Ya Husain Ya Shah-E-Karbala
Monday, May 14, 2012
Tuesday, April 24, 2012
Sunday, April 22, 2012
Friday, April 20, 2012
Sunday, July 24, 2011
किताब ‘51 जदीद साइंसी तहक़ीक़ात जो दरअस्ल इस्लाम की हैं’ का लोकार्पण
यूनिटी कालेज, हुसैनाबाद लखनऊ में 22 जुलाई 2011 को आयोजित एक समारोह में ज़ीशान हैदर ज़ैदी की किताब ‘51 जदीद साइंसी तहक़ीक़ात जो दरअस्ल इस्लाम की हैं’ का लोकार्पण हुआ। समारोह में अन्तर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व प्रसिद्ध इस्लामी धर्मगुरु व विद्वान डा0 कल्बे सादिक व मुख्य अतिथि राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान केन्द्र के रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर साइंटिस्ट डा0 इक्तेदार फारुक़ी ने पुस्तक का विमोचन किया। इस पुस्तक को अब्बास बुक एजेंसी, दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ ने प्रकाशित किया है। कार्यक्रम के संयोजक सेन्ट रोज़ पब्लिक स्कूल के संस्थापक व प्रबंधक डा0मंसूर हसन खाँ थे।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि डा0 इक्तेदार फारुक़ी ने कहा कि मज़हबी रहनुमाओं को साइंस से दूरी नहीं बरतनी चाहिए और उन्हें लोगों में तार्किक चिंतन की शक्ति जागृत करनी चाहिए ताकि वे मात्र धर्म या मज़हब का अँधा अनुकरण करके अपने व दूसरों के लिये समस्याएं न खड़ी करें। उन्होंने ये भी कहा कि एक वक्त था जब साइंस और तकनीक में मुस्लिम समाज यूरोपियन से बहुत आगे था, लेकिन आज मामला ठीक इसके उलट हो चुका है और मुस्लिम समाज ने तार्किक रूप से चिंतन करना लगभग त्याग दिया है जिसके नतीजे में समाज में अनेकों बुराईयां प्रचलित हो गयी हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इस्लामी धर्मगुरु व विद्वान डा0 कल्बे सादिक ने मौजूदा दौर के कठमुल्लाओं पर चोट की और कहा कि वैज्ञानिक चिंतन से अलग हटकर कोई क़ौम ज्यादा दिन जीवित नहीं रह सकती। उन्होंने आपसी झगड़ों को मिटाकर एक होने का पैगाम दिया ताकि मुल्क और कौम की तरक्की हो सके।
डा0मंसूर हसन खाँ ने कहा कि जीशान हैदर जैदी की यह किताब ज़ाहिर करती है कि आधुनिक साइंस की शुरूआत दरअसल इस्लाम ने ही की है।
अन्य वक्ताओं में यू.पी. मीडिया फाउन्डेशन के अध्यक्ष डा0सुल्तान शाकिर हाशमी व अब्बास बुक एजेंसी की संस्थापक श्री अली अब्बास तबातबाई ने भी श्रोताओं को खिताब किया।
ज़ीशान हैदर ज़ैदी की यह किताब मुस्लिम समाज में व्याप्त ऐसी मान्यताओं को खंडित करती है कि वर्तमान वैज्ञानिक तरक्की इस्लामी मान्यताओं से अलग हटकर है। और इस्लाम ऐसी तरक्की का विरोध् करता है। हक़ीक़त ये है कि आधुनिक वैज्ञानिक तरक्की और इस्लामी मान्यताएं पूरी तरह एक दूसरे को सपोर्ट करती हैं।
Monday, June 27, 2011
क्रियेटर और क्रियेशन - 6 (पानी)
क्रियेटर और उसके क्रियेशन को समझने के इस सफर में अब हम गौरो फिक्र करेंगे जिंदगी के निहायत अहम जुज़ पानी की करिशमायी सिफात पर।
पहाड़ी इलाकों में जो तालाब पाये जाते हैं वह जाड़ों में जम जाते हैं। इसके बावजूद तालाब में मौजूद मछलियों और दूसरे जानदारों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। दरअसल तालाब में बर्फ सिर्फ पानी की ऊपरी सतह पर जमती है। इसके पीछे एक खास वजह है। पानी में एक ऐसी क्वालिटी होती है जो और किसी लिक्विड में नहीं होती। कोई भी लिक्विड ठंड बढ़ने पर सिकुड़ता है। लेकिन पानी चार डिग्री सेण्डीग्रेड टेम्प्रेचर होने तक सिकुड़ता है, उससे कम टेम्प्रेचर पर फिर फैलने लगता है। यानि बर्फ में बदलने पर वह हलका होकर पूरे तालाब को ढंक लेता है और नीचे फ्रेश वाटर में मछलियां आराम से तैरती रहती हैं।
इसके अलावा बर्फ में गर्मी रोकने की भी खासियत होती है। जो पानी को हद से ज्यादा ठण्डा होने से रोक देती हैं। और इसमें रहने वाले जानदार एक आरामदेय माहौल में अपना गुज़र बसर करते रहते हैं। इस तरह खुदावन्देआलम ने पानी के जरिये न सिर्फ ज़मीनी मख्लूकात को खल्क़ किया बल्कि उनके लिए एक ऐसा माहौल भी पैदा कर दिया है जो उनके वजूद के लिए ज़रूरी है।
पानी की एक बड़ी क्वालिटी इसका लिक्विड फार्म में होना है। लिक्विड होने की वजह से यह जानदारों के पूरे जिस्म में आसानी से फैल जाता है और जिस्म के लिए जरूरी चीज़ों को अंदर फैला देता है। जानदारों के लिए जरूरी ज्यादातर चीज़ें पानी में आसानी से घुल जाती हैं। जैसे कि नमक, ग्लूकोज और चीनी। पानी महीन से महीन चीज़ों के भीतर पहुंच सकता है। इसीलिए वह हाथी से लेकर निहायत बारीक बैक्टीरिया तक तमाम जानदारों के जिस्म में जरूरियात पहुंचाने का जरिया है। पानी में ऑक्सीजन जैसी अहम गैस भी आसानी के साथ घुल जाती है। पानी में रहने वाले जानदारों मछलियों वगैरा के लिए यह ऑक्सीजन रहमत होती है। अगर हम सिर्फ मछलियों के साँस लेने का तरीका देख लें तो परवरदिगार की बनाई हुई इस डिज़ाइन पर हैरत करने पर मजबूर हो जायेंगे।
मछलियों में पानी गिल्स के जरिये अंदर जाता है जहां एक पूरा मशीनरी सिस्टम चंद लम्हों के अन्दर उस पानी से आक्सीज़न को अलग कर लेता है। ये आक्सीजन मछलियों के सांस लेने में काम आ जाती है। फिर अन्दर बनने वाली कार्बन डाईआक्साइड को लेकर बचा हुआ पानी बाहर आ जाता है। मछलियों का ये सिस्टम इतना परफेक्ट तरीके से काम करता है कि पानी में मौजूद लगभग अस्सी फीसद ऑक्सीजन को मछलियां इस्तेमाल कर लेती हैं। जबकि इंसानी फेफड़े हवा से सिर्फ पच्चीस फीसद ऑक्सीज़न को ही हासिल कर पाते हैं। अल्लाह की बनाई हुई यह एक ऐसी मशीनरी है जिसके सामने बड़े बड़े कम्प्यूटर फेल हैं।
आईए अब पानी के बड़े जखीरे यानि समुन्द्र पर बात करें। समुन्द्र में दो तरह की धाराएं यानि स्ट्रीम्स होती है गर्म और ठण्डी। गर्म स्ट्रीम इक्वेटर के पास पैदा होती है क्योंकि सूरज की रोशनी वहां सीधी पड़ती है। दूसरी तरफ ठण्डी स्ट्रीम पोल्स के पास पैदा होती है। हवाओं के चलने से समुन्द्र में कन्वेक्शन की प्रोसेस शुरू होती हैं और ये धाराएं एक दूसरे की जगह पर पहुँचती हैं, जिससे पूरे समुन्द्र का टेम्प्रेचर मेन्टेन होता है और जानदारों के मुताबिक़ होता है। अगर ऐसा न हो तो समुन्द्र कहीं पर बहुत ज्य़ादा गर्म हो जायेगा और कहीं बहुत ज्य़ादा ठण्डा, जिससे उसमें रहने वाले जानदारों का वजूद खतरे में पड़ सकता है।
पानी का यह सिस्टम जानदारों के लिए अल्लाह की रहमत नहीं तो और क्या है ? वह अल्लाह जिसके लिए कहा गया है अर्रहमानिर्रहीम। यानि जो रहमान भी है और रहीम भी।
पानी के बिना ज़िंदगी का तसव्वुर ही नहीं पाया जाता। अभी तक सांइंस कोई ऐसी जिंदगी दरियाफ्त नहीं कर पायी है जो पानी के बगैर हो। और आखिर में इसी नतीजे पर पहुंची है कि पानी के बिना जिंदगी मुमकिन नहीं। इस तरह अल्लाह की किताब कुरआन की सच्चाई एक बार फिर दुनिया के सामने आ जाती है, जिसकी 21 वीं सूरे अंबिया की 30 वीं आयत में इरशाद हुआ है, ‘‘क्या वह लोग जो मुनकिर हैं गौर नहीं करते कि ये सब आसमान व जमीन आपस में मिले हुए थे। फिर हम ने उन्हें जुदा किया और पानी के जरिये हर जिन्दा चीज़ पैदा की। क्या वह अब भी यकीन नहीं करते?’’
इमाम हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अ-स-) भी पानी को जिंदगी की पैदाइश की लाज़मी जुज बताते हुए कहते हैं, ’’फिर ये कि अल्लाह ने कुशादा फिज़ा, वसीअ एतराफ व इकनाफ और ख़ला की वुसाअतें ख़ल्क कीं और उन में ऐसा पानी बहाया जिसके दरियाये मवाज़ की लहरें तूफानी और बहरे ज़खार की मौज़े तह ब तह थीं। उसे तेज़ हवा और तुन्द आन्धी की पुत पर लादा। फिर उसे पानी के पलटाने का हुक्म दिया और उसे इसके पाबन्द रखने पर काबू किया और उसे पानी की सरहद में मिला दिया।
उस के नीचे हवा दूर तक फैली हुई थी और ऊपर पानी ठाठें मार रहा था। फिर अल्लाह सुबहाना ने उस पानी के अंदर एक हवा ख़ल्क़ की जिस का चलना ‘बाँझ’ था। और उसे उस के मरकज़ पर करार रखा। उस के झोंके तेज़ कर दिये और उसके चलने की जगह दूर व दराज़ तक फैला दी। फिर उस हवा के मामूर किया कि वह पानी के ज़खीरे को थपेड़े दे और बहरे बेकराँ की मौज़ों को उछाले। उस हवा ने पानी की यूँ मथ दिया जिस तरह दही के मश्कीज़े को मथा जाता है और उसे धकेलती हुई तेज़ी से चली, जिस तरह खाली फिज़ा में चलती है और पानी के इब्तेदाई हिस्से को आखिरी हिस्से पर और ठहरे हुये को चलते हुये पानी पर पलटाने लगी यहाँ तक कि इस तलातुम पानी की सतह बुलंद हो गयी और वह तह ब तह पानी झाग देने लगा।
अल्लाह ने वह झाग खुली हवा और कुशादा फिज़ा की तरफ उठाई और उससे सातों आसमान पैदा किये। नीचे वाले आसमान को रूकी हुई मौज़ की तरह बनाया और ऊपर वाले आसमान को महफूज़ छत और बुलन्द इमारत की सूरत में इस तरह कायम किया कि न सुतूनों को सहारे की ज़रूरत थी न बंधनों से जोड़ने की ज़रूरत। फिर उन को सितारों की सजधज और रोशन तारों की चमक दमक से आरास्ता किया। और उन में स्नोपाश और जगमगाता चाँद रवाँ किया, जो घूमने वाले फलक, चलती फिरती छत और जुंबिश खाने वाली लौह में है। फिर खुदा बन्दे आलम ने बुलन्द आसमानों के दरमियान शिगाफ पैदा किये और उन की वुसाअतों को तरह तरह के फरिश्तों से भर दिया।
हजरत अली (अ.स.) का यह खुत्बा कायनात की पैदाइश के बारे में खुले अलफाज़ में बता रहा है। और इसमें साफ तौर पर जिक्र है कि यूनिवर्स की पैदाइश में पानी ने अहम किरदार निभाया है।
पानी को खालिके कायनात ने कुछ ऐसी क्वालिटीज का मालिक बनाया है जो और किसी मैटर में नहीं पायी जातीं। सच तो यह है कि पानी के स्ट्रक्चर में पूरी तरह से एक इंटेलिजेंट डिजाइन दिखती है। जो माबूद के वजूद को साबित करती है।
चूंकि पानी हाईड्रोजन और आक्सीजन के बीच जोड़ से बनता है। केमिस्ट्री के नजरिये से यह जोड़ सबसे मजबूत बांड होता है। इस वजह से पानी कुछ इस तरह की क्चालिटीज का मालिक हो जाता है जिनसे न सिर्फ वह जिंदगी की पैदाइश में अहम रोल निभाता है बल्कि जिंदगी को रवानी भी बख्शता है।
मिसाल के तौर पर बांड मजबूत होने की वजह से उसका ब्वायलिंग प्वाइंट बढ़ जाता है। उसका माल्क्यूल ज्य़ादातर केमिकल रिएक्शन में ब्रेक नहीं होता और वह पानी की ही हालत में चीज़ों का हिस्सा बन जाता है। इंसानी जिस्म का साठ फीसद हिस्सा पानी होता है। ज़मीन का इकहत्तर फीसद हिस्सा पानी है। कुछ पौधों में नब्बे फीसद तक पानी होता है।
हाईड्रोजन सल्फाइड, हाईड्रोजन सेलेमाइड जैसे कुछ माल्क्यूल्स का स्ट्रक्चर पानी की तरह होता है जो खुद हाईड्रोजन आक्साइड है। लेकिन क्वालिटीज में ये माल्क्यूल पानी के आसपास भी नहीं है। पानी के अलावा ये सब माल्क्यूल माइनस टेम्प्रेचर पर ही उबलने लगते हैं और नार्मल टेम्प्रेचर पर गैस की हालत में होते हैं। अगर पानी की क्वालिटीज इनसे मिलती होतीं तो वह भी जमीन पर गैस फार्म में मिलता और फिर जमीन पर कोई जिंदगी न होती।
पानी अगर लाखों साल तक भी किसी बरतन में रख दिया जाये तो भी उसके स्ट्रक्चर पर कोई असर नहीं होता। जो कुछ भी उसकी जाहिरी हालत में तब्दीली आती है वह दरअसल उसमें दूसरे मैटीरियल के मिक्स होने से आती है। और अगर उस मैटीरियल को अलग कर दिया जाये तो पानी वापस अपनी प्योर हालत में आ जाता है।
पानी को वापस अपनी प्योर हालत में लाने के लिए अल्लाह ने इंतिजाम भी कर रखा है। इंसान और दूसरे जानदार जब पानी का इस्तेमाल करते हैं तो वह गंदी चीज़ों के मिक्स हो जाने से पीने लायक नहीं रहता। यह पानी नदियों के जरिये समुन्द्र में जाता है। सूरज की गर्मी समुन्द्र के इस गंदगी मिले पानी को भाप में बदल कर बादलों की शक्ल दे देती है। इस दौरान पानी की गंदगी समुन्द्र में ही छूट जाती है और बारिश के जरिये साफ पानी वापस ज़मीन पर आ जाता है।
पानी ही एक ऐसा मैटीरियल है जो ज़मीन पर ठोस, लिक्विड और गैस तीनों हालत में मिलता है। इसलिए ज़िंदगी को हर हालत में सपोर्ट करता है। ठंडे मुल्कों में बर्फ के बीच रहने वाले जानदारों को वह बर्फ की शेप में मदद करता है। आसमानों में रहने वाले जानदारों को गैस की शेप में मदद पहुंचाता है और बाकी जानदारों के लिए लिक्विड की शक्ल में हर जगह पानी मौजूद होता है।
पानी में दूसरी चीज़ों को घोलने की पावर बहुत ज्यादा होती है। इसका मतलब यह हुआ कि वह जानदारों के लिए ज़रूरी हर चीज को घोलकर उन जानदारों तक पहुंचा सकता है। और उसके बाद जो भी जानदारों की गंदगी होती है उन्हें अपने में घोलकर बाआसानी उनके जिस्म से बाहर फेंकने में मदद भी कर सकता है। हम जो कुछ भी खाते पीते हैं वह पानी की ही मदद से जिस्म का हिस्सा बनता है और उसके बाद जो गंदगी जिस्म से अलग होती है वह पानी ही के जरिये बाहर निकलती है। और खास बाद ये कि इसमें पानी के खुद के स्ट्रक्चर पर कोई असर नहीं होता। यानि जो पानी गंदगी को बाहर निकाल रहा है कुछ आसान प्रोसेस के बाद वही पानी जिस्म को खाना पहुंचाने लायक हो जाता है।
अब आते हैं पानी की कुछ और क्वालिटीज पर, जो अल्लाह ने सिर्फ पानी को बख्शी है। आपने अक्सर मच्छर या दूसरे कीड़े मकोड़ों को पानी के ऊपर बैठे हुए देखा होगा। ये भी पानी की एक बहुत ही खास क्वालिटी है। जिसे सरफेस टेंशन कहा जाता है। पानी का सरफेस टेंशन दूसरे लिक्विड्स के मुकाबले में बहुत ज्यादा होता है। जिसकी वजह से बहुत से कीड़े मकोड़े आसानी से इसके ऊपर टिक सकते हैं। ये जानदार कुछ और जानदारों जैसे कि मेंढक वगैरा के पेट भी भरते हैं।
पानी का ये सरफेस टेंशन एक काम और करता है। पेन की रीफिल जैसी कोई बहुत पतली नली लीजिए और उसे पानी में डुबोईए। आप देखिएगा कि पानी नली में काफी ऊपर तक चढ़ आता है। क्या आप जानते हैं कि पेड़ पौधे ज़मीन से पानी इसी तरीके से हासिल करते है? उनकी जड़ों से बहुत पतली पतली नलियां निकलकर तने से होती हुई पत्तियों तक पहुंच जाती हैं । ये नलियां मिट्टी से पानी को ब्लाटिंग पेपर की तरह सोखती हैं और पत्तियों तक पहुंचा देती है। इस पूरी प्रोसेस नामुमकिन थी अगर पानी का ऊंचा सरफेस टेंशन न होता। और उस हालत में न तो पौधों का कोई वजूद होता, न ही दूसरे जानदारों का।
पानी में गर्मी को सोखने की भी काफी ताकत होती है। बहुत ज्यादा गर्मी पाकर पानी का टेम्प्रेचर बस थोड़ा सा ही बढ़ता है। इस तरह उसमें या उसके आसपास रहने वाले जानदारों को बहुत ज्यादा गर्मी या सर्दी का सामना नहीं करना पड़ता और माहौल का टेम्प्रेचर उनके जिस्म के मुताबिक मेनटेन रहता है। देखा जाये जो पूरी ज़मीन का टेम्प्रेचर सिर्फ इस वजह से मेनटेन है क्योंकि इसका एक बड़ा हिस्सा समुन्द्र की शक्ल में पानी है।
इस तरह पानी की बेशुमार और बेशकीमती क्वालिटीज़ हैं जो हमारी यानि इंसानों और दूसरे जानदारों के लिए निहायत अहम हैं। पानी सिर्फ हमारी ज़मीन ही पर नहीं पाया जाता बल्कि पूरे यूनिवर्स में हर जगह पाया जाता है। यहां तक कि चाँद जो पहले खुक समझा जाता था, हाल ही में खींचे गये कुछ फोटोग्राफ की मदद से उसपर पानी होना कनफर्म हुआ है। तो इस तरह इस बात के सुबूत मिलते हैं कि अगर पानी न होता तो ज़मीन तो ज़मीन पूरे यूनिवर्स की ही खिलकत न होती।
पानी अल्लाह की बेमिसाल रहमत है। ‘रहमान’ अल्लाह के उन नामों में से है जिसको खुद अल्लाह ने पसंद फरमाया है। हालांकि अल्लाह की रहमतों को गिनने वाले गिन नहीं सकते। अगर सिर्फ पानी की क्वालिटीज़ को ही देखा जाये तो उसमें खालिके कायनात की रहमतों के बेशुमार पहलू निकलकर सामने आ जाते हैं।
Sunday, June 19, 2011
क्रियेटर और क्रियेशन -5 ( माल्क्यूल)
क्रियेटर की इण्टेलिजेंट डिजाइन जो इस पूरी कायनात की शक्ल में हमारे सामने मौजूद है, इसकी स्टडी में हमें कदम कदम पर निशानियाँ मिलती हैं उस अज़ीम क्रियेटर की जो हमारा खुदा है कायनात का खालिक है और परवरदिगार है। इसी सिलसिले में हम गौरो फिक्र करेंगे माल्क्यूल पर।
खुदा की बनाई इस कायनात के बिल्डिंग ब्लॉक्स हैं एलीमेन्ट्स। हमें यह मालूम हो चुका है कि जमीन पर सौ के लगभग एलीमेन्ट पाये जाते हैं इनमें से किसी भी एलीमेन्ट का अपना एक अलग एटम होता है, जो दूसरे एलीमेन्ट के एटम से पूरी तरह अलग होता है।
अब एक अहम सवाल। अगर हम अपने आसपास गौर करें तो हमें दिखती हैं ज़मीन पर मैटर की लाखों वेराईटीज़ । पानी, तेल, नमक, शुगर, आक्सीज़न, हाईड्रोजन, प्रोटीन। गिनते जाईए मैटर की वेराईटीज़ की कोई हद नहीं। कोई भी मैटर दूसरों से क्वालिटीज़ के एतबार से पूरी तरह अलग। तो सवाल पैदा होता है कि अगर ज़मीन पर सिर्फ सौ तरह के एलीमेन्ट मिलते हैं तो मैटर की इतनी ज्यादा शक्लें कैसे पैदा हो जाती हैं?
इसका जवाब बहुत आसान है कि खुदा की कुदरत से एलीमेन्ट में आपस में जुड़कर एक नया मैटर बनाने की पावर होती है। जब कुछ एलीमेन्ट्स के एटम आपस में जुड़ते हैं तो पैदाइश होती है कंपाउंड यानि एक नये मैटर के माल्क्यूल की।
जी हां कोई भी मैटर अपनी एक अलग पहचान रखता है और माल्क्यूल उस मैटर का सबसे छोटा जर्रा होता है जिसमें वही क्वालिटीज़ होती हैं जो कि उस मैटर में होती हैं। मिसाल के तौर पर नमक का ज़ायका जिस तरह नमकीन होता है और पानी में घोलने पर घुल जाता है, उसी तरह उसका सबसे छोटा जर्रा यानि कि उसका माल्क्यूल भी नमकीन होता है और पानी में घोलने पर घुल जाता है।
एक माल्क्यूल उस कायनात का दरवाजा होता है, जिसे साइंसदाँ माइक्रो कायनात कहते हैं। ये वो दुनिया होती है जो आँखों से न दिखाई देने वाले बहुत महीन जर्रों के अंदर मौजूद होती है। रोजमर्रा की दुनिया में हमसे हर वक्त रिश्ता बनाये रखने वाले माल्क्यूल हैं पानी, नमक और आक्सीजन जैसे सिम्पिल माल्क्यूल। या फिर डी-एन-ए- और प्रोटीन जैसे पेचीदा माल्क्यूल जो इंसानों और दूसरे जानदारों के जिस्म को बनाते हैं।
एक या कुछ एलीमेन्टस के एटम जब आपस में जुड़ते हैं तो माल्क्यूल की पैदाइश होती है। जब हाईड्रोजन और ऑक्सीज़न के एटम आपस में मिलते हैं तो पानी का माल्क्यूल पैदा होता है। जो दुनिया की तमाम जिंदा मखलूक़ का लाज़मी जुज़ है। अल्लाह ने खुद इस सिलसिले में कहा है, कुरान की 21 वीं सूरे अंबिया की 30 वीं आयत में इरशाद हुआ है, ‘‘क्या वह लोग जो मुनकिर हैं गौर नहीं करते कि ये सब आसमान व जमीन आपस में मिले हुए थे। फिर हम ने उन्हें जुदा किया और पानी के जरिये हर जिन्दा चीज़ पैदा की। क्या वह अब भी यकीन नहीं करते?
माल्क्यूल का बनना खुदाई कुदरत के मोजिज़े से कम नहीं है। देखते हैं कि एटम्स के आपस में जुड़ने पर किस तरह माल्क्यूल का बनना मुमकिन हो पाता है।
साइंस की ब्रांच केमिस्ट्री के मुताबिक कई एलीमेन्ट्स आपस में तालमेल बिठाकर माल्क्यूल बनाते है, इसके पीछे वजह होती है वैलेंसी। वैलेंसी केमिस्ट्री का एक उसूल होता है, जिसके मुताबिक हर एलीमेन्ट दूसरे से मिलकर जोड़ा बनाने की कुदरत रखता है। ये जोड़े या तो अलग अलग एटम के इलेक्ट्रॉन की आपसी शेयरिंग से बनते हैं या फिर एक एटम से दूसरे में ट्रांस्फर के जरिये।
जैसा कि हम जानते हैं कि एटम में कुछ इलेक्ट्रान एक न्यूक्लियस के चारों तरफ चक्कर लगाते रहते हैं। कुछ खास दायरे होते हैं जिनके भीतर ये इलेक्ट्रान मौजूद होते हैं। इनमें से सबसे बाहरी दायरे के लिए अल्लाह ने एक उसूल बना दिया है कि इसमें आठ इलेक्ट्रान मौजूद होने चाहिए वरना एटम स्टेबिल नहीं होगा और कुदरत में ऐसा एटम फ्री नहीं रह पायेगा। नतीजे में अपने को स्टेबिल करने के लिए यह एटम अपने या दूसरे एलीमेन्ट्स के साथ जोड़े बनाने की फिक्र में रहता है।
मिसाल के तौर पर आक्सीजन। इसके बाहरी आरबिट में छह इलेक्ट्रान होते हैं। इसके आरबिट को स्टेबिल होने के लिए जरूरी है कि इसमें आठ इलेक्ट्रान हों। इसके लिए आक्सीजन का एटम अपने ही जैसे दूसरे एटम के साथ दो इलेक्ट्रानों का शेयर कर लेता है जिसके नतीजे में दोनों एटम स्टेबिल हो जाते हैं और आक्सीजन माल्क्यूल तैयार हो जाता है। अक्सर आक्सीजन के तीन एटम भी आपस में शेयर कर लेते हैं और तब मिलता है ओज़ोन माल्क्यूल।
अब एक और मिसाल - नमक यानि कॉमन साल्ट का केमिकल नेम है सोडियम क्लोराइड। सोडियम के एटम को स्टेबिल होने के लिए जरूरी है कि वह अपना एक इलेक्ट्रान दूसरे एटम को दे दे। जबकि क्लोरीन को एक इलेक्ट्रान की जरूरत होती है। नतीजे में दोनों जब एक दूसरे के कान्टेक्ट में आते हैं तो इलेक्ट्रान का ट्राँस्फर होता है और नमक का माल्क्यूल वजूद में आता है।
जब कोई माल्क्यूल वजूद में आता है तो उसकी क्वालिटीज़ उन एटम्स से बिल्कुल अलग हो जाती हैं जिनसे मिलकर वह वजूद में आता है। मिसाल के तौर पर नमक यानि की सोडियम क्लोराइड। यह सोडियम और क्लोरीन से मिलकर बना होता है।
नमक ठोस क्रिस्टल होता है जबकि सोडियम धातु है और क्लोरीन गैस।
नमक खाने का जुज़ होता है जबकि सोडियम और क्लोरीन दोनों ही ज़हर हैं।
नमक को पानी में घोलने पर कोई रियेक्शन नहीं होता। जबकि सोडियम पानी में डालते ही जलने लगता है।
इसी तरह पोटेशियम, कार्बन और नाईट्रोजन तीनों में कोई भी ज़हर नहीं है। लेकिन इनके मिलने से बना कंपाउंड, पोटेशियम साईनाइड दुनिया का सबसे तेज़ ज़हर है।
अब एक सवाल ये पैदा होता है कि क्या माल्क्यूल बनने में कहीं पर खालिके कायनात की कण्ट्रोलिंग पावर के बारे में कुछ मालूम होता है? जी हां। साइंसदानों ने जब मालक्यूल बनने की प्रोसेस की स्टडी की तो कुछ हैरतअंगेज़ बातें सामने आयीं। जैसा कि हम जानते हैं कि इलेक्ट्रान एटम में अपने सेन्टर यानि न्यूक्लियस से इलेक्ट्रोस्टेटिक ताकत के जरिये जुड़ा होता है। अब माल्क्यूल बनाने के लिए इलेक्ट्रानों की शेयरिंग या ट्रांस्फर होना है। यानि दूसरे अल्फाज़ में इलेक्ट्रान को कुछ हद तक अपने सेन्टर से अलग होना है। इसके लिए ज़रूरी है कि इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स बहुत ज्यादा ताकतवर न हो। वरना इलेक्ट्रान कभी अपने सेन्टर को नहीं छोड़ेगा।
साइंसदानों ने जब एटम की स्टडी की तो पाया कि वाकई में इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स बस इतना ही होता है कि इलेक्ट्रान माल्क्यूल बनते वक्त आसानी से अपने सेन्टर से अलग हो जाये। लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं होती। यह इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स इतना कम भी नहीं होता कि इलेक्ट्रान अपने आर्बिट में घूमना ही छोड़ दे। और एटम बिखर जाये।
इस तरह क्रियेटर अल्लाह ने इलेक्ट्रॉन और एटम के लिए एक ऐसी मुनासिब सूरत पैदा कर दी है, इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स की ऐसी फाइन ट्यूनिंग पैदा कर दी है जिसकी वजह से एक तरफ तो स्टेबिल एटम पैदा हुआ और दूसरी तरफ उसमें दूसरे एटम के साथ जुड़कर मॉल्क्यूल बनाने की पावर पैदा हो गयी। अगर ऐसा न होता तो दुनिया में सिर्फ नब्बे या सौ तरह का मैटर ही एलीमेन्ट की शक्ल में मौजूद होता। और हम अपने आसपास की ये दुनिया कभी देख न पाते।
माल्क्यूल्स की बनावट भी अपने में काफी दिलचस्प होता है। माल्क्यूल के अंदर एटम आपस में जब जुड़ते हैं तो कोई खास तरह की डिजाईन बनती है। मिसाल के तौर पर मेथेन गैस का माल्क्यूल टेट्राहेड्रान की शक्ल का होता है। यानि एक ऐसी शेप जिसकी चार दीवारें होती हैं और हर दीवार ट्राईएंगिल की शक्ल में एक दूसरे से जुड़ी होती है। खुदाकी करीगरी के इतने खूबसूरत नमूने हम माल्क्यूल्स की बनावट में देखते हैं कि बड़े से बड़े डिजाईनर के नमूने भी उनके सामने फीके पड़ जायें।
कभी कभी कुछ कंपाउंड एक ही तरह की ज्योमेट्रिकल शेप्स दो तरह से बनाते हैं। दोनों शेप्स कुछ इस तरह होती हैं जैसे कि एक दूसरे की मिरर इमेज यानि परछाईं हो। ऐसा आर्गेनिक कंपाउंड में खास तौर से होता है। एक ही तरह की डिजाइन रखने के बावजूद दोनों शेप्स क्वालिटीज के एतबार से पूरी तरह अलग हो जाते हैं। जिन लोगों ने अरबियन नाइट्स जैसी तिलिस्मी कहानियां पढ़ रखी हैं उन्होंने हमजाद के बारे में जरूर पढ़ा है जो शक्ल व सूरत में किसी इंसान की तरह होता है लेकिन क्वालिटीज और आदत में उस इंसान से पूरी तरह उलट होता है। अगर कोई शख्स शरीफ है तो उसका हमजाद बदमाश होगा। अगर कोई शख्स गोरा है तो उसका हमजाद काला होगा।
कुछ इसी तरह की खासियत माल्क्यूल और उसकी मिरर इमेज बनाने वाले माल्क्यूल यानि कि हमजाद में दिखाई देती है। यानि दो एक ही स्ट्रक्चर के माल्क्यूल अगर मिरर इमेज बना रहे हों तो हो सकता है उनमें से एक दवा हो और दूसरा ज़हर। या एसपरजीन (Asparagin) माल्क्यूल की तरह एक मीठा हो तो दूसरा कड़वा। यकीनन ऐसे अजूबे क्रियेशन वही कर सकता है कि जो क्रियेटर कहलाने का हकदार है यानि पूरी कायनात का खुदा।
इसके अलावा मैटर के जो अलग अलग हालात हम देखते हैं वह दरअसल माल्क्यूल के अलग अलग कंडीशन में रहने से पैदा होती हैं। जब कोई मैटर ठोस हालत में होता है तो उसके माल्क्यूल मज़बूती से एक दूसरे से जुड़े हुए लगातार वाइब्रेशन करते रहते हैं। लिक्विड हालत में माल्क्यूल्स के बीच का फोर्स कुछ कम हो जाता है। लिहाजा वो कुछ हद तक आजादी लेते हुए एक दूसरे से दूर जाने लगते हैं।
अब सवाल पैदा होता है कि माल्क्यूल को आपस में बाँधने वाली ताकत कैसे पैदा होती है। साइंसदानों ने इस ताकत को माल्क्यूलर फोर्स नाम दिया है। मौजूदा साइंस बताती है कि यह ताकत दरअसल बिजली की ताकत यानि इलेक्ट्रोस्टेटिक फोर्स होती है। जब दो माल्क्यूल पास पास आते हैं तो उनके बीच बिजली की ताकत काम करने लगती है और वो आपस में जुड़ जाते हैं।
लेकिन यहां पर फिर एक सवाल पैदा हो जाता है। देखा जाये तो कोई भी माल्क्यूल जब बनता है तो उसमें एटम एक दूसरे से इलेक्ट्रानों की शेयरिंग या ट्रांस्फर के जरिये न्यूट्रल हो जाते हैं। यानि उसमें कोई भी एक्स्ट्रा चार्ज नहीं रहता। बिजली की ताकत के लिए ज़रूरी है कि माल्क्यूल पर कोई चार्ज हो। लेकिन ऐसा नहीं होता। इसके बावजूद माल्क्यूल आपस में जुड़ने लगते हैं यह यकीनन हैरत की बात है।
अगर यह मान भी लिया जाये कि किसी वजह से माल्क्यूल पर थोड़ा चार्ज पैदा हो जाता है तो एक जैसे माल्क्यूल में एक जैसा चार्ज होना चाहिए। मिसाल के तौर पर अगर कहीं पर सिर्फ पानी के माल्क्यूल हों तो उन सब पर एक ही तरह का चार्ज होना चाहिए। अब हम जानते हैं कि एक तरह के चार्जेज एक दूसरे से दूर भागते हैं। यानि पानी के माल्क्यूल एक दूसरे से दूर भागने चाहिए। लेकिन हकीकत में ऐसा नहीं होता। गैसों के अलावा हर तरह के माल्क्यूल में पास आने का मिजाज होता है। और वे आपस में जुड़ते हुए ठोस या लिक्विड बनाते हैं।
आज भी कुछ हद तक साइंसदां इस राज़ पर से परदा हटा पाये हैं। और जो थ्योरी सामने आयी है वह यह कि हालांकि माक्यूल न्यूट्रल होता है, यानि उसमें पाजिटिव और निगेटिव चार्ज बराबर होता है। लेकिन उसमें चार्ज का बिखराव एक जैसा नहीं होता। यह बिखराव कुछ इस तरह से फाइन ट्यूनिंग पर सेट है कि माल्क्यूल के बीच हमेशा कशिश की ताकत पैदा हो जाती है। यही है माल्क्यूलर फोर्स। इसी की वजह से मैटर ठोस या लिक्विड फार्म में आ जाता है।
जो लोग खुदा के वजूद को नहीं मानते उनके लिए इस बात का कोई जवाब नहीं कि आखिर कैसे माल्क्यूल में चार्ज हमेशा उसी तरह सेट होता है कि माल्क्यूल आपस में जुड़ने की पावर पैदा कर लेते हैं। अगर कायनात में खुद ही सब कुछ बन गया है तो चांसेज इस बात के ज्यादा थे कि चार्ज का बिखराव हर माल्क्यूल में एक जैसा होता और दुनिया के सारे माल्क्यूल अलग अलग बिखरे पाये जाते। फिर न तो पहाड़ होते, न समुन्द्र न दरिया न इंसान और न ही पेड़ पौधे। क्योंकि ये सब माल्क्यूल्स के जुड़ने से ही तो बनते हैं।
इन सब के बाद खुदा ने इन माल्क्यूल्स को ये आजादी भी दे दी है कि वो उसके बनाये हुए कानूनों पर अमल करते हुए एक दूसरे से जुड़ते हुए नये माल्क्यूल्स की पैदाइश कर सकें। और मैटर की नयी नयी किस्में सामने आती जायें। मिसाल के तौर पर जब खुश्क और बेलज्जत अनाज, दालें वगैरा जब किचन में आग और पानी के साथ मिलती हैं तो नयी ज़ायकेदार डिशेज़ तैयार हो जाती हैं। इस पूरी प्रोसेज में अनाज वगैरा के माल्क्यूल आग और पानी की मौजूदगी में नये माल्क्यूल तैयार कर देते हैं। इस प्रोसेस को साइंस की ज़बान में केमिकल रियेक्शन कहा जाता है।
अल्लाह ने कुदरत में कुछ ऐसी आटोमैटिक मशीने पैदा कर दी है जो केमिकल रियेक्शन करते हुए इंसानों और दूसरे जानदारों के लिए रहमत का सामान करती रहती हैं। जैसे कि पेड़ पौधे जो हवा और मिट्टी से पानी, बासी हवा यानि कार्बन डाई ऑक्साइड और सूरज से रौशनी लेकर ताज़ी हवा यानि आक्सीजन और खाना तैयार करते हैं, जिससे जानदार साँस लेते हैं और अपना पेट भरते हैं।
अल्लाह ने अपनी किताब कुरान में कुछ इस तरह इस बात को कहा है,
16 वीं सूरे नहल की 10 वीं व ग्यारहवीं आयत में कहा गया है, ‘‘वही है अल्लाह कि जिसने आसमान से पानी भेजा कि जिसको तुम पीते हो, जिससे दरख्त उगते हैं, जिन्हें तुम्हारे जानवर खाते हैं। वह पैदा करता है तुम्हारे वास्ते उससे खेती, जैतन, खजूरें और हर किस्म के मेवे। इसमें निशानी है उन लोगों के लिए जो गौर करते हैं।’’
अल्लाह ने अपनी आटोमैटिक मशीनों के जरिये आलमे इंसानियत को यह राह दिखाई कि वे भी केमिकल रियेक्शन के जरिये अपने काम के माल्क्यूल तैयार करें और इंसानियत को फायदा हासिल हो। क्योंकि जमीन पर मौजूद हर चीज़ इंसान और इंसानियत के लिए है। सूरे बक़रा की 29 वीं आयत में यही इरशाद हुआ है कि ‘‘वही है जिस ने बनाया तुम्हारे वास्ते जो कुछ भी जमीन में है सब।’’
आज इंसान तरक्की की जिन मंजिलों पर है उसमें केमिकल रियेक्शन्स से बने हुए माल्क्यूल्स की पूरी हिस्सेदारी है। साइंस की एक पूरी ब्रांच केमिस्ट्री इन्हीं केमिकल रियेक्शन्स की स्टडी करने के लिए बनी हुई है। ये ब्रांच रोजाना नये नये माल्क्यूल्स की दरियाफ्त कर रही है। लेकिन खुदा की कुदरत का करि’मा देखिए कि हज़ारों सालों की स्टडी के बावजूद केमिस्ट्री अभी तक इस सवाल के जवाब तक नही पहुंच पायी है कि मैटर की इंतिहा कहां तक है?
मुर्दा चीज़ों से जिंदगी पैदा होना और जिंदगी का मुर्दा चीजों में बदल जाना भी केमिकल रियेक्शन ही है। जिसका कुरआन इन अल्फाज़ में जिक्र कर रहा है। दसवीं सूरे यूनुस की आयत 31 में कहा जा रहा है कि ‘‘हम ही मुर्दा से जिन्दा और जिन्दा से मुर्दा निकालते हैं।’’
माल्क्यूल्स का बनना और उनमें केमिकल रियेक्शन करने की क्वालिटी मौजूद होना यकीनन अल्लाह की बेमिसाल रहमत का नमूना है। जिसके लिए उसका जितना शुक्र किया जाये कम है।
Thursday, June 9, 2011
क्रियेटर और क्रियेशन - 4 (कार्बन)
वैसे तो हर एलीमेन्ट अपने अंदर कुछ खास नज़ारों की झलक समेटे हुए रहता है, लेकिन हम बात करते हैं उनमें भी खास एलीमेन्ट कार्बन के बारे में। कार्बन, जमीन पर पाया जाने वाला बहुत ही अहम एलीमेन्ट है। अहम इस तरह कि जमीन पर ज़िंदगी पैदा करने के लिए खालिके कायनात ने इसी एलीमेन्ट को चुना। जिसके नतीजे में यह जमीन पर मौजूद हर जिन्दा मखलूक का अहम और लाज़िमी जुज़ है।
आखिर परवरदिगार ने इसी एलीमेन्ट को क्यों चुना? शायद इसकी वजह ये है कि जो मखलूक रब की बारगाह में जितनी ज्यादा झुकती है, जितना नर्म अंदाज़ अख्तियार करती है खुदा उसे उतना ही ऊंचा मुकाम देता है। आईए कार्बन पर गौर करें। आमतौर पर मिलने वाला यह काले रंग का हक़ीर सा माद्दा है जो आसानी से घिस जाता है। खुदा ने इसी कार्बन को इतनी ऊंचाई बख्श दी कि यह हीरे की शक्ल में दुनिया का सबसे कीमती जवाहर बन कर भी मिलने लगा।
खुदा को ऐसे लोग पसंद आते हैं जो दूसरों से घुलमिल कर रहें। और एक दूसरे की मदद करें। कार्बन में भी कुछ ऐसी ही क्वालिटी पायी जाती है। वह आसानी से दूसरे एलीमेन्ट्स के साथ घुलमिल जाता है। यहां तक कि खुद उसी के एटम आपस में जुड़कर एक लम्बी चेन बना लेते हैं और अगर इस चेन में हाईड्रोजन, नाईट्रोजन, ऑक्सीज़न और सल्फर के भी एटम शामिल हो जायें तो मिलते हैं अमीनो एसिड व प्रोटीन, जो जिंदगी पैदा करने में कच्चे माल की तरह काम करते हैं। खुदाई करिश्मे की झलक देखिए कि बेजान कार्बन जिंदगी की तख्लीक कर रहा है। और साइंसदां इस पहेली से जूझ रहे हैं कि आखिर एक बेजान चीज में जान कैसे पड़ जाती है।
कार्बन फिजिकल तौर पर अनोखी खासियतों का मालिक है। एक तरफ तो यह हीरे की शक्ल में दुनिया का सबसे सख्त एलीमेन्ट है तो दूसरी तरफ गीली मिट्टी में मिक्स होकर यह सबसे नर्म एलीमेन्ट की शक्ल अख्तियार कर लेता है। यही नहीं इसकी अनेकों और भी शक्लो सूरतें हैं। धुएं की शक्ल में यह गैस है, ग्रेफाइट की हालत में आधी धातु है तो पेट्रोल बनकर यह लिक्विड की शक्ल में दिखाई देता है।
कभी इसमें से बिजली रवाँ हो जाती है। जैसे कि ग्रेफाइट में। तो कभी यह बिजली को रोक लेता है। जैसे कि जब यह डायमण्ड की शक्ल में होता है। एक ही एलीमेन्ट में बिल्कुल अपोज़िट क्वालिटीज़ का होना सुबूत है कि अल्लाह की खिलकत बेमिसाल है।
जमीन पर दो तरह का मैटर पाया जाता है। एक वह जिसमें कार्बन शामिल है, और दूसरा वह जिसमें कार्बन न शामिल होकर दूसरे एलीमेन्ट शामिल हैं। इनमें से पहले तरह का मैटर दूसरे की मेक़दार में बहुत ज्यादा है। इंसान व जानवरों के जिस्म में कार्बन शामिल होता ही है साथ ही उनके खाने पीने की सारी चीज़ों में भी कार्बन लाज़िमी तौर से शामिल रहता है। इसके अलावा इंसान की रोजमर्रा की चीज़ों यानि साबुन, तेल, परफ्यूम, रबर, प्लास्टिक, पेस्टीसाइड, ड्राईक्लीनर, पेट्रोल, एल-पी-जी- जैसी हजारों चीज़ों में कार्बन शामिल होता है। सिर्फ एक एलीमेन्ट का इस्तेमाल करते हुए खुदा के क्रियेशन की इतनी वेराईटीज़ दिखती हैं कि तसव्वुर भी नहीं किया जा सकता कि खालिके कायनात के क्रियेशन की हद कहां तक है।
अगर यह प्रोटीन की शक्ल में जिस्म को बनाता है तो पोटेशियम साईनाइड की शक्ल में दुनिया का सबसे खतरनाक ज़हर भी है। कार्बन से जुड़े मैटर को गिनते जाईए, इसकी किस्मों की कोई हद नहीं मिलेगी। और क्रियेटर की लामहदूदियत की तरफ इशारा करती है। अल्लाह की लामहदूद अक्ल ने सिर्फ एक एलीमेन्ट को ऐसी खासियतें बख्शी हैं कि वह लामहदूद मैटर का जरिया बन चुका है।
सवाल पैदा होता है परवरदिगारे आलम के कौन से उसूल कार्बन की इतनी ज्यादा शक्लें पैदा कर रहे हैं? इसका जवाब पाने के लिए देखना होगा इसके एटॉमिक स्ट्रक्चर को और इसके एटम की खुसूसियात को। कार्बन के एटम में छह इलेक्ट्रान और मरकज़ में छह प्रोटॉन होते है। इस तरह इसका एटामिक नंबर हुआ छह। इसके छह इलेक्ट्रानों में से चार इसके बाहरी आसमान यानि कि आर्बिट में चक्कर लगाते रहते हैं। इन इलेक्ट्रानों की वजह से कार्बन एटम में खुद अपने जैसे एटम या किसी और एलीमेन्ट के साथ मिलकर जोड़े बनाने की कूवत पैदा हो जाती है। कुछ इस तरह जैसे कि दो ऐसे लोग जिनके पास जमा पूंजी हो और वे आपस में पार्टनरशिप करके कोई बिजनेस शुरू कर दें। कार्बन की इस क्वालिटी की वजह से उसके और दूसरे एलीमेन्ट के एटम आपस में जुड़कर एक लम्बी चेन बना लेते हैं। नतीजे में मिलता है एक नया मैटर।
कार्बन की ये क्वालिटी बेशक मोजिज़ा है क्रियेटर का। दरअसल जो एटामिक स्ट्रक्चर कार्बन का है, इससे मिलते जुलते स्ट्रक्चर के कुछ और भी एलीमेन्ट्स हैं, जैसे कि सिलिकान, जर्मेनियम और टिन। इन सभी के बाहरी आसमान में चार इलेक्ट्रान होते हैं। इसके बावजूद इनमें से कोई भी एलीमेन्ट अपने एटम्स को जोड़कर चेन नहीं बनाता। यह क्वालिटी परवरदिगार ने सिर्फ कार्बन एटम को बख्शी है। यह मोजिज़ा नहीं तो और क्या है।
अल्लाह ने कार्बन एटम को बिल्डिंग बनाने वाली एक ऐसी ईंट की तरह खल्क किया है जो वज़न और साइज के एतबार से पूरी तरह मुनासिब है। एक बिल्डिंग को बनाने वाली ईंट अगर बहुत ज्यादा हल्की है या भारी है तो बिल्डिंग किसी भी तरह टिकाऊ नहीं बन सकती। इसी तरह अगर खुदा ने जिंदगी को बनाने वाले मोल्क्यूल में कार्बन चेन की बजाय किसी और एलीमेन्ट का इस्तेमाल किया होता तो या तो चेन अपने ही वज़न से टूट जाती या इतनी हल्की हो जाती कि जिस्म कभी वजूद में न आता। चार इलेक्ट्रान होने के बावजूद सिलिकॉन या जर्मेनियम अपने भारीपन की वजह से लम्बी चेन बनाने की सलाहियत नहीं रखते।
तो इस तरह कार्बन एटम के वज़न को खालिके कायनात ने इस तरह फाइन ट्यूनिंग पर सेट किया है कि वह जमीन की तमाम तर मखलूकात के हिस्सा है बल्कि उनके रिज्क़ का भी जरिया है और साथ ही उनकी दूसरी जरूरियात भी पूरी कर रहा है। खास तौर से इंसान की हर तरह की जरूरियात को पूरा करने में कार्बन कहीं न कहीं जरूर शामिल होता है।
कार्बन की दूसरी खासियत ये होती है कि उसके एटम कई तरीकों से आपस में जुड़ सकते हैं। नतीजे में कभी वह हीरे जैसा क्रिस्टल बना लेता है कभी नर्म भुरभुरा मैटर हो जाता है, कभी लिक्विड तो कभी गैस की शक्ल में आ जाता है। इस तरह ये जमीन पर हर जगह मिल सकता है। और जमीन पर मिलने वाली किसी भी मख्लूक के रिज्क का सामान कर सकता है। अगर मख्लूक जमीन पर है तो कार्बन मिट्टी से मिलकर उसका रिजक बन सकता है। अगर मख्लूक पानी में है तो कार्बन पानी के साथ मिलकर उसका रिज्क बन जाता है और अगर मख्लूक हवा में मौजूद है तो कार्बन हवा के साथ मिलकर रिज्क बनने की सलाहियत रखता है। और खालिके कायनात का ये वादा पूरा होकर रहता है कि उसने हर मख्लूक के रिज्क का इंतिजाम कर दिया है।
लामहदूद तरह के मैटर बनाने के बावजूद कार्बन और दूसरे एटम आपस में जुड़ते हुए खुदा के उसूलों को कभी नहीं तोड़ते। वह उसूल जो बाकी एलीमेन्ट्स पर भी साबित होते हैं। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि कार्बन जैसा एलीमेन्ट किसी इत्तेफाक से बन गया। यह तो क्रियेटर यानि कि अल्लाह के करिश्माई क्रियेशन का एक नमूना है। हर एलीमेन्ट पर साबित इस उसूल को वैलेंसी का उसूल कहा जाता है। इस उसूल के मुताबिक हर एलीमेन्ट दूसरे से मिलकर एक बान्ड यानि जोड़ बनाने की कुदरत रखता है। ये जोड़ या तो अलग अलग एटम के इलेक्ट्रॉन की आपसी शेयरिंग से बनते हैं या फिर एक एटम से दूसरे में ट्रांस्फर के जरिये। कार्बन के पास शेयरिंग के लिए चार इलेक्ट्रान होते हैं। यानि उसके पास चार तरह के बाण्ड बनाने की आजादी होती है। अब अगर उसको हाईड्रोजन के चार एटम मिल जायें तो वह चारों के साथ एक एक बाण्ड बना लेता है और नतीजे में मिल जाती है मेथेन गैस।
चार बाण्ड बनाने की आजादी का फायदा उठाते हुए कार्बन कुछ बाण्ड तो अपने ही एटम्स से जोड़कर बना लेता है और कुछ दूसरे एटम्स के साथ। नतीजे में मिलती है एक लम्बी चेन। जो कभी प्रोटीन की शक्ल में होती है, कभी कार्बोहाईड्रेट, कभी प्लास्टिक तो कभी कुदरती कम्प्यूटर डी-एन-ए की शक्ल में। प्रोटीन और प्लास्टिक जैसी चीज़ों में दस हजार से भी ज्यादा कार्बन एटम आपस में जुड़े रहते हैं। और कुछ केसेज में यह जोड़ इतने मज़बूत होते हैं कि हजारों टन की ताकत भी उन जोड़ों को तोड़ नहीं पाती। फाइबर जो कि कार्बन का ही प्रोडक्ट है, इसकी अच्छी मिसाल है। यकीनन यह क्रियेटर का करिश्मा है कि उसने एक कमज़ोर से एलीमेन्ट में इतनी ताकत पैदा कर दी है। यह वही कार्बन तो है जो जब एक पत्ती की शक्ल में होता है तो कोई भी उसे बाआसानी तोड़ लेता है।
जैसा कि हमने बताया ज़मीन पर जिंदगी की खिलकत के लिए खालिके कायनात ने जिस एलीमेन्ट को चुना वह खास एलीमेन्ट है कार्बन। जिंदगी के लिए दो चीज़ें ज़रूरी हैं। पहली ये कि जिन्दा मखलूक का कोई जिस्म हो और दूसरी ये कि उस जिस्म को काम करने के लिए उसे एनर्जी मिलती हो। कार्बन दोनों ही कामों में अहम किरदार निभाता है। जिस्म को बनाने में प्रोटीन का होना लाज़िमी है। और प्रोटीन का पचास फीसद हिस्सा कार्बन होता है। बाकी पचास फीसद में होते हैं हाईड्रोजन, नाईट्रोजन, ऑक्सीज़न और सल्फर।
दूसरी तरफ जिस्म को एनर्जी मिलती है कार्बोहाईड्रेट से। कार्बन कार्बोहाईड्रेट का भी खास जुज़ है। क्योंकि इसमें लगभग चालीस फीसदी कार्बन मौजूद होता है।
अब देखते हैं आलमे इंसानियत में कार्बन का कहां तक दखल है। अल्लाह ने कार्बन को आलमे इंसानियत के लिए रहमत बना दिया है। इंसान की जिंदगी को कोई ऐसा शोबा नहीं जहां कार्बन का दखल न हो। इंसान को जीने के लिए जिन चीज़ों की सबसे ज्यादा जरूरत है वह हैं रोटी कपड़ा और मकान।
हमने इससे पहले देखा कि कोई भी ऐसी खाने की अशिया नहीं जिसमें कार्बन का जुज़ न हो। यह ठीक है कि नमक में कार्बन नहीं होता, लेकिन किसी के लिए सिर्फ नमक खाना नामुमकिन है।
अब आते हैं कपड़े पर। किसी भी तरह का कपड़ा हो, कार्बन उसका लाज़िमी जुज़ होता है। साथ में जूते, मोज़े, परफ्यूम, तेल, साबुन, डिटरजेंट, क्रीम हर चीज़ में कार्बन मौजूद होता है। खुदा की कुदरत देखिए, नायलोन जैसा तेजी से आग पकड़ने वाला कपड़ा भी कार्बन से बना होता है और फायर प्रूफ व बुलेट प्रूफ लिबासों में भी कार्बन ही होता है।
फिर बात आती है मकान की। अगर मकान कच्चा है तो उस घास फूस के बने मकान में कार्बन शामिल होता है। और अगर मकान पक्का है तो स्टील के बिना नहीं बन सकता। और स्टील तब तक नहीं बनता जब तक लोहे में कार्बन की मिलावट न की जाये। एक तरफ यह लोहे में मिक्स होकर सख्त स्टील बनाता है तो दूसरी तरफ हाईड्रोजन से जुड़कर पालीथीन जैसा लचीला मैटर बना देता है। मकानों को चमकाने वाला पेन्ट, वार्निश हो या मकान को खूबसूरत बनाने वाले प्लास्टिक शेड्स, डिजाईनदार लकड़ी के दरवाज़े और खूबसूरत बगीचे हों हर जगह कार्बन मौजूद होता है।
दवाएं चाहे एण्टीसेप्टिक हों, एण्टीबायोटिक हों या सल्फा ड्रग्स हों सब में कार्बन मौजूद होता है।
आज कार्बन की ही वजह से मौजूदा जिंदगी की रफ्तार भी कायम है। सड़कों पर तेज रफ्तार दौड़ती गाड़ियां, शहरों को जोड़ती रेलगाड़ियां, हवाई जहाज़ इन सब को चलाने वाले पेट्रोल और डीज़ल जैसे ईंध्ना कार्बन के ही प्रोडक्ट हैं। आज इंसान तरक्की की जिन मंजिलों पर है, क्या पेट्रोलियम के बिना उसका तसव्वुर हो सकता था? और पेट्रोलियम का बदल यानि कोयला खुद भी कार्बन है। दुनिया में बनने वाली बिजली का ज्यादातर हिस्सा कोयले को जलाकर बनता है।
कहां तक गिनाये जायें कार्बन के रंग व रूप। अगर इंसानी जिस्म की बात की जाये तो एक तरफ जिस्म को नुकसान पहुंचाने वाले जरासीम यानि बैक्टीरिया और वायरस कार्बन से बने होते हैं तो दूसरी तरफ इनसे बचने का जिस्म का इम्यून सिस्टम, खून और खून में मौजूद सफेद जर्रात भी कार्बन के ही प्रोडक्ट होते हैं। ज़मीन को ज़रखेज़ बनाने वाले और चीज़ों को सड़ा गलाकर खत्म करने वाले दोनों ही तरह के बैक्टीरिया में कार्बन खास जुज़ होता है। फलों का रस, शराब और सिरके तीनों में ही कार्बन मौजूद होता है। खुदा की कुदरत देखिए कि फलों का रस और सिरका तो सेहत के लिए फायदेमन्द है और शराब नुकसानदेय। इन चीज़ों को एक दूसरे में बदलने के पीछे जो बैक्टीरिया शामिल होते हैं उनमें भी कार्बन अहम जुज़ होता है।
कार्बन इंसान के इल्म का भी बहुत बड़ा ज़रिया है। पुरानी चीज़ों की उम्र मालूम करने के लिए साइंस ने एक तरीका ईजाद किया है जिसका नाम है कार्बन डेटिंग। दरअसल कार्बन का एक आईसोटोप यानि रिश्तेदार होता है जिसे रेडियो कार्बन या सी - 14 कहा जाता है। जब कोई मखलूक जिन्दा होती है तो वह आम कार्बन और रेडियो कार्बन दोनों को ही अपने जिस्म में सोखती रहती है। लेकिन मरने के बाद वह रेडियो कार्बन को सोखना बन्द कर देती है और उसके मुर्दा जिस्म में मौजूद रेडियो कार्बन धीरे धीरे कम होना शुरू हो जाता है। जिस्म में रेडियोकार्बन का हिस्सा देखकर उसकी उम्र का अंदाजा हो जाता है।
अब एक सवाल पैदा होता है कि क्या खुदा ने अपनी किताब कुराने हकीम में इस बहुत ही अहम एलीमेन्ट का जिक्र फरमाया है? जी हां। इसका जिक्र कुरान में मौजूद है। और बहुत ही अहम जगह पर। कुरान की 41 वीं आयत सूरे फसीलत है। ये वो सूरे है जिसको पढ़ने के बाद परवरदिगार की बारगाह में सज्दा वाजिब हो जाता है। इसकी आयत नं 11 में कायनात के बनने का जिक्र करते हुए इरशाद होता है, ‘‘फिर वह आसमान की तरफ मुत्वज्जे हुआ जो उस वक्त धुएं की शक्ल में था।’’
हम जानते हैं कि धुएं का बेशतर हिस्सा कार्बन ही होता है। या यूं भी कह सकते हैं कि कार्बन अगर गैस की हालत में है तो वह धुवां होता है। इस तरह यह साफ हुआ कि कायनात की पैदाइश से ही कार्बन का अहम रोल रहा है।
परवरदिगारे आलम सूरे रहमान में इरशाद फरमाता है - ‘तो तुम अपने परवरदिगार की किन किन रहमतों को झुठलाओगे।’
हकीकत तो ये है कि अगर हम उस माबूद की रहमत की शक्ल में सिर्फ कार्बन की अहमियत को पहचान लें तो खुदा के सामने सज्दा करने पर मजबूर हो जायें।
Friday, June 3, 2011
क्रियेटर और क्रियेशन - 3 (एलीमेन्ट्स)
इंसान ने जब से इस दुनिया में होश संभाला है, उसने अपने चारों तरफ अनगिनत चीज़ें मौजूद पायीं। उन चीजों में से कुछ को उसने जानदार पाया जैसे कि जानवर और पेड़ पौधे। और कुछ को बेजान पाया जैसे कि पत्थर, पहाड़ और पानी। इन चीज़ों ने उसके दिमाग में एक सवाल पैदा किया। क्या कुछ ऐसा खास मैटर है जिससे दुनिया की सारी चीज़ें तैयार होती हैं? मिसाल के तौर पर रोटी, केक, नान या इस तरह की सारी चीज़ों के बनाने के पीछे जो चीज़ें होती हैं वह हैं गेहूं और पानी। गेहूं और पानी को हम रोटी, केक या नान के एलीमेन्ट कह सकते हैं। इसी तरह किसी इमारत को बनाने वाले एलीमेन्ट हैं सीमेंट, मौरंग, बालू वगैरा। तो क्या कुछ ऐसे एलीमेन्ट हैं जो दुनिया की सारी चीज़ों को बनाते हैं।
इस बारे में क़दीम हिन्दुस्तान के फलसफियों ने ग़ौरो-फिक्र के बाद ये नतीजा निकाला कि दुनिया में हर तरह का मैटर दरअसल पाँच तत्वों यानि एलीमेन्ट्स से मिलकर बना होता है। ये पाँच तत्व हैं हवा, मिट्टी, पानी, आग और आकाश। ये हिन्दुस्तानी फिक्र अरस्तू जैसे यूनानी फिलास्फर ने भी कुबूल की।
लेकिन इस तसव्वुर को तोड़ा सबसे पहले इस्लामी दानिश्वर इमाम जाफर सादिक (अ-) ने। उन्होंने इस थ्योरी को इन अल्फाज में नकारा, ‘मुझे हैरत है कि अरस्तू ने हवा को एलीमेन्ट कहा। जबकि हवा बहुत से एलीमेन्ट्स का मिक्सचर है। इनमें से हर एलीमेन्ट साँस लेने के लिए जरूरी है। इसी तरह मिट्टी खुद एलीमेन्ट नहीं है बल्कि मिक्सचर है एलीमेन्ट्स का। मिट्टी में पायी जाने वाली हर धातु एक एलीमेन्ट है।
साइंस और टेक्नालॉजी ने जैसे जैसे तरक्की की, यह साफ होता गया कि मिट्टी, पानी, आग, हवा के साथ जमीन पर मिलने वाली हर चीज कुछ एलीमेन्ट्स का मजमुआ होती है। इन एलीमेन्टस में से कुछ धातु होते हैं और कुछ गैर धातु । लोहा, तांबा, एल्यूमिनियम, पारा वगैरा धातु एलीमेन्ट हैं जबकि ऑक्सीजन, हाईड्रोजन, क्लोरीन, कार्बन वगैरा गैर धातु हैं।
अब तक जमीन पर लगभग एक सौ सोलह तरह के एलीमेन्ट्स ढूंढे जा चुके हैं। इनमें कार्बन, आक्सीजन, नाईट्रोजन और हाईड्रोजन सबसे ज्यादा अहम है। क्योंकि ये हर तरह की लाइफ को बनाते हैं। जमीन पर मौजूद हर एलीमेन्ट दूसरे से क्वालिटीज़ के एतबार से पूरी तरह अलग होता है। वह कौन सी बातें हैं जिनकी वजह से हर एलीमेन्ट दूसरे से पूरी तरह अलग होता है? यह सवाल बरसों तक साइंसदानों के बीच एक अबूझ पहेली की तरह घूमता रहा। जवाब उस वक्त मिला जब साइंसदानों ने एटम की डिस्कवरी की और एटम की बनावट को पूरी तरह समझा।
जैसा कि इससे पहले हमने जाना कि हर एटम का एक मरकज़ यानि न्यूक्लियस होता है जिसमें पार्टिकिल प्रोटॉन और न्यूट्रान पाये जाते हैं, और इस मरकज़ के चारों तरफ इलेक्ट्रान अलग अलग आर्बिट में चक्कर लगाते रहते हैं। साइंसदानों ने यह पाया कि अलग अलग एलीमेन्ट के एटम में इलेक्ट्रानों और प्रोटॉनों की तादाद अलग अलग होती है। अगर हाईड्रोजन के एटम में एक इलेक्ट्रान व एक प्रोटॉन होता है, तो वहीं ऑक्सीजन में आठ इलेक्ट्रॉन व आठ प्रोटॉन होते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि अल्लाह ने एक एटम की खिलकत के बाद उसी से बहुत सारे एलीमेन्ट्स तैयार कर दिये और फिर उनसे पूरी कायनात की खिलकत कर दी। जिसमें सूरज, चाँद, सितारे, ज़मीन, पानी, पहाड़, जानदार, हम और आप सब शामिल हैं। यही है खालिके कायनात की शान।
एटम में इलेक्ट्रानों और प्रोटॉनों की तादाद का डिफरेंस हर एलीमेन्ट को दूसरों से अलग करता है। और हर एलीमेन्ट अपनी एक अलग पहचान बनाता है। साइंसदानों ने किसी एलीमेन्ट में पाये जाने वाले प्रोटॉनों की तादाद को एक नाम दिया है ‘एटामिक नंबर’।
आईए चन्द मिनटों में एक नज़र डालते हैं जमीन में पाये जाने वाले कुछ एलीमेन्ट्स पर। उनके एटामिक नंबर पर और उनकी एक किसी खास क्वालिटी पर। हम देखेंगे कि एलीमेन्ट्स की मौजूदगी दरअसल सुबूत है खालिके कायनात के एक होने का और साथ में उसकी इनफाईनाईट अक्ल का। इसलिए क्योंकि बेसिक स्ट्रक्चर एक होने के बावजूद हर एलीमेन्ट की अपनी एक अलग पहचान है।
हाईड्रोजन जिसका एटामिक नंबर एक है, दुनिया का सबसे हल्का एलीमेन्ट है।
हीलियम जिसका एटामिक नंबर दो है, दुनिया की सबसे कम टेम्प्रेचर तक कायम रहने वाली गैस है।
दुनिया की सबसे हल्की धातु लीथियम है जिसका एटामिक नंबर तीन है। यह धुएं सी हल्की होती है।
सैटेलाइट का एंटीना बनाने में इस्तेमाल होने वाला एलीमेन्ट बेरीलियम का एटामिक नंबर है चार।
कार्बन में चेन की तरह आपस में जुड़कर लाखों चीज़ें बनाने की ताकत होती है। एटामिक नंबर है इसका छह।
सातवें नंबर का एलीमेन्ट नाईट्रोजन भी अत्यन्त उपयोगी है। जो हवा में अस्सी फीसदी शामिल होता है। खाद तथा बारूद दोनों में ही यह मिलता है।
किसी भी चीज को जलाने के लिए जरूरी एलीमेन्ट है ऑक्सीजन आठवें नंबर पर।
बीसवें नम्बर का एलीमेन्ट कैल्शियम हडिडयों, चाक और सीमेंन्ट का खास जुज़ होता है।
आयरन का एटामिक नंबर छब्बीस होता है। सख्त व मजबूत होने की वजह से सुई से लेकर ऊंचे टावर तक बनाने में इसका इस्तेमाल होता है।
हम देखते हैं कि जमीन पर पाये जाने वाला हर एलीमेन्ट किसी न किसी तरीके से इंसान या जमीन की दूसरी मखलूकात के लिए कारआमद होता है, इस बात का सुबूत देते हुए कि खालिके कायनात ने कोई चीज बेवजह नहीं खल्क की है। हर चीज़ अल्लाह की रहमत का सुबूत है। हमारा और पूरी कायनात का परवरदिगार जो रहमान भी है और रहीम भी।
जमीन पर पाये जाने वाले एक सौ सोलह एलीमेन्ट्स में हर कोई दूसरों से पूरी तरह अलग होता है बावजूद इसके कि सभी में एटामिक स्ट्रक्चर एक जैसा होता है। यानि एक न्यूक्लियस जिसके चारों तरफ चक्कर लगाते कुछ इलेक्ट्रान। सिर्फ इलेक्ट्रानों व प्रोटानों की तादाद हर एक में अलग होने की वजह से हर एलीमेन्ट अपनी एक अलग पहचान बना लेता है।
खालिके कायनात ने हर एलीमेन्ट को कुछ ऐसी अलग खुसूसियात बख्शी हैं कि वह किसी न किसी तरीके से हमारे लिए पूरी तरह कारआमद हो जाता है। जैसे कि ऑक्सीजन। इसकी खास बात ये है कि यह हर चीज को जलने में मदद देती है। लेकिन खुद नहीं जलती। अगर इसमें खुद भी जलने की खासियत होती तो यह एलीमेन्ट बेकार साबित हो जाता।
इसी तरह कुछ एलीमेन्ट जरूरत के हिसाब से अपनी कंडीशन बदल भी लेते हैं।
मिसाल के तौर पर नाईट्रोजन गैस होती है। लेकिन पौधों की खाद की जरूरत पूरी करने के लिए ये नाइट्रेट बनाकर ठोस शक्ल में आ जाती है।
कुछ केसेज में एक एलीमेन्ट अगर कहीं काम आता है तो दूसरा एलीमेन्ट उसी फील्ड में कुछ अलग तरह से काम आ जाता है। एक अच्छा आईना बनाने के लिए चाँदी की पालिश करते हैं, वहीं अगर ऐसा आईना बनाना है जिसके एक तरफ तो चेहरे की शबी दिखे और दूसरी तरफ से आरपार दिखाई दे तो प्लेटिनम की पालिश से यह काम हो जाता है। अल्लाह की कुदरत देखिए कि दोनों एलीमेन्ट एक ही काम अलग अलग तरीके से कर रहे हैं। कभी सोने और चांदी के सामने प्लेटिनम कौड़ियों के मोल बिकता था। लेकिन आज अपने क्वालिटीज़ की वजह से यह सबसे कीमती धातु बन चुकी है।
कुछ ऐसे भी एलीमेन्ट परवरदिगारे आलम ने खल्क किये हैं जो अलग अलग रूप व रंग में अलग अलग तरह से काम आते हैं। मिसाल के तौर पर कार्बन। कोयले की शक्ल में ईंधन होता है, तो हीरे की शक्ल में जवाहर। ग्रेफाइट की शक्ल में मज़बूत पेंसिल की तरह काम करता है तो परफ्यूम से लेकर फिल्टर जैसी बीसियों कारआमद चीजों मे नजर आता है। साथ ही ये हर जिन्दा चीज़ का बुनियादी जुज़ है।
अलग पहचान बनाने के बावजूद एलीमेन्ट्स में आपस में कई तरह की शबाहतें भी होती हैं। जैसे कि लोहा, तांबा, जिंक जैसे एलीमेन्ट धातु है, वहीं ऑक्सीजन, हाईड्रोजन और नाईट्रोजन गैस हैं।
यह पाया गया है कि एलीमेन्ट्स को उनकी शबाहत की बिना पर अलग अलग ग्रुपों में रखा जा सकता है। और ग्रुपों का यह मजमुआ पीरियाडिक टेबिल कहलाता है। यानि अल्लाह ने बहुत सारे एलीमेन्ट खल्क करने के बाद उन्हें पहचानने और उनकी अनजान खासियतों को मालूम करने के लिए कुछ आसान तरीके रख दिये हैं।
इन शबाहतों में भी अल्लाह की मसलहत छुपी हुई है। अगर कोई एलीमेन्ट कम मयस्सर है या नहीं मिल पा रहा है तो उसकी जगह दूसरे से काम लिया जा सकता है। मिसाल के तौर पर कम्प्यूटर के सर्किट बनाने में सिलिकान का इस्तेमाल होता है। लेकिन अगर सिलिकॉन मयस्सर नहीं है तो उसकी जगह जर्मेनियम या गैलियम का भी इस्तेमाल होता है। इसी तरह एटॉमिक एनर्जी हासिल करने के लिए यूरेनियम के साथ प्लूटोनियम और थोरियम का भी इस्तेमाल होता है।
खालिके कायनात ने एलीमेन्ट्स को कुछ इस तरह भी खल्क किया है कि वो हमारी हर तरह की जरूरत आपस में मिलकर पूरी कर सकें।
मिसाल के तौर पर हमें बिजली की जरूरत है तो उसको एक जगह से दूसरी जगह भेजने के लिए कॉपर और एल्यूमिनियम जैसे एलीमेन्ट मौजूद हैं जिनके तारों में बाआसानी बिजली रवाँ हो जाती है। इसी के साथ कुदरत में कार्बन जैसे ऐसे भी एलीमेन्ट मौजूद हैं जिनकी मदद से रबर और प्लास्टिक जैसे इन्सुलेटर बनाये जा सकते हैं, ताकि वही बिजली हमारे जिस्म को कोई नुकसान न पहुंचा दे। जरा गौर कीजिए कि अगर इन्सुलेटर न होते तो जिस तरह बादलों की बिजली का हम इस्तेमाल नहीं कर पा रहे, उसी तरह इंसान की बनाई बिजली भी किसी काम की न रह जाती। अगर अल्लाह ने साँस लेने में निहायत जरूरी ऑक्सीजन खल्क की तो उसको बैलेंस करने के लिए नाईट्रोजन जैसी गैस भी खल्क कर दी। ताकि यही ऑक्सीजन इतनी ज्यादा न हो जाये कि फेफड़ों के सेल्स को ही जलाना शुरू कर दे।
इस तरह हम देखते हैं कि हर एलीमेन्ट अपने में हैरत अंगेज है।
Friday, May 20, 2011
क्रियेटर और क्रियेशन - 2 (न्यूक्लियस)
एटम का राज़ अधूरा है जब तक कि न्यूक्लियस की बात न की जाये। न्यूक्लियस, जो एटम का मरकज़ होता है, बहुत बड़ी निशानी है क्रियेटर की बेमिसाल तख्लीक़ की।
बीसवीं सदी की शुरुआत में एक डिस्कवरी हुई। वह डिस्कवरी न्यूक्लियर पावर की थी, जिसे आम जबान में एटामिक पावर भी कहते हैं। पूरी दुनिया ने इस ताकत को महसूस किया जब इसी न्यूक्लियर पावर की वजह से जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी का वजूद पूरी तरह मिट गया। तब दुनिया ने पहचाना कि न्यूक्लियस और उसकी ताकत क्या है।
और ईमानवालों को सोचने पर मजबूर किया कि अगर एक जर्रे यानि एटम के छोटे से हिस्से में इतनी ताकत भरी हुई है जिसे रब ने खल्क किया है, तो क्या कोई खालिके कायनात की ताकत का तसव्वुर कर सकता है?
हम जान चुके हैं कि एटम में इलेक्ट्रॉन एक मरकज़ के चारों तरफ लगातार गर्दिश में रहते हैं। यही मरकज़ या सेन्टर न्यूक्लियस है। न्यूक्लियस का साइज़ पूरे एटम का दस हजारवाँ हिस्सा होता है। लेकिन यह भी फैक्ट है कि एटम का लगभग पूरा वज़न न्यूक्लियस की ही वजह से होता है।
अब सवाल पैदा होता है कि न्यूक्लियस की बनावट कैसी होती है? इस सवाल ने बरसों साइंसदानों को चकराये रखा। और आज भी इसका जवाब पूरी तरह नहीं मिल पाया है। क्रियेटर ने इस छोटे से वजूद में इतनी बारीक कारीगरी कर रखी है जिसकी कोई मिसाल नहीं। हर रोज़ इसके बारे में नये नये इन्किशाफ हो रहे हैं। और इंसान का दिमाग हैरत में है।
बीसवीं सदी की शुरूआत में साइंसदाँ रदरफोर्ड ने एक एक्सपेरीमेन्ट किया। जिससे पहली बार मालूम हुआ कि एटम का एक सेन्टर होता है, जो पूरी तरह ठोस होता है। जबकि इलेक्ट्रान इसके चारों तरफ स्पेस में चक्कर लगाते रहते हैं। उस वक्त तक प्रोटॉन की डिस्कवरी हो चुकी थी, और यह पाया गया था कि उसपर पाजिटिव चार्ज होता है। रदरफोर्ड ने कहा कि यही प्रोटॉन आपस में जुड़कर एटम के न्यूक्लियस को बनाते हैं।
बाद में जेम्स चैडविक ने इसी न्यूक्लियस में एक और पार्टिकिल न्यूट्रान की दरियाफ्त की। और तब यह साफ हुआ कि न्यूक्लियस दरअसल प्रोटॉन और न्यूट्रान का मजमुआ यानि कलेक्शन होता है। इस तरह कल तक इंसान एटम के जिस सेन्टर को ठोस और अकेला समझता था, मालूम हुआ कि यह भी बहुत छोटे छोटे जर्रों से मिलकर बना है। इन जर्रों को फंडामेन्टल पार्टिकिल कहा गया।
अब यहां से कुछ पहेलियों की शुरूआत होती है, जिनके हल के दौरान खालिके कायनात के बहुत से करिश्मे नज़र आते हैं।
हाईड्रोजन के अलावा जो भी मैटर होता है, उसके एटम में एक से ज्यादा प्रोटॉन न्यूक्लियस के अंदर मौजूद होता हैं। यहां से शुरूआत होती है पहेली नंबर एक की।
इससे पहले हमने बिजली की ताकत के बारे में जाना। दो एक जैसे चार्जेज के बीच यह ताकत दोनों पार्टिकिल को एक दूसरे से दूर भगाती है। अब सारे प्रोटॉन एक ही तरह के चार्ज यानि पाजिटिव चार्ज के हामी होते हैं। फिर तो वह सब एक दूसरे से दूर बिखरे होने चाहिए। लेकिन अजीब बात है कि न्यूक्लियस में बिजली की ताकत का कानून होने के बावजूद बीसियों प्रोटॉन एक दूसरे से मिले हुए मौजूद रहते हैं। है न खालिके कायनात के क्रियेशन का एक और करिश्मा?
दरअसल खालिके कायनात ने न्यूक्लियस के हिस्सों यानि प्रोटॉन और न्यूट्रान को आपस में जोड़ने के लिए एक और ताकत पैदा कर दी है। साइंसदां इस ताकत को न्यूक्लियर फोर्स कहते हैं। ये ताकत इतनी ज्यादा होती है कि बिजली की ताकत इसके सामने फीकी पड़ जाती है। नतीजे में प्रोटॉन न्यूक्लियस में बंधे रहते हैं, जैसे किसी ग्लू से आपस में जोड़ दिये गये हों।
यहां से पैदा होती है पहेली नंबर दो। न्यूक्लियस की यह ताकत अगर बिजली की ताकत से कई गुना ज्यादा है तो क्यों नहीं यह इलेक्ट्रान को भी खींचकर न्यूक्लियस में शामिल कर लेती?
दरअसल अल्लाह ने इस ताकत को भी निहायत फाइन ट्यूनिंग पर सेट किया है। हालांकि न्यूक्लियर फोर्स बिजली की ताकत से लाखों गुना ज्यादा होता है। लेकिन इसकी रेंज बहुत कम होती है। यानि यह सिर्फ न्यूक्लियस के दायरे के अंदर ही काम करता है। जबकि न्यूक्लियस के बाहर बिजली की ताकत काम करने लगती है।
अगर न्यूक्लियर फोर्स की रेंज बढ़ जाये तो इलेक्ट्रॉन अपना घूमना छोड़कर न्यूक्लियस में समा जायेंगे और एटम का वजूद खत्म हो जायेगा। ये उसी क्रियेटर का करिश्मा है कि माइक्रो कायनात में दो बिल्कुल अलग अलग तरह की ताकतें कायम हैं और फाइन ट्यूनिंग के साथ अपना काम कर रही हैं। इनमें से हर ताकत की अपनी अलग रेंज है। जिससे ये दूसरी ताकत पर असरअंदाज नहीं होती। यहां से अल्लाह की कुदरत का पता चलता है जिसे देखकर साइंसदां हैरत में पड़ जाते हैं।
इस तरह हम देखते हैं कि एटम का वजूद इसलिए है क्योंकि अल्लाह की कुदरत ने इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन सभी के लिए मुनासिब सूरतें तैयार कर दी हैं। ये सब अपनी अपनी हद में रहते हुए अपना काम करते रहते हैं और मैटर का वजूद कायम रहता है।
तो यह सब निशानियां हैं अल्लाह नूरुस्समावत वल अर्ज के वजूद की। और उसकी इनफाईनाइट अक्ल की। वही है हर तरह की एनर्जी और पावर का क्रियेटर।
एक पल को अगर मान लिया जाये कि यूनिवर्स में जो कुछ भी है वह कई इत्तेफाकों का नतीजा है, जैसा कि अक्सर नामनिहाद अक्लमन्दों का कहना है, तो ज्यादा पासिबिलिटी ये थी कि एटम पूरी तरह ठोस होता और प्रोटॉन, इलेक्ट्रॉन सब एक दूसरे से जुड़े होते। या फिर इलेक्ट्रान और प्रोटॉन जोड़ों की शक्ल में पूरे यूनिवर्स में बिखरे होते। दोनों के बीच बिजली की ताकत होने का मतलब तो यही बनता है। चांसेज इस बात के भी थे कि अलग अलग चीज़ों के एटम का बेसिक स्ट्रक्चर अलग अलग होता। कुछ में इलेक्ट्रॉन अगर न्यूक्लियस के गिर्द गर्दिश में होते तो कुछ में न्यूक्लियस में धंसे होते। लेकिन हर एटम का एक जैसा स्ट्रक्चर साबित करता है कि इन्हें बनाने वाला क्रियेटर एक और सिर्फ एक है।
जिस शक्ल में आज एटम मौजूद है, उस शक्ल का बनना तो सिरे से मुमकिन ही न था। तो इस तरह एटम या उसके न्यूक्लियस का बनना ही अपने आप में खालिके कायनात की मौजूदगी का बहुत बड़ा सुबूत है। दुनिया का बड़े से बड़ा साइंटिस्ट यह दावा नहीं कर सकता कि एटम उसने बनाया है या बना सकता है। एटम को देखने वाला साइंटिस्ट है लेकिन बनाने वाला कोई और है।
अब बात करते हैं एक और डिस्कवरी की। बीसवीं सदी की शुरूआत में एक नयी डिस्कवरी ने फिर से साइंसदानों को चक्कर में डाल दिया। यह देखा गया कि कुछ खास तरह का मैटर होता है जिसमें से अनोखी रेज़ यानि किरणें निकलती हैं। इन किरणों को रेडियोऐक्टिव किरणें कहा गया। इन किरणों को निकालने वाले मैटर में शामिल थे रेडियम, यूरेनियम, थोरियम, रेडान वगैरा।
बाद में जब इन किरणों की और स्टडी हुई तो यह पाया गया कि यह न्यूक्लियस से निकलती हैं। और तीन तरह की होती हैं। इन्हें नाम दिये गये अल्फा, बीटा और गामा। अल्फा के बारे में मालूम हुआ कि ये छोटे छोटे तेज़ रफ्तार जर्रे होते हैं और हर जर्रे में दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रान शामिल होते हैं।
लेकिन सबसे अजीब बात जो मालूम हुई वह बीटा किरणों के बारे में थी। बीटा किरणें दरअसल तेज़ रफ्तार इलेक्ट्रानों की बौछार थीं।
अब सवाल पैदा हुआ कि अगर न्यूक्लियस में इलेक्ट्रान पाये नहीं जाते तो फिर बीटा किरणों की शक्ल में बाहर कैसे निकलते हैं? यह एक ऐसी पहेली थी जिसने फिर से साइंसदानों को अपने फार्मूले बदलने पर मजबूर कर दिया।
जब इस पहेली को हल किया जापानी साइंटिस्ट यूकावा ने, तो एक ऐसा इन्किशाफ हुआ जिसने एक बार फिर साइंसदानों को हैरत के समुन्द्र में गोते खाने पर मजबूर कर दिया। और सूरे रहमान की 29 वीं आयत एक बार फिर पूरी आबोताब के साथ नज़र आयी, ‘‘जमीन व आसमान में जो भी मखलूकात हैं, सब अपनी हाजतें उसी से मांग रहे हैं। हर आन वह नयी शान में है।’’
यूकावा ने न्यूक्लियस में एक नये पार्टिकिल मेसॉन की डिस्कवरी की। उसने बताया कि यह मेसॉन पाजिटिव, निगेटिव और न्यूट्रल तीन तरह के होते हैं। फिर उसने एक और हैरतअंगेज़ बात बतायी कि निगेटिव मेसॉन जब न्यूक्लियस के प्रोटॉन से जुड़ता है तो न्यूट्रान बन जाता है। इसी तरह न्यूट्रान से निगेटिव मेसॉन जब अलग होता है या पाजिटिव मेसॉन जुड़ता है तो प्रोटॉन बन जाता है। इसका मतलब ये हुआ कि न्यूक्लियस में मौजूद प्रोटॉन और न्यूट्रान लगातार अपनी शक्लें बदलते रहते हैं। अगर न्यूक्लियस में दो प्रोटॉन और दो न्यूट्रान हैं तो हमेशा इतनी ही क्वांटिटी में रहेंगे। लेकिन उनकी शक्लें बदलती रहेंगी। और ऐसा एक सेकंड में दस अरब मर्तबा होता है।
तो अगर सिर्फ न्यूक्लियस की बात की जाये तो खालिके कायनात एक न्यूक्लियस में एक सेकंड में दस अरब बार अपनी शान दिखलाता है, साहबे अक्लो फहम रखने वालों को। जिससे वह खालिके कायनात के बारे में सोचने पर मजबूर हो जायें। वह यकीनन ‘हर आन एक नयी शान में है।’
हम यूं भी कह सकते हैं कि न्यूक्लियस के भीतर एक सेकंड के दस अरबवें हिस्से में प्रोटॉन और न्यूट्रॉन अपनी शक्लें बदल लेते हैं। मेसॉनों के जरिये पार्टिकिल का यह बदलाव न्यूक्लियर फोर्स की पैदाइश का भी जरिया है। अगर एक सेकंड में दस अरब बार यह करिश्मायी प्रोसेस न हो तो न्यूक्लियर फोर्स कमजोर पड़ जायेगा। नतीजे में न्यूक्लियस एक धमाके के साथ फट जायेगा।
लेकिन क्या कभी नेचर में आपने किसी एटम को धमाके के साथ फटते देखा है? इसका मतलब मेसॉनों की यह प्रोसेस कभी मांद नहीं पड़ती। इतनी फाइन ट्यूनिंग के साथ यह प्रोसेस क्या सुबूत नहीं उस माबूद की मौजूदगी और उसकी कण्ट्रोलिंग पावर का जिसने हर मखलूक को हमेशा रिज्क़ देने का वादा किया है? यहां वह एनर्जी की शक्ल में लगातार न्यूक्लियस को रिज्क दे रहा है ताकि एटम का वजूद बना रहे।
इसी के साथ उसी क्रियेटर ने कुछ ऐसे भी न्यूक्लियस बना रखे हैं जिसमें प्रोटॉन और न्यूट्रान के आपस में शक्लें बदलने की प्रोसेस हल्की सी एक तरफ को झुकी होती है। जिसका नतीजा रेडियोऐक्टीविटी की शक्ल में नमूदार होता है। यानि हाई स्पीड बीटा किरणें दरअसल उन निगेटिव चार्ज मेसॉनों से बनती हैं जो न्यूक्लियर प्रोसेस के दौरान फ्री हो जाते हैं।
अब सवाल यह पैदा होता है कि जिस क्रियेटर ने परफेक्ट न्यूक्लियस बनाये उसने रेडियोऐक्टिव मैटर में यह कमी क्यों छोड़ दी? क्या इससे यह साबित होता है कि क्रियेटर की परफेक्टनेस में कोई कमी है?
जवाब यह है कि ऐसा हरगिज़ नहीं है। दरअसल माबूद ने परफेक्ट चीज़ें बनाने के बाद उन्हीं में कुछ ऐसे लूप होल रख दिये हैं जिनके जरिये इंसान उसकी बनाई दुनिया को समझ सकता है, पहचान सकता है। आज हम एटम या उसके न्यूक्लियस के बारे में जो कुछ भी जानते हैं उसके पीछे रेडियोऐक्टिव मैटर का बहुत बड़ा रोल है। अगर इंसान बीमार न पड़ता तो मेडिकल साइंस का कोई वजूद न होता और इंसान खुद अपने जिस्म के बारे में अँधेरे में होता।
ये लूप होल हमारे बहुत काम के भी होते हैं। इसी रेडियोऐक्टिव मैटर ने इंसान के सामने दरवाजा खोला न्यूक्लियर पावर का। लगभग सौ साल पहले आइंस्टीन ने दुनिया के सामने एक इक्वेशन पेश की, जिसने फिजिक्स की दुनिया में तहलका मचा दिया। वह इक्वेशन थी E=mc^2 इस इक्वेशन के जरिये आइंस्टीन ने बताया कि मैटर को एनर्जी में तब्दील किया जा सकता है। उसके बाद इसका फिजिकल वेरीफिकेशन भी हो गया जब रदरफोर्ड ने रेडियोऐक्टिव यूरेनियम के न्यूक्लियस पर न्यूट्रान की बमबारी की और न्यूक्लियस दो हिस्सों में टूट गया। साथ में मिली एनर्जी बेशुमार ।
पहली बार दुनिया ने देखा कि आँखों से ओझल दुनिया का सबसे बारीक जर्रा अपने भीतर कितनी अज़ीम पावर लिये हुए है, और इस तरफ इशारा कर रहा है कि खालिके कायनात की पावर बेशक लामहदूद है।
एटम की यह पावर या एनर्जी उसके न्यूक्लियस में छुपी होती है। दरअसल जब न्यूक्लियस टूटता है छोटे टुकड़ों में या छोटे टुकड़े मिलकर एक बड़ा न्यूक्लियस बनाते हैं तो इस दौरान कुछ मैटर एनर्जी में तब्दील हो जाता है। यही है न्यूक्लियर एनर्जी।
क्या आप जानते हैं सूरज हमारी जमीन को जो एनर्जी रोशनी और गर्मी की शक्ल में दे रहा है वह दरअसल न्यूक्लियर एनर्जी है? जी हां। सूरज और तारों में हाईड्रोजन के न्यूक्लियस आपस में जुड़कर हीलियम के न्यूक्लियस बना रहे हैं। और यह प्रोसेस करोड़ों साल से जारी है। जिसकी वजह से यह सब रोशनी और एनर्जी दे रहे हैं। सच कहा जाये तो पूरे यूनिवर्स में जो भी एनर्जी पैदा हो रही है वह न्यूक्लियर प्रोसेस का ही नतीजा है।
मौजूदा साइंस बताती है कि न्यूक्लियस में पचासों तरह के पार्टिकिल पाये जाते हैं। जो एक दूसरे से पूरी तरह अलग और बेजोड़ होते हैं। लेकिन वे सभी आपस में इस तरह एडजस्ट होते हैं कि न तो कोई पर्टिकिल न्यूक्लियस से बाहर निकलने पाता है और न उनमें आपस में कोई टकराव होता है। जबकि वे सब रफ्तार की पोजीशन में होते हैं।
करिश्मे बेशुमार हैं न्यूक्लियस के अंदर। साइंस थक कर बैठ सकती है लेकिन क्रियेटर के करिश्मे कम नहीं होने वाले। कुछ और जुस्तजू करने पर मालूम हुआ कि प्रोटॉन और न्यूट्रान पर ही दुनिया नहीं खत्म है। बल्कि ये पार्टिकिल और छोटे टुकड़ों से मिलकर बने होते हैं। जिन्हें नाम दिया गया है क्वार्कस।
माडर्न साइंस कुछ और थ्योरीज़ पर काम कर रही है जिनमें से एक है स्ट्रिंग थ्योरी। इस थ्योरी के मुताबिक सब कुछ यानि सारे पार्टिकिल मिलकर बने हैं एनर्जी की वाइब्रेटेड स्ट्रिंग यानि डोरियों से। अगर ये थ्योरी साबित हो गयी तो इसका मतलब होगा कि दुनिया में हर चीज़ बनी है सिर्फ और सिर्फ एनर्जी से।
दुनिया ने बड़ी बड़ी लैब्स बनाने के बाद जो बातें आज एटम के बारे में मालूम की हैं, उन्हें आज से चौदह सौ साल पहले इमाम जाफर सादिक (अ.) की निगाह ने पहचान कर दुनिया को इन अल्फाजों में बताया था, ‘‘जो पत्थर तुम सामने ठहरा हुआ देख रहे हो, उसके अन्दर के जर्रे बहुत तेज रफ्तार से चल रहे हैं।’’ उस वक्त लोगों का ज़हन इस लायक नहीं था कि उनकी बात समझ पाता। लेकिन आज साइंस इन बातों का ठोस सुबूत पेश कर चुकी है।
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