(मायदा 67) ऐ रसूल जो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से नाजिल हुआ है उसे पहुंचा दो।’ तो ये सब बातें कैसे एक साथ सच हैं?

अब जवाब में इमाम हजरत अली (अ-) ने फरमाया, कि किसी बशर के लिये मुनासिब नहीं कि अल्लाह से बगैर 'वही' कलाम करे और ऐसा वाकिया होने वाला नहीं है मगर पर्दे के पीछे से या किसी फ़रिश्ते को भेजे फिर वह उसकी इजाज़त से जो चाहे वही करे। इस वास्ते अल्लाह ने अपने लिये ‘बहुत बलन्द’ फरमाया है। रसूल पर आसमानी रसूलों (फरिश्तों) के जरिये वही की जाती थी। तो फ़रिश्ते ज़मीन के रसूलों तक पहुंचते थे। और ज़मीन के रसूलों और उस के दरमियान गुफ्तगू बगैर उस कलाम के होती थी जो आसमानी रसूलों के जरिये भेजा जाता था। रसूल अल्लाह (स-अ-) ने फरमाया ऐ जिब्रील क्या तुमने अपने रब को देखा है? तो जिब्रील ने अर्ज़ किया कि बेशक मेरा रब देखा नहीं जा सकता। तब रसूल (स-अ-) ने फरमाया तुम ‘वही’ कहां से लेते हो? उन्होंने कहा इस्राफील से लेता हूं। आप ने फरमाया इस्राफील कहां से लेते हैं? जिब्रील कहने लगे कि वह उस फ़रिश्ते से लेते हैं जो रूहानीन से बुलन्द है। आप ने फरमाया कि वह फ़रिश्ता कहां से लेता है? जिब्रील ने कहा कि उस के दिल में तेजी के साथ बगैर किसी रुकावट के ऊपर से आती है तो यही ‘वही’ है। और यह अल्लाह का कलाम है और अल्लाह का कलाम एक तरह का नहीं होता। वह रसूलों से बात करता है तो वह उसी की तरफ से होता है और उस के जरिये से वह दिल में डालता है। और उसी की तरफ से रसूलों को ख्वाब दिखाता है और उसी की तरफ से ‘वही’ लिखी है जो तिलावत की जाती है और पढ़ी जाती है वही कलाम अल्लाह है।

आगे उस शख्स ने कहा कि मैं अल्लाह को कहते हुए पाता हूं, ‘(यूनुस 61) और तुम्हारे रब से न ज़मीन में न आसमान में जर्रा बराबर शय गायब रह सकती है।’ और वह फरमाता है ‘(आले इमरान 77) और अल्लाह कयामत के दिन उन की तरफ रहमत की नज़र से न देखेगा और न उन को पाक करेगा।’ 
वह किस तरह नज़र व रहमत करेगा जो उस से छुपे होंगे?

इसके जवाब में इमाम हज़रत अली (अ-स-) ने फरमाया, ‘कि हमारा रब इसी तरह का है कि जिस से कोई शय गायब व पोशीदा नहीं है और ये क्योंकर हो सकता है कि जिसने चीजों को खल्क किया उस को मालूम न हो कि उसने क्या खल्क फरमाया और वह तो सब से बड़ा पैदा करने वाला इल्म वाला है। उसके दूसरे जुमले का मतलब है वह बता रहा है कि उन को खैर में से कुछ नहीं पहुंचेगा जैसे कि कहावत है क़सम खुदा की फलां हमारी तरफ नहीं देखता। इस से वह ये मतलब लेते हैं कि उससे हमें खैर में से कुछ नहीं पहुंचता। तो इसी तरह अल्लाह का अपनी मखलूक के साथ नज़र से मतलब है। उस की मखलूक की तरफ नज़र से मुराद रहमत है।

इसके बाद उस शख्स ने कहा, ‘(मुल्क 16) क्या तुम उस की ज़ात से जो आसमानों पर है बेखौफ हो के वह तुम को जमीन में धंसा दे फिर वह जोश में आकर उलटने पलटने लगे।’ उस ने ये भी फरमाया, ‘(ताहा 5) वह रहमान है जो अर्श पर तैयार हो।’ और उसने ये भी फरमाया ‘(ईनाम 3) वही अल्लाह आसमानों और जमीन में है वह तुम्हारी खुफिया और एलानिया बातों को जानता है।’ फिर उसने कहा, ‘(हदीद 3) वही जाहिर और पोशीदा है।’ और उसने फरमाया, ‘(हदीद 4) और वह तुम्हारे साथ है जहाँ कहीं भी हो।’ और उसने कहा कि ‘(क़ाफ 16) और हम तो उसकी शह रग से भी ज्यादा करीब हैं।’ तो ये बातें एक दूसरे से कितनी अलग हैं।

जवाब में इमाम अली इब्ने अबी तालिब (अ-स-) ने फरमाया कि अल्लाह की जात बुलन्द व अलग है उससे कि जो कुछ मखलूक से सरज़द हो, उस से सरज़द हो वह तो लतीफ व खबीर है (आप जो कुछ भी मखलूक के बारे में सोचते हैं या देखते हैं, अल्लाह तआला की ज़ात उससे अलग है।) वह जलील तर है इसलिये कि उस से कोई चीज़ ऐसी जाहिर हो जो उस की मखलूक से जाहिर हो रही हो। मिसाल के तौर पर मखलूक अगर सामने है तो पोशीदा नहीं हो सकती। लेकिन अल्लाह की जात के लिये यह कायदा नहीं है। अगर अर्श की बात की जाये तो उस का इल्म अर्श पर छाया हुआ है। वह हर राज व सरगोशी का गवाह है और वह हर शय पर किफायत करने वाला है और तमाम अशिया का मुदबिर है। अल्लाह तआला की ज़ात बहुत बुलन्द है इस से कि वह अर्श पर हो।

इस तरह उस शख्स ने इमाम हज़रत अली (अ-स-) से कुरआन के मुताल्लिक अनेकों सवाल किये और उन के मुनासिब जवाब पाकर इत्मिनान जाहिर किया। यकीनन पूरे कुरआन का इल्म हर एक को नहीं हासिल है जिसकी वजह से लोग अक्सर शक में मुब्तिला हो जाते हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि कुरआन हर लिहाज से अल्लाह का कलाम है। और जिस तरह अल्लाह की बनाई दुनिया राजों से भरी हुई है लेकिन उन राजों से परदा उठाने के लिये गौरो फिक्र जरूरी है उसी तरह कुरआन के बारे में भी गौरो फिक्र तमाम शक व शुबहात को दूर कर देती है।  
   
सन्दर्भ : शेख सुद्दूक (अ र)  की किताब अल तौहीद

Thursday, April 21, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-2)

आगे उस शख्स ने कुरआन पर एतराज़ करते हुए कहा, ‘(सूरे क़यामत आयत 22-23) उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ और दूसरी जगह वह कहता है, ‘(सूरे इनाम आयत 104) उस को आँखें नहीं देख सकती हैं और वह (लोगों की) निगाहों को देखता है। वह लतीफ खबीर है। और कहता है कि ‘(नज्म 13-14) और उन्होंने उस को एक बार और देखा है सिदरतुल मुन्तहा के नज़दीक।’ और ये भी फरमाता है कि ‘(ताहा 109-110) उस दिन किसी की सिफारिश काम न आयेगी मगर जिस को खुदा ने इजाज़त दी हो और उस का कौल उस को पसंद आये। जो कुछ उन के सामने है और जो कुछ उन के पीछे है वह जानता है और ये लोग अपने इल्म के जरिये उसपर हावी नहीं हो सकते।’
और जिस की निगाहें उस तक पहुंच जायें तो गोया उन का इल्म हावी हो गया। तो भला ये किस तरह हो सकता है?

अब जवाब में हजरत इमाम अली (अ-स-) ने फरमाया कि जिस जगह पर औलिया अल्लाह (अल्लाह के करीबी बन्दे) हिसाब से फारिग होने के बाद एक नहर पर पहुंचेंगे जिस का नाम नहरे हीवान होगा तो वह उसमें गुस्ल करेंगे और उस का पानी पियेंगे तो उन के चेहरे चमक दमक के साथ खूबसूरत नज़र आयेंगे और उन से हर तरह की परेशानी दूर हो जायेगी। फिर उनको जन्नत में दाखिल होने का हुक्म दिया जायेगा तो इस जगह से वह अपने परवरदिगार की तरफ से देखेंगे कि वह उनको किस तरह का बदला यानि फल देता है और उनमें से कुछ लोग जन्नत में दाखिल हो जायेंगे। इसी बिना पर अल्लाह का कौल है, ‘उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ यहाँ अल्लाह की तरफ देखने से मतलब ये है कि वह उस के सवाब को देखेंगे। मगर उस के कौल ‘उस को आँखें नहीं देख सकती हैं’ का मतलब ये है कि इंसानी अक्ल व आँखें उस तक नहीं पहुंच सकतीं। और ‘वह (लोगों की) निगाहों को देखता है।’ का मतलब कि वह उन तक पहुंच सकता है और वह लतीफ खबीर है। और यह एक तारीफ है जिस के जरिये हमारे रब ने अपनी ज़ात की तारीफ फरमाई है। और इन्तिहाई बलन्दी के साथ पाक व पाकीजा हुआ।

और अल्लाह के इस कौल ‘और उन्होंने उस को एक बार और देखा है सिदरतुल मुन्तहा के नज़दीक’ से मतलब ये है कि हज़रत मोहम्मद(स-अ-) ने जिब्रील को सिदरतुल मुन्तहा के मुकाम पर देखा जहाँ मखलूके खुदा में किसी का गुजर नहीं हो सकता। और आखिरी आयत में उसका ये कहना कि ‘(नज्म 17-18) उन की आँख किसी दूसरी तरफ मायल हुई और न हद से आगे बढ़ी उन्होंने अपने परवरदिगार की बड़ी निशानियाँ देखीं।’ उन्होंने जिब्रील को उस की खिलकत की सूरत में दूसरी बार देखा। और इस का सबब ये है कि अल्लाह ने जिब्रील को पैदा किया जो उन रूहानियों में से है जिन के खल्क के राज़ो का परदा सिवाय अल्लाह के कोई नहीं हटा सकता। ‘ये लोग अपने इल्म के जरिये उसपर हावी नहीं हो सकते।’ से मतलब ये है कि कोई भी मखलूक अपने इल्म यानि ज्ञान के जरिये अल्लाह की हस्ती तक नहीं पहुंच सकती। क्योंकि उस अल्लाह की बुलन्द ज़ात ने लोगों के दिलों पर परदा डाल दिया है। न कोई अक्ल व दिमाग उस की कैफियत से वाकिफ हो सकता है और न कोई दिल उसकी हदों या सीमाओं से वाकिफ हो सकता है। फिर न कोई उसका गुण बयान कर सकता है जिस तरह कि उस ने अपने गुणों को बयान किया है। उस जैसी कोई शय नहीं है। वह समीअ-बसीर है वही अव्वल व आखिर है। वही जाहिर व बातिन है। वह खलिक है। उस ने चीजों को खल्क किया। चीज़ों में से कोई चीज उस की तरह नहीं है। उस की ज़ात बाबरकत और बुलन्द व बाला है।
(-----जारी है।)

सन्दर्भ : शेख सुद्दूक(र-) की किताब अल तौहीद

Wednesday, April 20, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-1)

कुरआन नाजिल होने के चौदह सौ सालों के भीतर बहुत से काबिल लोग इसपर उंगली उठा चुके हैं। सैंकड़ों किताबें लिखी जा चुकी हैं इसके खिलाफ। लेकिन आखिरी नतीजा यही रहा कि सबने मुंह की खायी। कुरआन के खिलाफ लिखी हर बात का जवाब हमारे इमामों व विद्वानों द्वारा दिया जा चुका है। आज और इसके बाद के कुछ ब्लागों में मैं इसी तरह के एतराज़ात और उनके जवाबात को लिखूंगा।

यह एतराज़ात इमाम हज़रत अली(अ-स-) के सामने एक शख्स ने पेश किये थे और हज़रत अली(अ-स-) ने उनका जवाब दिया था। गुफ्तगू काफी लम्बी है इसलिये इसको दो तीन किस्तों में पेश करूंगा।

पहला एतराज उस शख्स ने इस तरह पेश किया, 
‘‘सूरे आराफ की 51वीं आयत में है, ‘तो हम(अल्लाह) भी आज उनको भूल जायेंगे जिस तरह ये आज के दिन की मुलाकात को भूल गये।’ जबकि सूरे मरियम की 65 वीं आयत में है, ‘और तुम्हारा रब भूलने वाला नहीं।’ तो कभी अल्लाह खबर देता है कि वह भूल जाता है तो कभी आगाह करता है कि वह नहीं भूलता। ये किस तरह मुमकिन है?’’

इसके जवाब में इमाम हजरत अली(अ-स-) ने फरमाया, ‘‘पहली आयत से मतलब ये निकलता है कि जो लोग दुनिया में अल्लाह को भूल गये यानि उसकी बातों पर अमल नहीं किया तो ऐसे लोगों को वह अपने सवाब में से कुछ भी नहीं देगा यानि ऐसे लोगों को कयामत के दिन अल्लाह की मेहरबानियों में से कुछ भी हासिल नहीं होगा।
जबकि दूसरी आयत में भूलने से मतलब गाफिल होने से है। यानि जैसे कि किसी के ज़हन से कोई बात निकल जाये। तो अल्लाह इससे बहुत बुलन्द है।

दूसरा एतराज उस शख्स ने ये पेश किया, ‘‘सूरे नबा की 38 वीं आयत है ‘जिस दिन रूह और फ़रिश्ते सफबस्ता खड़े होंगे उस से कोई बात नहीं कर सकेगा मगर जिस को इन्तिहाई मेहरबान अल्लाह इजाज़त दे और दुरुस्त बात कहे।’ और उसने कहा कि उन को बोलने की इजाज़त दी गयी तो वह कहने लगे, ‘(सूरे अनाम की 23 वीं आयत ) और अल्लाह की कसम जो हमारा रब है हम मुशरिक नहीं हैं।’ फिर सूरे अन्कुबूत की 25 वीं आयत है, ‘फिर कयामत के दिन तुममें से एक दूसरे का इंकार करेगा और एक दूसरे पर लानत करेगा।’ और उसने ये भी कहा कि (सूरे साद 64 वीं आयत) ‘बेशक अहले जहन्नुम का आपस में लड़ना बिल्कुल दुरुस्त है।’ और ये भी फरमाया (सूरे क़ाफ 28 वीं आयत) ‘मेरे सामने झगड़ा न करो और मैंने पहले ही अज़ाब की खबर दे दी थी।’ सूरे यास की 65 वीं आयत में उसने कहा, ‘हम उनके लबों पर मुहर लगा देंगे और उन के हाथ हम से बातें करेंगे और उन के पाँव गवाही देंगे उस के मुताल्लिक जो वह करते रहे हैं।
इस तरह कभी अल्लाह कहता है कि वह कलाम करेंगे तो कभी खबर देता है कि वह बात नहीं करेंगे मगर जिस को रहमान इजाज़त दे और सही बात कहे। और कभी यह कहता है कि मखलूक गुफ्तगू नहीं करेगी और फिर उनकी गुफ्तगू के बारे में कहता है ‘कसम खुदा की वह हमारा रब है हम मुशरिक नहीं हैं।’ और कभी ये बताता है कि वह झगड़ा करते हैं। ये किस तरह मुमकिन है?’’

इसके जवाब में इमाम हजरत अली(अ-स-) ने फरमाया, कि ये सारी बातें कयामत के रोज अलग अलग वक्त में होंगी। कयामत का दिन पचास हज़ार साल लंबा है, जिसमें अल्लाह तमाम लोगों को जमा करेगा जो अलग अलग जगहों में होंगे और एक दूसरे से कलाम करेंगे। और एक दूसरे के लिये भलाई की दुआ करेंगे। ये वो लोग होंगे जो हक़वालों के सरदारों में से होंगे, जिन्होंने दुनिया में अल्लाह की इताअत की होगी। और उन गुनाहगार लोगों पर लानत करेंगे जिन से नफरत व अदावत का इजहार हुआ और जिन्होंने दुनिया में जुल्म व जबर पर एक दूसरे की मदद की। 
गुनाहगार व जालिम एक दूसरे को काफिर कहेंगे और एक दूसरे पर लानत करेंगे। फिर वह एक दूसरी जगह पर जमा होंगे जहाँ वह रोएंगे। अगर ये आवाजें दुनिया वाले सुन लें तो अपने सारे काम धंधे छोड़ दें और उनके दिल फट जायें। इसके बाद वह दूसरी जगह जमा होंगे तो बातें करेंगे और कहेंगे कि ‘कसम खुदा की हमारे रब, हम मुशरिक नहीं थे।’ फिर अल्लाह उन के मुंह पर मुहर लगा देगा और हाथ पैर व खालें बोलने लगेंगी। फिर जिस्म के हिस्से उन के हर गुनाह की गवाही देंगे। फिर उन की जबानों से मुहरों को हटा लिया जायेगा तो वह अपने जिस्म के हिस्सों से कहेंगे तुमने हमारे खिलाफ किस वजह से गवाही दी? तो वह कहेंगे कि हम को उस अल्लाह ने बोलने की ताकत दी जिसने हर शय को कूव्वते फहम अता की।

इस तरह कुरआन की ये आयतें एक दूसरे से अलग नहीं हैं।
(-----जारी है।)

सन्दर्भ : शेख सुद्दूक(र.) की किताब अल तौहीद

Friday, September 20, 2013

यह ग़लत इल्ज़ाम है कि रसूल(स.) ने किसी बच्ची से शादी की थी।


इस्लाम की सच्चाई व पैगम्बर मोहम्मद(स.) का बेदाग़ चरित्र शुरूआत से ही इस्लाम दुश्मनों की नज़र में खटकता रहा है। और वे नबी के चरित्र पर उंगली उठाने के मौके ढूंढते रहे हैं। इसके लिये अक्सर वे ज़ईफ़ हदीसों का सहारा लेने से नहीं चूकते, अर्थात जिनकी रावियों के सिलसिले में कहीं कोई कमज़ोर कड़ी पायी जाती है। इसी तरह का एक निहायत गलत आक्षेप ये है कि पैगम्बर मोहम्मद(स.) ने जब हज़रत आयशा(र.) से शादी की तो उनकी उम्र मात्र छह साल थी। यह बात पूरी तरह आधारहीन है कि नबी(अ.) से शादी के वक्त हज़रत आयशा(र.) की उम्र छह साल थी। ऐतिहासिक रूप से इसका कोई प्रमाण नहीं और हक़ीक़त इसके उलट है। 
तमाम इतिहासकार इसपर सहमत हैं कि हज़रत आयशा(र.) की बड़ी बहन हज़रत अस्मा(र.) उनसे दस साल बड़ी थीं।(1,2) और उनकी मृत्यु सन 73 हिजरी में 100 साल की उम्र में हुई (3,4,5,6) अर्थात हिजरी वर्ष आरम्भ होने के समय उनकी उम्र 27 या 28 साल थी। और इस तरह हिजरी वर्ष आरम्भ होने के समय हज़रत आयशा(र.) की उम्र 17 या 18 साल थी जबकि सन 2 हिजरी में उनकी शादी हुई। अर्थात शादी के समय हज़रत आयशा(र.) की उम्र 19 या 20 साल थी।
दूसरा सुबूत हज़रत आयशा(र.) का स्वयं का क़ौल है जो कि सहीह बुखारी में इस तरह दर्ज है,(7) ''जब सूर: अल क़मर का नुज़ूल हुआ उस समय मैं किशोरावस्था (जारिया:) में थी।" ज्ञात रहे कि सूर: अल क़मर का नुज़ूल हिजरी वर्ष आरम्भ होने के 8 साल पहले हुआ था। अब किसी किशोरी की आयु दस साल बाद अर्थात शादी के समय क्या होगी इसका सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
तबरी के अनुसार, ''पैगम्बर मोहम्मद(स.) ने जब इस्लाम का पैगाम दिया, उससे पहले हज़रत अबूबक्र(र.) ने दो शादियां की थीं। पहली बीवी का नाम फातिला था उनसे एक बेटा अब्दुल्लाह व बेटी अस्मा हुई । जबकि दूसरी बीवी की नाम उम्मे रूमाँ था। इनसे बेटा अब्दुर्रहमान व बेटी आयशा (र.) हुई । ये चारों इस्लाम का पैगाम आने से पहले हो चुके थे।(8) रसूल(स.) ने इस्लाम का पैगाम जब दिया था तो उनकी उम्र थी चालीस साल। जबकि हिजरत के वक्त उनकी उम्र थी 52 साल। उसके दो साल बाद उन्होंने हज़रत आयशा(र.) से शादी की। इस तरह भी इस शादी के वक्त हज़रत आयशा(र.) की उम्र 14 साल से ज़्यादा ही ठहरती है, कम नहीं।
गर्ज़ ये कि इस्लाम के रसूल(स.) पर लगाया गया ये इल्ज़ाम पूरी तरह गलत है कि उन्होंने किसी बच्ची से शादी की थी।           

1. Siyar A’lama-nubala, Al-Zahabi, Vol. 2, pg 289, Arabic, Muassasatu-risalah, 1992
2. Al-Bidayah wa-nihayah, Ibn Kathir, Vol. 8, pg 371, Dar al-fikr al-`arabi, Al-jizah, 1933
3. Al-Bidayah wa-nihayah, Ibn Kathir, Vol. 8, p. 372 
4. Dar al-fikr al-`arabi, Al-jizah, 1933
5. Ibne Asakir vol 69 Page 18
6. Alsunnan Alkubra Albehaqi Vol.6 Page 204 
7. Sahih Bukhari, kitabu’l-tafsir, Bab QaulihiBal al-sa`atu Maw`iduhum wa’l-sa`atu adha’ wa amarr)
8.Tarikh Tabari, vol. 4, p. 50

Friday, August 2, 2013

'शिया काफिर क्यों हैं?

'शिया काफिर क्यों हैं? इसका कथित सुबूत लेकर यूशा खान नामी एक सज्जन मेरी इससे पहले की पोस्ट पर नमूदार हुए हैं और उन्होंने एक यूटयूब का वीडियो लगाया है। उस वीडियो में उनके एक छुटभैये मुल्ला अपनी ही किताब से शियों को काफिर बताते हुए एक हदीस बयान करते हैं जिसमें एक शिया आलिम का तज़किरा है जो माअज़अल्लाह लड़कों के साथ बदफेअली करते थे।

इस तरह की हदीस पूरी तरह झूठी है। शियों में इस तरह की बदफेअली की हरगिज़ इजाज़त नहीं। शिया फिरका मर्दों की मर्दों के साथ या औरतों की औरतों के साथ बदफेअली को गुनाहाने कबीरा में शुमार करता है। और यकीनन ऐसा बुरा काम करने वाले जहन्नुमी हैं।

शिया किताब 'तफसीर क़ुम्मी के मुताबिक इमाम जाफर सादिक़(अ.स.) फरमाते हैं, 'जो शख्स मर्दों की मर्दों के साथ या औरतों की औरतों के साथ बदफेअली को हलाल मानता है तो मौत के बाद अल्लाह उसे उन ही पत्थरों से अज़ाब देगा जो पत्थर हज़रत लूत की क़ौम पर अज़ाब की शक्ल में नाजि़ल हुए थे।

फुरू-ए-काफी की बीसियों अहादीस में इस बदफेअल की सख्ती से मज़म्मत की गई है।  

मैं समझता हूं यूशा खान को या उनके छुटभैये मुल्ला को कम से कम किसी शिया से बात करके या किसी शिया किताब में देखकर कन्फर्म कर लेना चाहिए कि क्या वाकई जो वो कह रहे हैं या समझ रहे हैं, ऐसा है? क्या वाकई में शियों में इस तरह की बदफेअली की इजाज़त है? वरना फिर इसी तरह की फर्ज़ी बातें शिया सुन्नी संघर्ष को हवा देती रहेंगी और मुल्क के अमन चैन में आग लगाती रहेंगी। इसी तरह के अक्ल से पैदल छुटभैये मुल्ला आतंकवादी पैदा करते हैं। इनसे बचने के लिये अपने आँख कान खुले रखना बहुत ज़रूरी है। 

झूठी इल्ज़ाम तराशी करने वालों के लिये कुरआन कह रहा है :
(सूरे अहज़ाब आयत 58) और जो लोग ईमानदार मर्द और ईमानदार औरतों पर तोहमत लगाकर अज़ीयत देते हैं तो वह एक बोहतान और सरीह गुनाह का बोझ उठाते हैं।
(सूरे हुजुरत आयत 12) ऐ ईमानदारों बहुत से गुमान से बचे रहो। क्योंकि बाज़ बदगुमानी गुनाह है।

Saturday, July 13, 2013

इंसान और कुत्ते में कोई फर्क नहीं

नाइस। देश में एक राज्य ऐसा है जहां इंसान और कुत्ते में कोई फर्क नहीं समझा जाता। और अब हमें पूरे देश को ऐसा ही बनाना है।

Wednesday, July 14, 2010

कुरआन की आयतों का अक्सर लोग गलत मतलब निकालते हैं.

कुरआन की आयतों का अक्सर लोग गलत मतलब निकालते हैं. और फिर कहते हैं की इसमें गलतियां हैं. यकीनन पूरे कुरआन का इल्म हर एक को नहीं हासिल है जिसकी वजह से लोग अक्सर शक में मुब्तिला हो जाते हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि कुरआन हर लिहाज से अल्लाह का कलाम है। और जिस तरह अल्लाह की बनाई दुनिया राजों से भरी हुई है लेकिन उन राजों से परदा उठाने के लिये गौरो फिक्र जरूरी है उसी तरह कुरआन के बारे में भी गौरो फिक्र तमाम शक व शुबहात को दूर कर देती है।
हमारी अंजुमन पर मेरे लेख
'क्या कुरआन में गलतियां हैं?' की तीसरी किस्त पढ़ें.

Wednesday, June 30, 2010

ये आपकी अक्ल का कुसूर है कि आपको कुरआन में गलती दिखी.

लोग कुरआन की आयतों का अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर मतलब पेश करते हैं. और यह सोचकर चौड़े हो जाते हैं की उन्होंने अल्लाह की किताब में कमी निकाल दी. लेकिन क्या यह सच है?

कुरआन अल्लाह का कलाम है. सारी चीज़ें भी अल्लाह की बनाई हुई हैं. और उनको देखने के लिए रोशिनी भी अल्लाह की बनाई हुई है. जब हम किसी चीज़ को देखते हैं तो कहते हैं वह चीज़ दिख रही है. जबकि हकीकत यह है की हमें कोई चीज़ नहीं दिखती बल्कि हम सिर्फ उन इलेक्ट्रिक सिग्नल्स को महसूस करते हैं जो रौशनी के ज़रिये हमारी आँख तक आई उस चीज़ की इमेज से पैदा होकर दिमाग तक पहुँचते हैं. तो जब अल्लाह का बनाया हमारे देखने का सिस्टम तक स्ट्रेट फारवर्ड नहीं है तो अल्लाह का कलाम कहा से स्ट्रेट फारवर्ड हो जाएगा की आप सिर्फ उसका तर्जुमा पढ़कर निष्कर्ष निकाल लें? निष्कर्ष निकालने के लिए उसमे आस्था रखकर मन की आँखें खोलनी ही पड़ेंगी. इस बारे में यह लेख आपकी मदद कर सकता है.

Sunday, November 29, 2009

हर्फ़-ए-ग़लत की छठी पोस्ट का जवाब

अपने को मोमिन बताने वाले इन महाशय ने अपनी नई पोस्ट में एक हदीस लेकर आये हैं. जिसके अनुसार रसूल मोहम्मद (स.) की अपने सहाबी हज़रत अबुज़र से सूरज के डूबने के बारे में बातचीत है. जो आधुनिक साइंस के एतबार से ग़लत है. लिहाज़ा मोमिन महाशय ने फतवा दे दिया की  पैगम्बर मोहम्मद (स.) लाल बुझक्कड़ थे. हालांकि इसके फ़ौरन बाद ही अपनी पोस्ट में अनजाने में मोमिन मियां ने इसका खंडन भी कर दिया. जब उन्होंने एक मौलवी की नशे के बारे में हदीस सुना दी, जो महाशय के अनुसार उसने खुद ही गढ़ ली थी. तो महाशय से मैं पूछना चाहूँगा की चौदह सौ साल बाद जब एक मौलवी कुछ कह रहा है तो आपको उसकी हदीस पर एतबार नहीं. तो फिर आपने सूरज के बारे में  पैगम्बर मोहम्मद (स.) की हदीस पर कैसे यकीन कर लिया की यह उसी रूप में है जिस रूप में मोहम्मद साहब ने हज़रत अबूज़र से फरमाया था? चौदह सौ सालों में लाखों ज़ुबानों से होती हुई जो हदीस आप तक पहुँच रही है क्या प्रूफ है की वह शत प्रतिशत सही है? हाँ कुरान के कलाम में आप कुछ ढूढकर लायें तो कुछ बात है.

इसके बाद महाशय कहते हैं "" और उन से कहा गया आओ अल्लाह की रह में लड़ना या दुश्मन का दफ़ीअ बन जाना। वह बोले कि अगर हम कोई लडाई देखते तो ज़रूर तुम्हारे साथ हो लेते, यह उस वक़्त कुफ़्र से नजदीक तर हो गए, बनिस्बत इस हालत के की वह इमान के नज़दीक तर थे।"सूरह आले इमरान ३ तीसरा परा आयात (168) ये जज़्बाए जेहाद ओ क़त्ताल ओ जंग और लूट मार जज़्बए ईमाने इस्लामी का अस्ल है.  मुहम्मद पुर अमन किसी बस्ती पर हमला करने के लिए लोगों को वर्गाला रहे हैं, जिस पर लोगों का माकूल जवाब देखा जा सकता है जिसे मुहम्मद उनको कुफ्र के नज़दीक बतला रहे हैं. "

तो फर्जी मोमिन मियाँ, आपने अधूरी आयत का अधूरा तर्जुमा लेकर पैग़म्बर को आतंकवादी घोषित कर दिया. थोडा इन्साफ से काम लेते हुए पूरी आयत तो पढ़ी होती जिसका तर्जुमा इस तरह है.  "जिस दिन दी गिरोहों की मुठभेड़ हुई तो वह खुदा के हुक्म से थी इस वास्ते की मोमिनों को जान ले और उन् को भी जान ले जो मुनाफ़िक़ हो गए थे, और उन् से जब कहा गया की आओ खुदा की राह में लड़ो या बचाओ ही करो तो कहने लगे अगर पहले से हम को लड़ाई की खबर होती तो हम तुम्हारी पैरवी ही न करते. इस दिन वह ईमान की बा निस्बत कुफ्र के ज्यादा करीब थे.  इस आयत से यह साफ़ हो जाता है की कुछ लोग व्यक्तिगत फायेदा हासिल करने के लिए मुंह से मुसलमान हो गए थे. लेकिन जब दुश्मनों का हमला हुआ तो बहाना बनाकर पीछे हट गए. मिसाल के तौर पर अगर हमारे देश पर हमला हो और सेना के कुछ लोग यही जुमला कह कर पीछे हट जाएँ तो देश को उनके साथ क्या सुलूक करना चाहिए? इसके बाद भी अल्लाह और मोहम्मद (स.) की रहमत देखिये की उन्हें इस्लाम से बाहर नहीं किया. सिर्फ इतना कहा की वह ईमान से थोडा दूर हो गए हैं.

अगली आयत में मगरमच्छ के आंसू बहाने वालों को अल्लाह खबरदार कर रहा है और मोमिन मियां उसे ज़ख्मों पर नमक छिड़कना   देख रहे हैं. शायद ये उस वक़्त की जंग में मौजूद थे या फिर वो मुनाफिक इनके बाप दादाओं में शामिल थे.

और  अंत में (चूंकि बीच की पोस्ट में सिर्फ बकवास है.)  वह तर्जुमे को लेकर ही चकरा गए, "तुझ को इस शहर में काफिरों का चलना फिरना मुबालगा में न डाल दे. चंद दिनों की बहार है, फिर उनका ठिकाना दोज़ख होगा और वह बुरी आराम की जगह है." महाशय , इसी आयत का एक तर्जुमा ये भी है, "जो लोग काफिर हो गए, उन् की शहर बा शहर की आमद रफत तुम को हरगिज़ धोखे में न डाले. ये चाँद रोज़ा है, फिर उन् का ठिकाना जहन्नुम है, और वह बहुत ही बुरा ठिकाना है." (Translated by Maulana Maqbool Ahmad) लीजिये 'आराम' शब्द हट गया.

Friday, November 27, 2009

हर्फ़-ए-ग़लत के सही जवाब

इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो अपनी पैदाइश से ही दुश्मनों से घिरा रहा. आज भी स्थिति अलग नहीं है. ज़ाहिर है की फिर हिंदी ब्लॉग जगत इससे अछूता कैसे रह सकता है. एक महाशय हाल ही में नकली नाम के साथ यहाँ नमूदार हुए हैं और कुरानी आयतों की ग़लत सलत व्याख्या करके मुस्लिम और गैर मुस्लिम दोनों को अपने हर्फ़-ए-ग़लत से बरगलाने की कोशिश कर रहे है. आइये देखते हैं उनकी पांचवीं पोस्ट जिसमें वह कुरान के दो अक्षर पढ़कर अपने को काबिल समझते हुए क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं.
"मुसलमानों! सोचो अचानक मुहम्मद किसी अदभुत अल्लाह को पैदा करते है, उसके फ़रमान अपने कानों से अनदेखे फ़रिश्ते से सुनते हैं और उसको तुम्हें बतलाते है। वोह अल्लाह सिर्फ़ २३ सालों की जिंदगी जिया, न उसके पहले कभी था, न उसके बाद कभी हुवा।"
जनाब को शायद यह नहीं पता की अल्लाह ने हज़रत आदम से लेकर पूरे एक लाख चौबीस हज़ार पैगम्बरों से कलाम किया है. जिसमें ईसाइयों के पूज्य हज़रत ईसा, यहूदियों के पूज्य हज़रत मूसा, इब्राहीम, हज़रत नूह (Noah) जैसे तमाम नबी शामिल हैं. मुहम्मद (स.) के बाद भी अल्लाह का कलाम ख़त्म नहीं हुआ. इतिहास में हैं की अल्लाह ने तमाम वलियों और इमामों से कलाम किया है.
"----मगर काफ़िरों के लिए नफ़रत में अज़ाफा हो जाता है अल्लाह इन से नफ़रत के पाठ कैसे पढाता है, देखिए - -
" हाँ तुम ऐसे हो कि उन लोगों से मुहब्बत रखते हो और वोह लोग तुम से असला मुहब्बत नहीं रखते, हालां कि तुम तमाम किताबों पर ईमान रखते हो और ये लोग जो तुम से मिलते हैं कह देते हैं ईमान ले आए और जब अलग होते हें तो तुम पर अपनी उँगलियाँ काट काट खाते हैं, मरे गैज़ के.आप कह दीजिए की तुम मर रहो अपने गुस्से में."
इस आयत में उन महाशय को अल्लाह नफरत का पाठ पढ़ाते हुए दिखाई दे रहा है. जबकि कोई थोड़ी सी भी अक्ल रखने वाला इस आयात में देख सकता है की अल्लाह उन लोगों से सावधान कर रहा है जो मुंह पर कुछ और होते हैं और दिल से कुछ और.
"इस सूरह में शुरूआती इस्लामी जंगो का तज़करा है. पहली जंग बदर में हुई थी जिसमे मुसलमानों को फ़तह मिली थी और दूसरी जंग ओहद में हुई थी जिस में शिकस्त. फ़तह वाली जंग में अल्लाह ने मुसलमानों को मदद के लिए ३००० फ़रिश्ते भेज दिए थे. जंगे ओहद जो कि बकौल अल्लाह के मुहम्मद कि रज़ा के खिलाफ लड़ी गई थी, इस लिए फरिश्तों कि मदद नहीं आई "
तो अब महाशय ऐतिहासिक तथ्य भी नहीं जानते. मोहम्मद साहब (स.) के दौर की किसी भी जंग में मुसलमानों को शिकस्त नहीं हुई थी. ओहद में बस इतना हुआ था की कुछ मुसलमान माले ग़नीमत हासिल करने के चक्कर में पहरे से हट गए थे. नतीजे में दुश्मन को थोड़ी देर के लिए मौका मिल गया था. लेकिन बाद में मुसलमान फिर हावी हो गए थे. अगर मुसलमान हार जाते तो फिर मोहम्मद (स.) जिंदा न बचते.
"क्या उसके बाद अल्लाह को साँप सूँघ गया कि स्वयम्भू अल्लाह के रसूल की मौत के बाद उसकी बोलती बंद हो गई और जिब्रील अलैहिस्सलाम मृत्यु लोक को सिधार गए ? उस महान रचना कार के सारे काम तो बदस्तूर चल रहे हैं, मगर झूठे अल्लाह और उसके स्वयम्भू रसूल के छल में आ जाने वाले लोगों के काम चौदह सौ सालों से रुके हुए हैं, मुस्लमान वहीँ है जहाँ सदियों पहले था, उसके हम रकाब यहूदी, ईसाई और दीगर कौमें आज हम मुसलमानों को सदियों पीछे अतीत के अंधेरों में छोड़ कर प्रकाश मय संसार में बढ़ गए हैं."
महाशय, ये आपसे किसने कह दिया की दूसरी कौमें मुसलमानों से आगे है. अगर बात की जाए सभ्यता और समाज की तो विकसित देश इसमें बहुत पीछे है. क्या आपको मालूम है की दुनिया में सबसे ज्यादा मुजरिम अमेरिका में पैदा हो रहे हैं? जेलों को भरने में वह अव्वल नंबर है? ग्लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा ज़िम्मेदार कौन है? अरब के मुसलमान किस बात में दूसरों से पीछे हैं? क्या वह गन्दगी में जी रहे हैं? या भूखों मर रहे हैं?