Sunday, April 25, 2021

आक्सीजन के बारे में इमाम हज़रत अली(अ.) का बयान

 आक्सीजन के बारे में इमाम हज़रत अली(अ.) का बयान जो नहजुल बलाग़ा के खुत्बा - 131 मे इस तरह मौजूद है, ‘और तरोताज़ा शादाब दरख्त सुबह व शाम उसके आगे सर बसुजूद हैं और अपनी शाखों से चमकती हुई आग भड़काते हैं...’

इस जुमले पर गौर करने पर दो चीज़ें नज़र आती हैं। पहली ये कि इसमें शादाब दरख्तों के सुबह व शाम सजदे में होने का ज़िक्र है। और दूसरी ये कि इसमें उन दरख्तों की शाखों का चमकती हुई आग भड़काने का ज़िक्र है। यानि तरोताज़ा शादाब दरख्तों में कोई ऐसा अमल हो रहा है जो सुबह व शाम के वक्त कुछ अलग होता है और दिन के बाक़ी अवक़ात में अलग। और इस अमल से तरोताज़ा शादाब दरख्तों की शाखों से कोई ऐसी चीज़ बनती है जो चमकती हुई आग को भड़काती है।
अगर यहाँ इमाम(अ.) शादाब दरख्तों की बजाय सूखे दरख्तों की बात करते तो ये जुमला एक मामूली जुमला होता। क्योंकि सूखे दरख्तों से आग भड़कने की बात हर एक की समझ में आती है। लेकिन जब शादाब दरख्तों से चमकीली आग के भड़कने का ज़िक्र हो तो इस जुमले का राज़ बहुत गहरा हो जाता है। और कम से कम इमाम अली(अ.) के ज़माने की साइंस उस राज़ तक नहीं पहुंच पायी थी।
और वह राज़ है हरे पौधों में फोटोसिंथेसिस का और उसके ज़रिये आक्सीजन के बनने का। इमाम(अ.) के इस जुमले में फोटोसिंथेसिस के ज़रिये आक्सीजन के ही बनने का ज़िक्र हो रहा है।
लेकिन ये दोनों ही अमल उस वक्त रुके होते हैं या उनकी रफ्तार न के बराबर हो जाती है जब इंसान अल्लाह की इबादत में और खासतौर से सज्दे में सर रखे होता है। उस वक्त न तो वह अपनी ज़रूरत की चीज़ें हासिल करता है, न ही दूसरों की ज़रूरत की चीज़ें तैयार करता है। उसका ज़हन व जिस्म उस वक्त सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की इबादत में मशगूल होता है।
तरोताज़ा शादाब दरख्त भी दो तरह के अमल करते हैं। पहला तो ये कि ज़मीन से पानी व नाईट्रेट और हवा से कार्बन डाई आक्साइड लेते हैं। साथ में साँस लेने के लिये आक्सीजन लेते हैं। जबकि दूसरे अमल में सूरज की रोशनी में फोटोसिंथेसिस करते हुए आक्सीजन बनाकर हवा में छोड़ते हैं। जो कि हर तरह के जानदारों के सांस लेने में काम आती है। इसी फोटोसिंथेसिस के ज़रिये वह तमाम जानदारों के लिये फल व अनाज वगैरा की शक्ल में खाने की अशिया भी बनाते हैं। चूंकि दिन के वक्त सूरज की रोशनी ज़्यादा होती है लिहाज़ा फोटोसिंथेसिस का अमल भी तेज़ होता है। यानि दरख्त फिज़ा में आक्सीजन ज़्यादा छोड़ते हैं और इसकी बनिस्बत साँस लेने में कम आक्सीजन लेते हैं। जबकि रात में इसका उलटा होता है, क्योंकि सूरज की रोशनी की गैरमौजूदगी में फोटोसिंथेसिस का अमल रुक जाता है जबकि पौधों का साँस लेना जारी रहता है।
लेकिन पूरे रात दिन में दो वक्त ऐसे होते हैं जब पौधे जितनी आक्सीजन साँस के ज़रिये लेते हैं उतनी ही फोटोसिंथेसिस के ज़रिये छोड़ते हैं। ये दो वक्त हैं सुबह तड़के फजिर का वक्त और शाम को मग़रिब का वक्त। हम कह सकते हैं कि इन दोनों अवक़ात में न तो नबातात फिज़ा को कुछ देते हैं, न लेते हैं। साइंसदानों ने इसे नाम दिया है Compensation Point यह ठीक वही सिचुएशन है जैसे इंसानों में सज्दे व इबादत के वक्त होती है।
इस तरह इमाम अली(अ.) तरोताज़ा शादाब दरख्तों के सज्दे के ज़रिये न सिर्फ Respiration और Photosynthesis की तरफ इशारा कर रहे हैं बल्कि दिन के अलग अलग अवक़ात में इसके बदलने की भी बात कर रहे हैं।
इमाम(अ.) के बयान के दूसरे हिस्से से पूरी तरह साफ हो जाता है कि इमाम अली(अ.) न सिर्फ फोटोसिंथेसिस की बात कर रहे हैं बल्कि उस अमल में आक्सीजन मिलती है, इस राज़ को भी ज़ाहिर कर रहे हैं। जैसा कि इमाम(अ.) फरमा रहे हैं कि , ‘तरोताज़ा शादाब दरख्त .... अपनी शाखों से चमकती हुई आग भड़काते हैं ’ यानि हरे व शादाब दरख्तों की शाखों में जो अमल होता है उसके नतीजे में कोई ऐसी चीज़ मिलती है जो चमकती हुई आग को भड़का देती है।
साइंस ने दरियाफ्त किया है कि आग को भड़काने में फिज़ा में मौजूद एक ही गैस का रोल होता है, और वह गैस है आक्सीजन। और यही गैस फोटोसिंथेसिस के अमल के दौरान हरे पौधों की शाखों पर मौजूद पत्तियों से बनकर निकलती है। साइंसी तारीख के मुताबिक आक्सीजन की दरियाफ्त सन 1772 में शीले नाम के साइंसदाँ ने की। इससे पहले कोई इस गैस के बारे में नहीं जानता था। लैवोज़िये ने इसी ज़माने में दरियाफ्त किया कि आक्सीजन जलने में मदद करती है। बिना आक्सीजन के किसी भी चीज़ का जलना नामुमकिन है। फोटोसिंथेसिस की दरियाफ्त वाॅन हेल्मोन्ट ने सत्रहवीं सदी में की। लेकिन उसे यह पता नहीं चला था कि इस प्रोसेस में आक्सीजन पैदा होती है। इसे मालूम किया जोसेफ प्रीस्टले ने अट्ठारहवीं सदी में। जब आक्सीजन की दरियाफ्त उसी वक्त में हुई थी।
प्रीस्टले ने बताया कि पौधे सूरज की रोशनी में आक्सीजन पैदा करते हैं। लेकिन आक्सीजन पैदा करने की प्रोसेस यानि फोटोसिंथेसिस दरख्तों की पत्तियों में होती है, जो कि दरख्तों की शाखों पर होती हैं यह बीसवीं सदी में पहले दुनिया नहीं जानती थी। बीसवीं सदी में वान नील नाम के साइंसदाँ ने इस बारे में बताया।
लेकिन इन सब साइंसदानों से बहुत पहले इमाम अली(अ.) पाँचवीं-छठी सदी में साफ साफ बता रहे हैं कि शादाब दरख्तों की शाखों में (फोटोसिंथेसिस का) अमल होता है जिसमें चमकती हुई आग को भड़काने वाली शय (आक्सीजन) पैदा होती है। यहाँ पर इमाम(अ.) आक्सीजन की खासियत को भी साफ साफ बयान कर रहे हैं। आक्सीजन आग को भड़काती है यानि जलने में मदद देती है, लेकिन खुद आग को पैदा नहीं करती। यानि किसी और तरीके से पैदा हुई आग को आगे जलते रहने के लिये आक्सीजन काम आती है, लेकिन हम अगर चाहें कि सिर्फ आक्सीजन की मदद से आग को पैदा भी कर दें तो यह मुमकिन नहीं। अगर ऐसा मुमकिन होता तो पूरी दुनिया में हर तरफ आग ही आग नज़र आती क्योंकि फिज़ा में बीस फीसदी आक्सीजन ही होती है।

इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुल बलाग़ाह का साइंसी इल्म
लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी
प्रकाशक : अब्बास बुक एजेंसी, लखनऊ 
ई बुक के तौर पर यह किताब इस लिंक से हासिल की जा सकती है :

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