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Monday, August 26, 2013

क्या न्यूटन भी मुसलमान था?

---जीशान हैदर जैदी 

जब मैंने ठोस तथ्यों द्वारा सिद्ध किया कि आइंस्टीन ने इस्लाम कुबूल कर लिया था तो कुछ लोगों की व्यंगात्मक प्रतिक्रिया आयी कि अब न्यूटन और गैलीलियो के भी मुसलमान होने की खबर आने वाली है।
जहाँ तक न्यूटन का सवाल है, मैं उसके मुसलमान होने का दावा तो नहीं करता, लेकिन ये दावा ठोस ऐतिहासिक तथ्यों के साथ ज़रूर कर सकता हूं कि उसकी धार्मिक व वैज्ञानिक सोच पूरी तरह इस्लाम से प्रभावित थी। और ये होना कोई आश्चर्य की बात भी नहीं क्योंकि सोलहवीं व सत्रहवीं शताब्दी में इस्लाम के गोल्डेन पीरियड(1) में हुई साइंसी तहक़ीक़ात यूरोप तक पहुंच चुकी थीं और इस्लामी मान्यताएं भी। इन ही इस्लामी तहक़ीक़ात के द्वारा यूरोप के ज्ञान चक्षु खुले और वे बाद में इस्लाम को बैकवर्ड कहने के क़ाबिल हो गये। वास्तव में सोलहवीं व सत्रहवीं शताब्दी के तमाम यूरोपियन विचारकों व वैज्ञानिकों पर इस्लाम का प्रभाव स्पष्ट रूप से नज़र आता है।
तो पहले बात करते हैं न्यूटन की धार्मिक मान्यताओं के बारे में।
यह सर्वमान्य तथ्य है कि न्यूटन नास्तिक नहीं था। जब उसने गति के नियम व गुरुत्वाकर्षण की खोज की तो उसने साथ में ये भी कहा (2) कि ''इससे ये न समझना चाहिए कि यूनिवर्स किसी आटोमैटिक मशीन की तरह है। ग्रैविटी ग्रहों की गति की व्याख्या करती है लेकिन इससे इसकी व्याख्या नहीं हो सकती कि ग्रहों की गति को किसने निर्धारित किया है। खुदा ही इन सबका निर्धारण करता है और जानता है कि क्या हो रहा है और क्या हो सकता है। न्यूटन के अनुसार यूनिवर्स को सुचारू रूप से चलाने के लिये खुदा की ज़रूरत हमेशा होती है।(3)
उसके उपरोक्त कथन से ये भी ज़ाहिर होता है कि वह एकेश्वरवादी था। अधिकतर इतिहासकार भी उसे एकेश्वरवादी मानने पर सहमत हैं।(4)(5)
न्यूटन यहूदी भी नहीं था। क्योंकि वह बाइबिल को भी मानता था और जीसस को भी। इस तरह अंतिम तौर पर यही कहा जा सकता है कि या तो वह क्रिश्चियन था या फिर इस्लामी मान्यताओं में विश्वास करता था। बहुमत उसे क्रिश्चियन मानता है, लेकिन मज़े की बात ये है कि वह बहुत सी ईसाई मान्यताओं पर विश्वास ही नहीं करता था। इसीलिए इतिहासकार उसे धर्म विरोधी (Heretic) कहते हैं।(4)
ईसाई  मान्यता व इस्लामी विश्वास में एक प्रमुख अंतर ये रहा है कि ईसाई जीसस क्राइस्ट (ईसा मसीह) को खुदा का बेटा मानते हैं और उन्हें भी खुदा की ही तरह पूजते हैं। जबकि इस्लाम में ईसा मसीह को अल्लाह का नबी माना जाता है। अब न्यूटन की नज़र में जीसस क्राइस्ट को खुदा की तरह पूजना मूर्ति पूजा के बराबर है और एक बड़ा गुनाह है। अक्सर इतिहासकारों ने न्यूटन की इस सोच की पुष्टि की है। यहाँ पर  न्यूटन का झुकाव इस्लामी सोच की तरफ स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। (6)
इतिहासकार स्टीफन डी स्नोबेलेन न्यूटन के धर्म के बारे में निष्कर्ष पर पहुंचते हुए कहता(4) है कि ''आइज़क न्यूटन धर्म विरोधी था। लेकिन उसने अपने इस विश्वास को सार्वजनिक नहीं किया था। वह अपनी मान्यताओं को इस तरह छुपाये रखने में कामयाब हुआ कि आज भी शोधकर्ता उसके व्यक्तिगत विश्वासों को बेनकाब नहीं कर सके हैं। स्नोबेलेन के अनुसार न्यूटन शायद एरियन था, लेकिन पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि वह प्रमुख ईसाई मान्यता ट्रिनिटी में विश्वास ही नहीं करता था।
जहाँ तक एरियन मान्यता की बात है तो उसमें जीसस क्राइस्ट को खुदा का बेटा नहीं माना जाता बल्कि ये माना जाता है कि खुदा ने जीसस क्राइस्ट को उसी तरह क्रियेट किया है, जिस तरह तमाम मख्लूक़ात को।(7) इस्लाम भी इस मान्यता का समर्थन करता है।  
यहाँ ये बात गौरतलब है कि अगर ईसाईयत से ट्रिनिटी की मान्यता हटा दी जाये और जीसस क्राइस्ट को खुदा का बेटा न माना जाये तो इस्लामी तौहीद (एकेश्वरवाद) व ईसाई मान्यता में कोई फर्क नहीं रह जाता। इस्लामी मान्यता में जीसस क्राइस्ट को अल्लाह का नबी माना जाता है न कि बेटा।
इस्लाम में बाइबिल बाइबिल में संकलित तौरात, ज़बूर और इंजील को कुरआन की ही तरह आसमानी किताब माना जाता है. लेकिन साथ ही ये भी माना जाता है कि इन किताबों बाइबिल में कई बदलाव हो चुके हैं और ये उस असली बाइबिल से अलग है जो हज़रत ईसा (जीसस) ने दुनिया के सामने पेश की थी।
न्यूटन भी बाइबिल को आसमानी किताब मानता था। उसने बाइबिल का गहराई से अध्ययन किया और उसमें छुपे हुए तथ्यों की खोज करने की नाकाम कोशिशें भी कीं। लेकिन साथ ही उसने इसकी भी प्रबल संभावना व्यक्त की कि बाइबिल में बदलाव हुए हैं । बल्कि उसने बाइबिल के कुछ बदलावों की तरफ लोगों का ध्यान  भी आकृष्ट किया।(8)
न्यूटन के ज़हन में खुदा का क्या तसव्वुर था इस बारे में जानना भी रोचक है। वह अपनी किताब प्रिंसिपिया में लिखता है, ''खुदा वक्त या जगह से बंधा हुआ नहीं है। वह ठोस है और उपस्थित  है। वह हमेशा से है और हर जगह मौजूद है। वह वक्त और जगह का सृजनकर्ता है। वह किसी भी वस्तु जैसा नहीं और न ही उसका कोई जिस्म है।
हम देखते हैं कि न्यूटन के ज़हन में खुदा का वही तसव्वुर है जो कि इस्लाम में अल्लाह का है। जैसा कि इमाम अली(अ.) नहजुलबलाग़ा में अल्लाह के बारे में फरमाते हैं,(9) ''न उस के लिए कोई वक्त है जिस की गणना की जा सके। न उस का कोई टाइम है जो कहीं पर पूरा हो जाये। उस ने कायनात को अपनी कुदरत से पैदा किया। उसकी पहचान निराकारता है और निराकारता का कमाल है कि उससे गुणों को नकारा जाये। और जिसने यह कहा कि वह किसी चीज़ पर है उसने और जगहें उस से खाली समझ लीं।
वह है, हुआ नहीं। मौजूद है लेकिन आरम्भ से वजूद में नहीं आया। वह हर मख्लूक़ के साथ है लेकिन जिस्मानी मेल की तरह नहीं है। वह हर चीज़ से अलग है लेकिन जिस्मानी दूरी की तरह से नहीं।
इमाम अली रज़ा(अ.)(10) पैगम्बर मोहम्मद(स.) की हदीस बयान करते हैं, 'उसने अल्लाह को नहीं पहचाना जिसने उसकी बनायी मख्लूक़ जैसा उसे तसव्वुर कर लिया। गौरतलब है कि उसकी बनायी मख्लूक़ में इंसान, जानवर, जानदार, बेजान, मैटर, एनर्जी सभी कुछ शामिल हैं।
और अब बात करते हैं न्यूटन की कुछ वैज्ञानिक खोजों पर। न्यूटन की तमाम वैज्ञानिक खोजों में भी इस्लामी मान्यताओं का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
मसलन न्यूटन ने एक महत्वपूर्ण खोज ये की है कि सफेद रौशनी दरअसल कई रंगों की रोशनियों का समूह होती है। इन्द्रधनुष के बनने के पीछे भी यही थ्योरी काम करती है। जब सूरज की सफेद किरणें हवा में मौजूद पानी की बूंदों से रिफ्लेक्ट होती हैं तो उनमें मौजूद अलग अलग रंग अलग अलग दिखाई देने लगते हैं। इसी तरह जब सफेद रंग की रौशनी  किसी प्रिज्म से गुजारी जाती है तो अलग अलग रंग दिखाई  देने लगते हैं।
सफेद रंग के बारे में ये हक़ीक़त मौजूद है हज़ार साल पुरानी शेख  सुददूक की लिखी किताब 'अल-तौहीद में । इस किताब में महान इस्लामी विद्वान इमाम जैनुल आबिदीन (अ.स.) का एक कथन कुछ इसी तरह दिया हुआ है। इमाम जैनुल आबिदीन (अ.स.) हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.) के बेटे थे। इमाम जैनुल आबिदीन(अ.स.) का कथन इस तरह है कि(11) ''....अल्लाह ने अर्श की खिलक़त से पहले तीन चीज़ें हवा, क़लम और नूर (रौशनी) को पैदा किया। फिर अर्श को मुख्तलिफ अनवार (प्रकाश्पुन्जों) से खल्क किया। उस नूर में एक सब्ज़(हरा) नूर है जिससे सब्ज़ी सरसब्ज़ हुई । और एक जर्द (पीला) नूर है जिससे जर्दी सुनहरी बनी। और एक सुर्ख (लाल) नूर है जिससे सुर्खी सुर्ख हो गयी। और एक सफेद नूर है और वही तमाम अनवार का नूर है और उसी से दिन की रौशनी है।.....”
उपरोक्त कथन के अंतिम हिस्से में कहा गया है कि 'एक सफेद नूर है और वही तमाम अनवार का नूर है। मतलब साफ है कि सफेद रंग में सारे रंग शामिल हैं। यानि न्यूटन की उपरोक्त खोज इस्लामी सोच से ही निकल कर सामने आयी।
न्यूटन के नाम एक और उपलब्धि ये दर्ज है कि उसी ने सबसे पहले साइंटिफिक लाजिक या साइंटिफिक सोच को परिभाषित किया। वैज्ञानिक तर्कशास्त्र की आधारशिला उसने चार नियमों के द्वारा रखी जो इस तरह हैं,
1. किसी प्राकृतिक घटना के पीछे एक और केवल एक पूर्ण सत्य कारण होता है। 2. एक तरह की घटनाओं के लिये एक ही तरह के कारण होते हैं। 3. वस्तुओं के गुण सार्वत्रिक रूप से हर जगह समान होते हैं। 4. किसी घटना से निकाले गये निष्कर्ष तब तक सत्य मानने चाहिए जब तक कि कोई अन्य घटना उन्हें गलत न सिद्ध कर दे।
न्यूटन के बताये हुए ये उसूल आज भी साइंटिफिक रिसर्च में रौशनी की हैसियत रखते हैं। हालांकि इनमें से उसूल नं. तीन को आज की साइंस कुछ हद तक नहीं मान रही है क्योंकि आज की साइंस के मुताबिक हम एक मल्टीवर्स में हैं जिनमें बहुत से यूनिवर्स हैं और दूसरे यूनिवर्सेस में फिजिक्स के नियम बदल जाते हैं तो जाहिर है चीज़ों के गुण भी बदल जायेंगे। इसी तरह उसूल नं. चार भी चूंकि अंदाज़े पर आधारित है इसलिए इसे भी पूरी तरह सही नहीं मानना चाहिए। अब बाकी बचते हैं उसूल एक और उसूल दो। यानि किसी भी प्राकृतिक घटना के पीछे एक और सिर्फ एक वजह होती है।
पुन: कुछ पुरानी इस्लामी किताबों को खंगालने पर ये सच्चाई सामने आती है कि न्यूटन से बहुत पहले इस्लामी विद्वान साइंटिफिक उसूलों की बुनियाद निहायत मज़बूती से रख चुके थे।
हज़रत याकूब कुलैनी (अ.र.) की किताब उसूले काफी आज से ग्यारह सौ साल पहले लिखी गई किताब है यानि न्यूटन से छह सौ साल पहले की।
उसूले काफी में दर्ज हदीस(12) के मुताबिक इमाम जाफर सादिक (अ.स.) ने फरमाया, ''खुदा ने तमाम अशिया को असबाब से जारी किया है और हर शय का एक सबब करार दिया है। और हर सबब की एक शरह है और हर तशरीह के लिये एक इल्म है और हर इल्म के लिये एक बाबे नातिक है जिसने उनको जाना उसने मआरफत हासिल कर ली और जो जाहिल रहा वह जाहिल रहा, और ये इल्म वाले रसूल अल्लाह (स.) हैं और हम।
इस तरह इमाम जाफर सादिक (अ.स.) साफ साफ यह उसूल बता रहे हैं कि दुनिया में हर घटना (जिनमें कुदरती घटनाएं भी शामिल हैं।) और हर चीज़ की पैदाइश के पीछे एक सबब यानि कि कारण है। और कारण की एक व्याख्या (explanation) है। और उस व्याख्या को करने के लिये एक ज्ञान है। उस ज्ञान तक पहुंचने के लिये एक दरवाज़ा है (आज के दौर में यही साइंस है।) उस ज्ञान तक पहुंचने के लिये उस दरवाजे की मदद लेनी पड़ती है। इसके आगे इमाम जाफर सादिक (अ.स.) कह रहे हैं कि मोहम्मद (स.) और आले मोहम्मद(अ.) इन उलूम के दरवाजे हैं। और यह सच्चाई भी है क्योंकि हम देख रहे हैं कि जिस ज्ञान को यूरोप वाले अपनी खोज बता रहे हैं उनका सिलसिला कहीं न कहीं मोहम्मद (स.) व आले मोहम्मद(अ.) से जुड़ा हुआ है। यहां तक कि साइंस के बुनियादी उसूल भी यहीं पर पहली बार मिलते हुए दिखाई दे रहे हैं। जिसको न्यूटन ने यूरोप के सामने प्रस्तुत किया।
न्यूटन की एक और महत्वपूर्ण खोज है गति के नियम। यानि किसी चीज़ की अवस्था में परिवर्तन लाने के लिये ताकत की ज़रूरत हमेशा पड़ती है।
इसी बात को इमाम अली(अ.) चौदह सौ साल पहले निहायत आसान ज़बान में बता रहे हैं। किताब नहजुल बलाग़ा के खुत्बा नंबर 150 में इमाम अली(अ.) खुदा का जि़क्र करते हुए फरमाते हैं,(13) ''वह पैदा करने वाला है लेकिन न इस मायने में कि उसे हरकत करना और तआब उठाना पड़े।” यानि इस दुनिया में जब भी कोई पैदाइश होती है तो वह किसी हरकत के ज़रिये और कुछ मुश्किलात के बाद होती है। मसलन कोई कुम्हार जब मिटटी का बर्तन बनाता है तो वह गीली मिटटी को नयी शक्ल देता है। इस अमल में उसे उन विरोधी ताकतों के खिलाफ काम करना पड़ता है जो गीली मिटटी को नयी शक्ल देने का विरोध करती हैं। यानि इलास्टिसिटी (Elasticity) व इनर्शिया (Inertia) जैसी ताकतें। इस तरह की तमाम विरोधी ताकतें हर तरह की पैदाइश में काम दिखाती हैं और जब तक इनके खिलाफ 'काम न किया जाये तब तक नयी पैदाइश नहीं होती। यानि विरोधी ताकतों के खिलाफ काम करना होता है और साथ में हरकत करनी होती है यानि एनर्जी खर्च करनी पड़ती है। लेकिन अल्लाह इन दोनों बातों से बरी है। क्योंकि वह विरोधी ताकतों का भी खालिक़ है और एनर्जी का भी। इसलिए कोई भी ताकत उसके विरोध में नहीं हो सकती और न ही वह अलग से अपनी कोई एनर्जी खर्च करता है। उसे ऐसा करने की ज़रूरत ही नहीं।
जबकि मख्लूक़ जब भी किसी पैदाइश के अमल से गुज़रती है तो हमेशा उसे विरोधी ताकतों के खिलाफ हरकत करनी पड़ती है और काम करना पड़ता है। फिजि़क्स का यही उसूल तारीख में न्यूटन के नाम के साथ दर्ज है इन अलफाज़ के साथ, 'किसी चीज़ की हालत में तब तक तब्दीली नहीं होती जब तक कि उसपर बाहरी ताकत न लगायी जाये। दरअसल नयी पैदाइश हालत की तब्दीली का ही नाम है और न्यूटन ने यही उसूल दिया कि हालत की तब्दीली के लिये ताकत लगानी लाज़मी है। अगर कोई मख्लूक़ ताकत लगाती है तो उसे हरकत करनी व तआब उठानी पड़ती है। जबकि खुदा इससे बरी होता है। इस तरह न्यूटन ने वही बताया जो इमाम अली(अ.) अपने खुत्बे में कहीं ज्यादा पुख्ता तरीके से न्यूटन से ग्यारह सौ साल पहले बता चुके हैं।
न्यूटन को कैलकुलस का आविष्कारक भी माना जाता है। कैलकुलस गणित की ऐसी शाखा है जिसके बगैर आज साइंस की किसी भी शाखा की तरक्की की कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन इसी कैलकुलस के आविष्कारक के तौर पर न्यूटन व लाइबनिज़ का झगड़ा भी काफी मशहूर हुआ है। आज यूरोप दोनों को ही इसके आविष्कार का क्रेडिट देता है, लेकिन कुछ र्इमानदार अमेरिकन इतिहासकारों के अनुसार न्यूटन से छ: सौ साल पहले जन्मा अरबी मुसिलम वैज्ञानिक अल हैथम (AlHazen) कैलकुलस का उपयोग करते हुए परवलयाकार बर्तन का आयतन निकाल चुका था।(14)  
तो हम कह सकते हैं कि भले ही न्यूटन की पर्सनल धार्मिक मान्यताएं अँधेरे में हों लेकिन यह बात शीशे की तरह साफ है कि उसकी सोच और उसकी साइंस पर इस्लामी मान्यताओं का पूरी तरह प्रभाव था। हो सकता है कि उसने इस्लाम कुबूल कर लिया हो लेकिन जान के खौफ या अन्य कारणों से उसने इसे ज़ाहिर करना उचित न समझा हो। ये भी हो सकता है कि वह समस्त खोजों का क्रेडिट केवल स्वयं को देना चाहता हो, इसलिए इस्लाम के बारे में चुप साध ली हो। क्योंकि उसका इस्लाम के बारे में कहीं कोई कथन नहीं मिलता न तो विरोध में और न ही समर्थन में।  

References :
(1) Islamic Radicalism and Multicultural Politics. Taylor & Francis. p. 9. ISBN 978-1-136-95960-8. Retrieved 26 August 2012.
(2) Tiner, J.H. (1975). Isaac Newton: Inventor, Scientist and Teacher. Milford, Michigan, U.S.: Mott Media. ISBN 0-915134-95-0.
(3) Opticks, 2nd Ed 1706. Query 31.
(4) Snobelen, Stephen D. (1999). "Isaac Newton, heretic: the strategies of a Nicodemite" (PDF). British Journal for the History of Science 32 (4)
(5) Avery Cardinal Dulles. The Deist Minimum. January 2005.
(6) Westfall, Richard S. (1994). The Life of Isaac Newton. Cambridge: Cambridge University Press. ISBN 0-521-47737-9.
(7)Williams, Rowan (2002). Arius: heresy and tradition. Wm. B. Eerdmans Publishing Co. p. 98. ISBN 978-0-8028-4969-4.
(8) John P. Meier, A Marginal Jew, v. 1, pp. 382–402 after narrowing the years to 30 or 33, provisionally judges 30 most likely.
(9) Nahjul Balagah (saying of Imam Ali a.s.) - Khutba : 1
(10) Kitab Al Tauheed by Sheikh Saduq(a.r), 'Tauheed ka Asbat aur Tashbih ki Nafi'
(11) Kitab Al Tauheed by Sheikh Saduq(a.r), 'Arsh aur Us ki Sifat'
(12) Usool-E-Kafi, Book 2, Part 14 by Sheikh Mohammad Yaqoob Kulaini(a.r)
(13) Nahjul Balagah (saying of Imam Ali a.s.) - Khutba : 150
(14) Katz, Victor J. (1995). "Ideas of Calculus in Islam and India". Mathematics Magazine 68 (3): 163–174. doi:10.2307/2691411

Wednesday, August 14, 2013

जी हाँ! आइंस्टीन ने इस्लाम का शिया मत स्वीकार कर लिया था।


---जीशान हैदर जैदी 

अल्बर्ट आइंस्टीन को दुनिया का महानतम वैज्ञानिक माना जाता है। जिसने रोशनी के मिजाज़ के बारे में बताया कि वह फोटान नामी कणों की शक्ल में होती है, रिलेटिविटी जैसा महान नज़रिया दुनिया के सामने पेश किया और एनर्जी व द्रव्यमान की मशहूर समीकरण को दरियाफ्त किया। अगर दुनिया के जीनियस इंसानों की कोई भी लिस्ट बनायी जाती है तो उसमें आइंस्टीन का नाम सबसे ऊपर रखा जाता है। बल्कि अगर किसी को जीनियस कहना होता है तो उसे आइंस्टीन कहकर बुलाया जाता है।

लेकिन जब इस जीनियस साइंटिस्ट के मज़हब के बारे में कोई सवाल उठता है तो इस सवाल का कोई तसल्लीबख्श जवाब नहीं दे पाता। कुछ लोग उसे यहूदी ख्याल करते हैं क्योंकि उसकी पैदाइश एक यहूदी घराने में हुई थी। लेकिन आम तौर पर उसे नास्तिक ही ख्याल किया जाता है जो खुदा, गॉड या ईश्वर में यकीन ही नहीं करता था। इसके पीछे उसका बहुत मशहूर स्टेटमेन्ट कोट किया जाता है जिसमें उसने किसी पर्सनल खुदा के मानने से इंकार किया है। अगर आइंस्टीन के कुछ और कथनों को देखा जाये तो अलग अलग बातें ज़ाहिर होती हैं। अगर आइंस्टीन की गोल्डस्टीन से 1929 की एक बातचीत का सन्दर्भ लिया जाये तो उसके मुताबिक वह बरूच स्पईनोज़ा के पैन्थीस्टिक (pantheistic) खुदा में यकीन करता है।(1) फिर 1950 के एक पत्र में उसने अपने को संशयवादी (agnostic) कहा यानि उसे नहीं पता कि खुदा का वजूद है या नहीं।(2) वैसे यह स्पष्ट है कि वह नास्तिक नहीं था जो कि खुदा के वजूद से पूरी तरह इंकार करते हैं। लेकिन अब कुछ भरोसेमन्द सूत्रों(3)(4)(5)(6) से यह पूरी तरह साफ हो गया है आइंस्टीन ने इस्लाम का शिया मत स्वीकार कर लिया था।

मार्च 2012 में ईरानी न्यूज़ एजेंसी IRIB (24 / 9) ने एक ऐसी खबर नशर की जिसने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। इस खबर के मुताबिक आइंस्टीन ने अपने जीवन के बाद के दौर में इस्लाम का शिया मत स्वीकार कर लिया था। आइरिब ने आइंस्टीन के एक कान्फीडेंशल पत्र का सन्दर्भ दिया है। जिससे ये साबित होता है कि उसने न सिर्फ इस्लाम का शिया मत स्वीकार किया था बल्कि उसके सापेक्षकता (relativity) जैसे साइंसी सिद्धान्तों में बहुत से संशोधन भी इस्लामी थियोलोजी के ज़रिये ही उभरकर आये थे और खुद आइंस्टीन ही के अनुसार उसके सिद्धान्त कुरआन व नहजुलबलाग़ा जैसी इस्लामी किताबों में मौजूद हैं।

उपरोक्त खबर में संदर्भित पत्र आइंस्टीन ने महान शिया आलिमे दीन आयतुल्लाह अल सईद उज़मा हुसैन बोरोजर्दी (Ayatollah Al-Sayid Udzma Hossein Boroujerdi) को लिखा है। ये पत्र 1954 में लिखे गये उसके एक मोनोग्राफ में शामिल है जो कि आइंस्टीन की आखिरी तहरीर मानी जाती है। इस पत्र में कहा गया है कि, ''चालीस बार की खतो किताबत में इस्लामी उसूलों व साइंस पर आपके साथ जो गहरी बातचीत हुई उसके बाद अब मैं इस्लाम व इमाम के शिया अशना अशरी (12 इमामों को मानने वाले शिया) मत को स्वीकार करता हूं।

आइंस्टीन ने अपने पत्र में लिखा है कि इस्लाम दूसरे मज़हबों से ज्यादा मज़बूत बुनियाद रखता है और सर्वाधिक परिपूर्ण व तर्कसंगत मज़हब है। आगे आइंस्टीन कहता है कि, ''अगर पूरी दुनिया मुझे इस महान विश्वास से डिगाने की कोशिश करे तो भी वह मेरे दिल में अविश्वास का छोटा सा धब्बा भी नहीं बना सकती।("If the whole world trying to make me upset with this sacred belief, surely they would not be able to do so even if only to whip out a speck of doubt to me.")

आइंस्टीन ने अपना ये अंतिम मोनोग्राफ 1954 में जर्मन भाषा में डी एर्कलारंग (Die Erklarung -Declaration) नाम से लिखा है। इस मोनोग्राफ में उसने अपने शिया होने की बात कुबूल करते हुए लिखा कि रिलेटिविटी थ्योरी को कुरआन की आयतों व नहजुल बलाग़ा में दर्ज इमाम अली(अ.स.) के खुत्बों की रोशनी में फिर से देखना चाहिए। अपने इस पेपर में आइंस्टीन नबी मोहम्मद(स.) की मेराज और इमाम अली(अ.) की आसमानों की सैर का हवाला देते हुए लिखता है कि यूनिवर्स की सैर कुछ सेकंडों में होना मुमकिन है और इंसान व किसी भी जिंदा बदन को एनर्जी में बदला जा सकता है और फिर उसे वापस जिंदगी के साथ ही माददी जिस्म में लाया जा सकता है और इन वाकियात के पीछे शिया हदीसों में साइंटिफिक दलीलें मौजूद हैं जिनका गहराई से अध्ययन करने की ज़रूरत है। उसने इसमें ये भी लिखा है कि अगर उसके रिलेटिविटी के नज़रियात पर फिर से कुरआन व शिया हदीसों की रोशनी में गौर किया जाये तो साइंस में बहुत सी नयी दरियाफ्तें हो सकती हैं।

आइंस्टीन ने शिया आलिम अल्लामा मजलिसी की किताब बिहारुलअनवार में दर्ज हदीस का भी जि़क्र किया है जिसमें नबी(स.) की मेराज के बारे में इस तरह बताया गया है, ''जब नबी(स.) ज़मीन से ऊपर उठे तो उनके कपड़े या पैर के टकराने से बर्तन में भरा पानी छलक उठा। फिर जिस्मानी मेराज के अलग अलग अवक़ात (times) से गुज़रने के बाद नबी(स.) वापस पलटे तो उन्होंने देखा पानी अभी भी छलक रहा है।

आइंस्टीन इस एक हदीस में ही साइंटिफिक ज्ञान का भंडार देखता है क्योंकि उसे इसमें वक्त की रिलेटिविटी और टाइम डायलेशन के पसमंज़र में शिया इमाम की वैज्ञानिक क्षमता दिखाई देती है। आइंस्टीन के मुताबिक मेराज का वाकि़या जिंदा माददे को एनर्जी और फिर एनर्जी को वापस जिंदा माददे में तब्दील होने की एक मिसाल है जिसको वह अपनी पहले की खोज में बता चुका है और जो उसकी मशहूर समीकरण 
E = M.C² के ज़रिये जानी जाती है।

आइंस्टीन का ये अंतिम मोनोग्राफ ज़ाहिर है किसी ने पब्लिश नहीं किया और इसके कुछ ही महीनों बाद यानि 18 अप्रैल 1955 को उसकी संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी। उस समय वह इज्रार्इल की स्थापना दिवस पर एक व्याख्यान तैयार कर रहा था। हो सकता है उसके व्याख्यान में कुछ इस्लाम के फेवर में बातें शामिल रही हों जिसे यहूदियों ने अपने लिये खतरा समझकर उसे क़त्ल दिया हो। ये भी गौरतलब है कि उसी समय में आइंस्टीन के सहयोगी व महान वैज्ञानिक अलैक्ज़ेंडर फ्लेमिंग की भी संदिग्ध मृत्यु (11 मार्च 1955) हुई थी जो कि उपरोक्त मोनोग्राफ को लिखते वक्त उनके साथ ही था। ये वही अलैक्ज़ेंडर फ्लेमिंग है जिसके सर एण्टीबायोटिक की खोज का सेहरा है।

अपने क़त्ल का खतरा आइंस्टीन को पहले से ही था। इसीलिए उसने शुरूआत में ही आयतुल्लाह बोरोजर्दी से ये दरख्वास्त की थी कि उसके पत्र व्यवहार को राज़ में रखा जाये क्योंकि उसे डर था कि अगर उसके इस्लाम कुबूल करके शिया होने की बात या इस्लाम से मुतास्सिर होने की बात खुल गयी तो यहूदी उसे क़त्ल कर देंगे। आयतुल्लाह बोरोजर्दी ने ये वादा मरते दम तक निभाया और ये राज़ उनकी व आइंस्टीन दोनों की मृत्यु के बाद ही खुल पाया। इस खतोकिताबत के दो गवाह आयतुल्लाह बोरोजर्दी के दो शागिर्द भाई भी बने जिनके नाम हैं आयतुल्लाह अली गुलपायदानी और आयतुल्लाह लुत्फुल्लाह गुलपायदानी। इन्होंने भी आइंस्टीन की खतोकिताबत और फिर इस्लाम कुबूल कर शिया होने की तस्दीक की है।

आयतुल्लाह बोरोजर्दी व आइंस्टीन की खत व किताबत में आइंस्टीन के एक ईरानी शिया शागिर्द प्रोफेसर हेसाबी ने अहम रोल अदा किया। प्रोफेसर हेसाबी ने ही आइंस्टीन का तार्रुफ़ आयतुल्लाह बोरोजर्दी से कराया था। प्रोफेसर हेसाबी को ईरान का फादर आफ फिजि़क्स कहा जाता है क्योंकि उन्होंने जदीद ईरान में साइंस व टेक्नालाजी की बुनियाद रखी है।

आइंस्टीन का मृत्यु के बाद उपरोक्त मोनोग्राफ यानि 'डी एर्कलारंग’ एक यहूदी के हाथ लगा जो एण्टीक चीज़ों का डीलर था। उसने इसकी क़ीमत लगायी तीस लाख डालर। उस समय लंदन निवासी प्रोफेसर इब्राहीम महदवी (जन्म 1931) ने इसे हासिल करने की कोशिश की और इस बड़ी रकम के जुगाड़ के लिये फोर्ड व बेंज जैसी बड़ी कार कंपनियों से राब्ता क़ायम किया। इन दोनों जर्मन व अमेरिकन कंपनियों ने प्रोफेसर इब्राहीम की मदद करते हुए दस दस लाख डालर का प्रबंध कर दिया क्योंकि आइंस्टीन जर्मन था और उसने अमेरिका में लंबा अर्सा गुज़ारा था। फिर पाँच लाख डालर कान्कोर्ड ने वैज्ञानिक एण्टोनी लैवोजि़ये की याद में दिये जिसे फ्रांस की क्रांति के समय क़त्ल कर दिया गया था। आइंस्टीन के इस मोनोग्राफ में लैवोजि़ये का नाम भी कई बार आया है। बचे हुए पाँच लाख डालर टाइटेनिक कंपनी ने अपने डूबे हुए जहाज़ के मृतकों की याद में डोनेट किये और इस तरह आइंस्टीन का वह ऐतिहासिक मोनोग्राफ प्रोफेसर इब्राहीम महदवी के हाथ आया।

प्रोफेसर इब्राहीम महदवी ने उपरोक्त मोनोग्राफ की विशेषज्ञों व कम्प्यूटरों द्वारा जाँच करायी जिससे ये कन्फर्म हो गया कि वह मोनोग्राफ आइंस्टीन का ही लिखा हुआ है। प्रोफेसर इब्राहीम महदवी के भाई डाक्टर ईसा महदवी ने उस मोनोग्राफ का फारसी में तरजुमा किया।

बाद में ब्रिटिश हुकूमत ने उस मोनोग्राफ को लंदन में प्रोफेसर महदवी के नाम से ही बने एक सेफ्टी लाकर में रखवा दिया और उसे बाहर निकालने पर रोक लगा दी। इसकी पीछे ‘धार्मिक’ सुरक्षा कारण बताये गये। यकीनन अगर इसे दुनिया के सामने ज़ाहिर कर दिया जाये तो पूरी दुनिया में तहलका मच जाये। उस गुप्त लाकर का लाकर कोड है : B-12-D.E/17-7-V.A.E

उस समय ईरान में भी अंग्रेज़ों की कठपुतली सरकार थी, अत: कोई भी उस मोनोग्राफ को पब्लिक के सामने लाने के लिये ब्रिटिश सरकार पर कोई दबाव नहीं बना सका।

उपरोक्त मोनोग्राफ से ये बात भी ज़ाहिर होती है कि आइंस्टीन ने बहुत सी राजनैतिक बातों में भी आयतुल्लाह बोरोजर्दी की राय ली थी और उन पर अमल भी किया था। मसलन जब उसे नवनिर्मित इज्राइल के राष्ट्रपति पद के लिये आफर दिया गया तो आयतुल्लाह बोरोजर्दी से राय लेने के बाद उसने ये पद स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। उसने आयतुल्लाह बोरोजर्दी की राय से ही दूसरी आलमी जंग के बाद दुनिया में शांति कायम करने के लिये कई क़दम उठाये।

आइंस्टीन ने अपनी खतो किताबत में आयतुल्लाह बोरोजर्दी को हमेशा द ग्रेट बोरोजर्दी कहकर मुखातिब किया है। और अपने इस्लामी शिया शागिर्द प्रोफेसर हेसाबी को भी हमेशा हेसाबी नोबुल कहा है।          
उपरोक्त तमाम सुबूतों के बावजूद हो सकता है किसी के दिमाग में शक बाकी रह गया हो कि भला आइंस्टीन जैसे साइंसदाँ को मज़हब से क्या वास्ता। तो इसके लिये ये ज़रूरी है कि उसके मज़हब के बारे में उन ख्यालात पर गौर किया जाये जिन्हें पूरी दुनिया जानती है और जिनपर कोई विवाद नहीं है।

बहुत से लोग आइंस्टीन को इसलिए नास्तिक कहते हैं क्योंकि उसने पर्सनल खुदा से इंकार किया है। देखते हैं कि उसने पर्सनल खुदा का इंकार किन अलफाज़ में किया है। वह कहता है(7) 'मैं किसी ऐसे पर्सनल गाड का तसव्वुर नहीं कर पाता जो किसी इंसान की जिंदगी और उसके रोज़मर्रा के कामकाज को निर्देशित करता है। या फिर वो जो सुप्रीम जज की तरह किसी सोने की गददी पर विराजमान हो और अपने ही हाथों रचे गये प्राणियों के बारे में फैसला लेता हो। मैं ऐसे ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता जिसके मकसद में हम अपनी ख्वाहिशों के अक्स तलाशते हैं।..... मेरे विचार में इस दुनिया को रचने वाले कुदरती उसूलों के लिये लोगों में सम्मान की भावना पैदा करना और इसे आने वाली पीढि़यों तक फैलाना ही कला और विज्ञान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। मैं एक पैटर्न देखता हूं तो उसकी खूबसूरती में खो जाता हूं। मैं उस पैटर्न के रचयिता की तस्वीर की कल्पना नहीं कर सकता। इसी तरह रोज़ ये जानने के लिये अपनी घड़ी देखता हूं कि इस वक्त क्या बजा है। लेकिन रोज़ ऐसा करने के दौरान एक बार भी मेरे ख्यालों में उस घड़ीसाज़ की तस्वीर नहीं उभरती जिसने फैक्ट्री में मेरी घड़ी बनायी होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि मानव मस्तिष्क फोर डाईमेंशन्स को एक साथ समझने में सक्षम नहीं है, इसलिए वो खुदा का अनुभव कैसे कर सकता है, जिसके समक्ष हज़ारों साल और हज़ारों डाईमेंशन्स एक में सिमट जाते हैं....।

ज़ाहिर है कि आइन्स्टीन का इल्म ऐसे खुदा के वजूद से इंकार करता है जो दुनिया की किसी मख्लूक़ से मुताबिकत रखता हो। उसके इल्म ने उन्हें खुदाओं के उन गलत तसव्वुरात से दूर कर दिया था जो आमतौर पर दुनिया में फैले हुए हैं। मसलन खुदा हाथ पैरों वाला है या कण कण में भगवान है। या खुदा एनर्जी या पावर की कोई शक्ल है। ऐसे तसव्वुरात को इस महान साइंसदाँ ने जब अपने इल्म की कसौटी पर परखा तो उसे ये सब अक्ली नज़रिये से सही नहीं लगा।

फिर इल्म की भी एक हद है जिसे आइंस्टीन आखिरी लाइन में बता रहा है। यानि इंसानी दिमाग तो चारों डाइमेंशन को एक साथ समझने की ही ताकत नहीं रखता, फिर वह ऐसे खुदा का अनुभव कैसे कर सकता है जिसके आगे हज़ारों साल और हज़ारों डाईमेंशन्स एक में सिमट जाते हैं।

हमारे इमामों(अ.) का इल्म भी इससे इत्तेफाक रखता है। दीने इस्लाम में ऐसे खुदा का तसव्वुर करना जायज़ नहीं है जिसमें दुनिया की मख्लूक़ात की झलक नज़र आती है। इमाम अली रज़ा(अ.)(8) पैगम्बर मोहम्मद(स.) की हदीस बयान करते हैं, 'उसने अल्लाह को नहीं पहचाना जिसने उसकी बनायी मख्लूक़ जैसा उसे तसव्वुर कर लिया। गौरतलब है कि उसकी बनायी मख्लूक़ में इंसान, जानवर, जानदार, बेजान, मैटर, एनर्जी सभी कुछ शामिल हैं।

इमाम अली रज़ा(अ.)(8) दूसरी जगह फरमाते हैं, 'अल्लाह को मानने का मतलब है कि उससे सिफात (गुणों) को नकारा जाये (यानि जिस तरह मख्लूक़ात की सिफतों यानि गुणों को बताया जाता है उस तरह उसके लिये नहीं कहना चाहिए) इस मतलब के साथ कि वह सिफत से अलग है। जिसने उसके गुण अलग अलग बयान किये उसने उसको महदूद (सीमित) कर दिया। जिसने महदूद किया, उसने उसको शुमार किया। और जिसने शुमार किया तो उसने उसकी हमेशगी को बातिल कर दिया। जिसने कहा कि वह कैसा है, उसने उसकी शक्ल व सूरत बयान करनी चाही (यानि उसके लिये यह सवाल नहीं पैदा होता कि वह कैसा है)। जिसने कहा कि वह किसी चीज़ पर है, तो उसने उसको उठा लिया। जिसने कहा कि वह कहाँ है, उसने दूसरी जगहों को उससे खाली समझ लिया। जिसने कहा कि वह कबतक है उसने उसको पाबन्दे वक्त कर दिया। वह उस वक्त भी आलिम था जब कुछ मालूम न था और उस वक्त भी खालिक़ था जब कोई मख्लूक़ न थी। वह रब (पालने वाला) है जबकि वह मरबूब (पाला हुआ) नहीं है। वह अल्लाह है जबकि उसका कोई माबूद नहीं। इस तरह हमारे परवरदिगार की तारीफ की जाती है। उसकी ज़ात बहुत बुलन्द है उससे जो तारीफ करने वाले उसकी तारीफ करते हैं।

यानि अल्लाह हर तारीफ यानि परिभाषा से बुलन्द है। कोई भी तारीफ अल्लाह के लिये कामिल नहीं, इसलिए क्योंकि तारीफें हमारी अक्ल के दायरे के भीतर हैं जबकि अल्लाह हर तरह के दायरे से बाहर है।

बहुत सी जगहों पर ये लिखा मिलता है कि आइंस्टीन बरूच स्पईनोज़ा के पैन्थीस्टिक (pantheistic) खुदा को मानता था।

पैन्थीस्टिक (pantheistic) खुदा का कान्सेप्ट ये है कि वह वाहिद स्वयं अस्तित्व रखने वाला (singular self-subsistent) है यानि उसका अस्तित्व वक्त और जगह (space-time) से जुड़ा या उसपर निर्भर नहीं करता। और इस खुदा के लिये ज़ात और विचार अलग अलग अस्तित्व में नहीं होते बल्कि एकीकृत होते हैं। स्पईनोज़ा हेनरी ओल्डेनबर्ग को लिखे खत में कहता है, 'कुछ लोगों के मुताबिक मैं खुदा को नेचर के साथ पहचानता हूं यानि उसे द्रव्यमान या पदार्थ के किसी प्रकार के रूप में लेता हूं। ऐसे लोग गलती पर हैं।(9) स्पईनोज़ा के लिये हमारा यूनिवर्स एक ऐसा सिस्टम है जो विचार व विस्तार के अन्तर्गत है। खुदा के अनन्त ऐसे गुण हैं जो हमारी दुनिया में मौजूद नहीं। जर्मन फिलास्फर कार्ल जैस्पर्स के मुताबिक स्पईनोज़ा के फिलास्फिकल सिस्टम में कहा गया है कि खुदा या कुदरत (God or Nature) तो इसका ये मतलब नहीं कि खुदा या कुदरत पर्यायवाची हैं, बल्कि खुदा का उत्कर्ष अनन्त गुणों द्वारा अभिप्रमाणित होता है, और उनमें से दो गुण विचार और विस्तार जिनका मनुष्य को ज्ञान है वे खुदा के प्रभुत्व की पुष्टि करते हैं।(10) लेकिन खुदा को अपनी दुनिया में उपरोक्त गुणों यानि विचार व विस्तार द्वारा पहचाना नहीं जा सकता। यह दुनिया विभाज्य है यानि इसे गिनती में लिया जा सकता है। स्पईनोज़ा कहता है कि किसी वस्तु का कोई गुण तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक कि वह विभाज्य न हो। और वह चीज़ जो कि परम अनन्त है, वह अविभाज्य होगी।(11) पैंथीस्ट फार्मूला 'एक और सब’ में 'एक वाहिद व बेमिसाल के तौर पर होता है जबकि 'सब’ दुनिया की तमाम सीमित या महदूद चीज़ों के कुल से अलग और ज़्यादा को कहेंगे। तो इस मायने में खुदा ''एक और सब” है।

देखा जाये तो बरूच स्पईनोज़ा ने खुदा का जो कान्सेप्ट दुनिया के सामने पेश किया है वह लगभग (पूरी तरह नहीं) इस्लामी तौहीद के मिस्ल है और खास तौर से शीया आलिमाने दीन की किताबों में यह कान्सेप्ट पूरी तरह से स्पष्ट दिया हुआ है। मसलन इमाम अली(अ.) नहजुलबलाग़ा(12) में फरमाते हैं,

''सम्पूर्ण तारीफें उस अल्लाह के लिए हैं जिस की तारीफ तक बोलने वालों की पहुंच नहीं। जिस की रहमतों को गिनने वाले गिन नहीं सकते। न ऊंची उड़ान भरने वाली हिम्मतें उसे पा सकती हैं। न दिमाग और अक्ल की गहराइयां उस की तह तक पहुंच सकती हैं। उस के आत्मिक चमत्कारों की कोई हद निश्चित नहीं। न उस के लिए तारीफी शब्द हैं। न उस के लिए कोई समय है जिस की गणना की जा सके। न उस का कोई टाइम है जो कहीं पर पूरा हो जाये। उस ने कायनात को अपनी कुदरत से पैदा किया। उसकी पहचान निराकारता है और निराकारता का कमाल है कि उससे गुणों को नकारा जाये। क्योंकि हर गुण गवाह है कि वह अपने गुणी से अलग है और हर गुण रखने वाला गवाह है कि वह गुण के अलावा कोई चीज़ है। अत: जिस ने उस के वजूद का कोई और साथी माना उसने द्विक पैदा किया। जिसने द्विक पैदा किया उसने उसके हिस्से बना लिये और जो उसके लिए हिस्सों से सहमत हुआ वह उससे अज्ञानी रहा और जो उससे अज्ञानी रहा उसने उसे इशारे के काबिल समझ लिया। और जिसने उसे इशारे के काबिल समझ लिया उस ने उसे एक हद के अंदर कर दिया और जिसने उसे हद के अंदर समझा वह उसे दूसरी चीज़ों की क़तार में ले आया। जिस ने यह कहा कि वह किसी चीज़ में है उसने उसे उस चीज़ के सापेक्ष (relativistic) मान लिया और जिसने यह कहा कि वह किसी चीज़ पर है उसने और जगहें उस से खाली समझ लीं।

वह है, हुआ नहीं। मौजूद है लेकिन आरम्भ से वजूद में नहीं आया। वह हर मख्लूक़ के साथ है लेकिन जिस्मानी मेल की तरह नहीं है। वह हर चीज़ से अलग है लेकिन जिस्मानी दूरी की तरह से नहीं। वह बेनयाज़ है इसलिए कि उसका कोई साथी ही नहीं है जिससे वह अनुराग रखता हो और उसे खोकर परेशान हो जाये।    

आइंस्टीन चूंकि शुरूआत ही से खुदा के इस कान्सेप्ट से प्रभावित रहा लेकिन उसे किसी मज़हब में इस तरह के विचार नहीं मिल रहे थे अत: वह संशयवाद का शिकार हो गया। लेकिन बाद में जब वह अपने शिया इस्लामी शागिर्द प्रोफेसर हेसाबी के ज़रिये महान इस्लामी आलिमे दीन आयतुल्लाह बोरोजर्दी के सम्पर्क में आया और शिया इस्लामी लिटरेचर उसकी नज़रों से गुज़रा तो उसने देखा कि यहाँ पर तो खुदा का वही तसव्वुर ग्यारह-बारह सौ साल पहले की किताबों में बयान हो रहा है जो कि उसके दिमाग में सत्रहवीं सदी के फिलास्फर बरूच स्पईनोज़ा की फिलास्फी पढ़ने के बाद बना था। इसलिए उसका संशय फौरन ही दूर हो गया और उसने इस्लाम को अपना लिया।

References :
(1) Brian, Dennis (1996), Einstein: A Life, New York: John Wiley & Sons, p. 127, ISBN 0-471-11459-6
(2) Albert Einstein in a letter to M. Berkowitz, 25 October 1950; Einstein Archive 59-215; from Alice Calaprice, ed., The New Quotable Einstein, Princeton, New Jersey: Princeton University Press, 2000, p. 216
(3) http://www.aparat.com/v/dBZNM
(4) Mouood.org
(5) http://www.youtube.com/watch?v=tpnPF29NX7s
(6) http://broujerdi.org/content/view/27/70
(7) Electroniki Aapke Liye, Published by AISECT,  Bhopal, March-2012 Issue
(8) Kitab Al-Tauheed by Sheikh Suddooq (a.r.)
(9) Correspondence of Benedict de Spinoza, Wilder Publications (March 26, 2009), ISBN 1-60459-156-0, letter 73
(10) Karl Jaspers, Spinoza (Great Philosophers), Harvest Books (October 23, 1974), ISBN 0-15-684730-2, Pages: 14 and 95
(11) Genevieve Lloyd, Routledge Philosophy GuideBook to Spinoza and The Ethics (Routledge Philosophy Guidebooks), Routledge; 1 edition (October 2, 1996), ISBN 0-415-10782-2, Page: 40
(12) Nahjul Balagah (saying of Imam Ali a.s.) - Khutba : 1