Sunday, July 9, 2017

नहजुल बलाग़ह का साइंसी इल्म

मेरी नई किताब "नहजुल बलाग़ह का साइंसी इल्म" का कवर पेज.


किताब शीघ्र ही आपके सामने होगी। जिसके  प्रकाशक हैं 
अब्बास बुक एजेंसी,
दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ
Ph : (+91) 9415102990, (+91) 9369444864

Saturday, June 17, 2017

ज़मीन का वायुमण्डल, आसमान का रंग और सूरज की परिधि इमाम हज़रत अली (अ.) ने बताई

 शेख सुद्दूक (अ.र.) की किताब एललुश्शरा में दर्ज हदीस के मुताबिक़ एक मरतबा हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम मस्जिदे कूफा में थे। मजमे से एक मर्द शामी उठा और अर्ज किया या अमीरलमोमिनीन में आपसे चन्द चीजों के मुताल्लिक कछ दरियाफ्त करना चाहता हूं। आपने फरमाया सवाल करना है तो समझने के लिये सवाल करो। महज़ परेशान करने के लिये सवाल न करना। उसके बाद सायल ने सवाल किये उनमें से तीन सवाल इस तरह थे,

उसने सवाल किया कि ये दुनियावी आसमान किस चीज़ से बना? आपने फरमाया आँधी और बेनूर मौजों से। उसने सूरज का तूल व अर्ज (परिधि) के मुताल्लिक पूछा। आपने फरमाया नौ सौ फरसख को नौ सौ फरसख से ज़र्ब दे दो। उसने सातों आसमान के रंग और उनके नाम दरियाफ्त किये। तो आपने फरमाया पहले आसमान का नाम रफीअ है और उसका रंग पानी व धुएं की मानिन्द है।....

अब हम इन सवालो व जवाबों को मौजूदा साइंस की रोशनी में गौर करते हैं।

अगर ज़मीन के आसमान की बात की जाये तो पूछने वाले का मतलब वायुमंडल से था जो ज़मीन के ऊपर हर तरफ मौजूद है। हम जानते हैं कि वायुमंडल में गैसें हैं और साथ में आयनोस्फेयर है जहां पर आयनों की शक्ल में गैसों की लहरें हैं। ये गैसें कभी एक जगह पर तेजी के साथ इकट्ठा होती हैं तो आँधियों की शक्ल में महसूस होती हैं और कभी बिखरती है तो मौसम पुरसुकून होता है। इसके बावजूद फिज़ा कभी इन गैसों से खाली नहीं होती। 

अगर आम आदमी को समझाने के लिये कहा जाये तो ज़मीन की फिज़ा में आँधियां हैं और लहरें या मौजें। चूंकि ये मौजें रोशनी की नहीं है बल्कि मैटर की हैं लिहाज़ा हम इन्हें बेनूर मौजें कह सकते हैं। और यही बात इमाम अली अलैहिस्सलाम के जवाब में आ रही है।  

सवाली का दूसरा सवाल सूरज के तूल व अर्ज़ यानि कि परिधि के मुताल्लिक था। जवाब में हज़रत अली (अ.) ने फर्सख में ये लम्बाई बतायी जो उस वक्त लम्बाई नापने की आम यूनिट थी। फर्सख फासला नापने की फारसी यूनिट होती है। ये उस फासले के बराबर होती है जो एक घोड़ा एक घण्टे में तय करता है। 19 वीं सदी में इसे 6.23 किलोमीटर के बराबर माना गया। जबकि अरब में इसे 4.83 किलोमीटर के बराबर माना गया। 
सूरज की डायमीटर नासा के अनुसार 1391000 किलोमीटर है। इस तरह इसकी परिधि की लम्बाई हुई 4370000 यूनिट्स। 900 को 900 से ज़र्ब देने पर नतीजा आता है 810000 फर्सख। अगर इसे फारसी यूनिट के अनुसार किलोमीटर में बदला जाये तो नतीजा आयेगा 5046300 यूनिट्स। जबकि अरबी यूनिट के अनुसार नतीजा होगा 3912300 यूनिट्स। 

अगर फर्सख को किलोमीटर में बदलने में अलग अलग जगहों के फर्क को नज़र में रखा जाये तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सरूज की परिधि के बारे में जो बताया वह पूरी तरह मौजूदा साइंस की कैलकुलेशन से मैच कर रहा है। 

चाँद का साइज़ बताने में कई दूसरे साइंसदानों जैसे कि आर्यभट वगैरा का भी जिक्र आता है। और ये उतनी हैरत की बात भी नहीं क्योंकि चाँद की तरफ नज़र की जा सकती है और यह ज़मीन के करीब भी है। लेकिन सूरज जिसकी तरफ नज़र टिक ही नहीं सकती, उसके बारे में इतनी सटीक कैलकुलेशन यकीनन इमाम अली अलैहिस्सलाम की इमामत का चमत्कार ही कहा जायेगा।  

तीसरा सवाल आसमान के रंग के मुताल्लिक था। जब हम ज़मीन पर रहते हुए आसमान की तरफ नज़र करते हैं तो यह नीले रंग का दिखाई देता है। जबकि शाम या सुबह के वक्त इसका रंग थोड़ा बदला हुआ लाल या काला मालूम होता है। 
लेकिन जो लोग स्पेसक्राफ्ट के ज़रिये ज़मीन से बाहर जा चुके हैं। उन्हें न तो ये आसमान नीला दिखाई दिया और न ही लाल। इसलिए क्योंकि ये रंग ज़मीन पर इसलिए दिखाई देते हैं क्योंकि ज़मीन का वायुमंडल सूरज की रोशनी में से खास रंग को हर तरफ बिखेर देता है। 
चूकि ज़मीन के बाहर वायुमंडल नहीं है इसलिए वहां ये रंग नहीं दिखाई देते। तो फिर वहां कौन सा रंग दिखाई देगा? ज़ाहिर है कि वहां चारों तरफ ऐसा कालापन दिखाई देगा जिसमें पानी की तरह रंगहीनता (colorlessness) होगी। यही रंग बाहर जाने वाले फिज़ाई मुसाफिरों ने देखी और यही बात इमाम अली अलैहिस्सलाम अपने जवाब में बता रहे हैं कि पहले आसमान का रंग पानी व धुएं की मानिन्द है। 
पानी का रंग नहीं होता और धुएं का रंग काला होता है। दोनों को मिक्स करने पर जो रंग बनता है वही फिज़ाई मुसाफिरों को ज़मीन से बाहर निकलने पर दिखाई देता है।
जो बातें आज साइंसदानों को ज़मीन से बाहर निकलने पर मालूम हुई हैं वह इमाम अली अलैहिस्सलाम चौदह सौ साल पहले मस्जिद में बैठे हुए बता रहे थे। और इस्लाम के सच और इल्म की गवाही दे रहे थे। वह इल्म जो दुनिया के सामने चौदह सौ साल बाद आने वाला था।
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इस तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिये मेरी किताब "51 जदीद साइंसी तहक़ीक़ात जो दरअस्ल इस्लाम की हैं" देखें जो अब्बास बुक एजेंसी लखनऊ ने प्रकाशित  है. 

Friday, June 2, 2017

मोर मोरनी की किवंदती और इमाम हज़रत अली(अ.)

मोर मोरनी की कहानी भी बहुत पुरानी किवंदती है और हज़ारों साल से बड़े बड़े जस्टिस शर्मा जैसे विद्वान भी इसे सच मानते आ रहे हैं। लेकिन आज से चौदह सौ साल पहले ही इस्लाम के धर्माधिकारी इसे गलत बता चुके हैं। आज से चौदह सौ साल पहले का इमाम हज़रत अली(अ.) का मोर के बारे में यह बयान किताब नहजुल बलाग़ा में खुत्बा नंबर 163 में दर्ज है। किताब ‘नहजुल बलाग़ा’ आसानी से हर जगह लगभग हर भाषा में उपलब्ध है।

इमाम अली(अ.) नहजुल बलाग़ा के इस खुत्बे में कहते हैं कि ‘‘मोर भी और मुरगों की तरह जफ्ती खाता है और (अपनी मादा को) गर्भवती करने के लिये जोश व हीजान में भरे हुए नरों की तरह जोड़ खाता है। मैं इस (बयान) के लिये ‘एक्सपेरीमेन्ट’ को तुम्हारे सामने पेश करता हूं। अटकल लगाने वालों की ये सिर्फ अटकल या वहम है कि वह अपने आँख के बहाये हुए उस आँसू से अपनी मादा को अण्डों पर लाता है कि जो उसकी पलकों के दोनों किनारों में आकर ठहर जाता है और मोरनी उसे पी लेती है और फिर वह अण्डे देने लगती है।’’
इस तरह चौदह सौ साल पहले ही इमाम अली(अ.) मोर के बारे में उस ज़माने में फैली गलत मान्यताओं को नकार रहे हैं। गलत मान्यता ये है कि मोर अपनी आँखों में बसे आँसुओं के क़तरे से मोरनी को अण्डे देने के लिये तैयार करता है। जब मोरनी उन आँसुओं को पी लेती है तो अण्डे देने लगती है।

इमाम अली(अ.) फरमाते हैं कि इन बातों में कोई सच्चाई नहीं। हक़ीक़त ये है कि मोर व मोरनी के बीच उसी तरह ताल्लुक क़ायम होता है जिस तरह दूसरे परिन्दों में नर व मादा के बीच, जैसे कि मुर्ग व मुर्गी। 

Tuesday, June 14, 2016

आधुनिक वैज्ञानिक खोजें जो दरअस्ल इस्लाम की हैं

इस किताब में ऐसी आधुनिक साइंसी खोजों को शामिल किया गया है जिनके बारे में पुरानी इस्लामी किताबों में ज़िक्र मौजूद है. मिसाल के तौर पर इसके कुछ लेख इस तरह हैं :
* क्या बिग बैंग थ्योरी गलत है?
* क्या 'ग्रैंड डिजाइन' स्टीफन हॉकिंग ने चोरी की है?
* डी.एन.ए. का कांसेप्ट दिया इस्लाम ने.
* क्या कोशिका की खोज रोबर्ट हुक ने की थी? 
* क्या क्वासर के बारे में इस्लाम कुछ कहता है?
* डार्क मैटर की हकीकत बताता है इस्लाम.
* इमाम अली (अ.) ने पेश की जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी.
* इस्लाम ने ही पेश की महाद्वीपों के एक होने की थ्योरी.
इसका ई संस्करण प्रकाशित हो चुका है जिसे आप निम्न फोटो लिंक से डाउनलोड करके स्मार्ट फोन, किंडल या कंप्यूटर पर पढ़ सकते हैं.

Friday, May 27, 2016

"ख़ुदा को किसने बनाया?"

जब किसी नास्तिक से कहा जाता है कि पूरी दुनिया ख़ुदा ने बनाई तो वह पलट कर सवाल करता है की फिर ख़ुदा को किसने बनाया?
इस तरह के तमाम अटपटे सवालों के जवाब इस्लामी मान्यताओं के मुताबिक़ देती है किताब - "ख़ुदा को किसने बनाया?"
इसका ई संस्करण प्रकाशित हो चुका है जिसे आप निम्न फोटो लिंक से डाउनलोड करके स्मार्ट फोन, किंडल या कंप्यूटर पर पढ़ सकते हैं.


Sunday, April 24, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-3)

उस शख्स ने कुरआन पर अगला एतराज़ कुछ यूं किया, ‘(अश-शूरा 51) और किसी आदमी के लिये ये मुमकिन नहीं कि खुदा उससे बात करे मगर 'वही' (दिल में सीधे उतारना) के जरिये या पर्दे के पीछे से, या कोई रसूल (फ़रिश्ता भेज दे) यानि वह अपने अज्ऩ व अख्तियार से जो चाहता है पैगाम भेजता है।’ और उस ने फरमाया ‘(निसा 164) अल्लाह ने मूसा से बातें कीं।’ उसने ये भी कहा, ‘(आराफ 22) और उन दोनों के परवरदिगार ने उन को आवाज़ दी।’ और उसने ये भी फरमाया ‘(अहज़ाब 59) ऐ नबी तुम अपनी बीबियों और लड़कियों से कह दो।’ और उसने ये फरमाया, ‘(मायदा 67) ऐ रसूल जो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से नाजिल हुआ है उसे पहुंचा दो।’ तो ये सब बातें कैसे एक साथ सच हैं?

अब जवाब में इमाम हजरत अली (अ-) ने फरमाया, कि किसी बशर के लिये मुनासिब नहीं कि अल्लाह से बगैर 'वही' कलाम करे और ऐसा वाकिया होने वाला नहीं है मगर पर्दे के पीछे से या किसी फ़रिश्ते को भेजे फिर वह उसकी इजाज़त से जो चाहे वही करे। इस वास्ते अल्लाह ने अपने लिये ‘बहुत बलन्द’ फरमाया है। रसूल पर आसमानी रसूलों (फरिश्तों) के जरिये वही की जाती थी। तो फ़रिश्ते ज़मीन के रसूलों तक पहुंचते थे। और ज़मीन के रसूलों और उस के दरमियान गुफ्तगू बगैर उस कलाम के होती थी जो आसमानी रसूलों के जरिये भेजा जाता था। रसूल अल्लाह (स-अ-) ने फरमाया ऐ जिब्रील क्या तुमने अपने रब को देखा है? तो जिब्रील ने अर्ज़ किया कि बेशक मेरा रब देखा नहीं जा सकता। तब रसूल (स-अ-) ने फरमाया तुम ‘वही’ कहां से लेते हो? उन्होंने कहा इस्राफील से लेता हूं। आप ने फरमाया इस्राफील कहां से लेते हैं? जिब्रील कहने लगे कि वह उस फ़रिश्ते से लेते हैं जो रूहानीन से बुलन्द है। आप ने फरमाया कि वह फ़रिश्ता कहां से लेता है? जिब्रील ने कहा कि उस के दिल में तेजी के साथ बगैर किसी रुकावट के ऊपर से आती है तो यही ‘वही’ है। और यह अल्लाह का कलाम है और अल्लाह का कलाम एक तरह का नहीं होता। वह रसूलों से बात करता है तो वह उसी की तरफ से होता है और उस के जरिये से वह दिल में डालता है। और उसी की तरफ से रसूलों को ख्वाब दिखाता है और उसी की तरफ से ‘वही’ लिखी है जो तिलावत की जाती है और पढ़ी जाती है वही कलाम अल्लाह है।

आगे उस शख्स ने कहा कि मैं अल्लाह को कहते हुए पाता हूं, ‘(यूनुस 61) और तुम्हारे रब से न ज़मीन में न आसमान में जर्रा बराबर शय गायब रह सकती है।’ और वह फरमाता है ‘(आले इमरान 77) और अल्लाह कयामत के दिन उन की तरफ रहमत की नज़र से न देखेगा और न उन को पाक करेगा।’ 
वह किस तरह नज़र व रहमत करेगा जो उस से छुपे होंगे?

इसके जवाब में इमाम हज़रत अली (अ-स-) ने फरमाया, ‘कि हमारा रब इसी तरह का है कि जिस से कोई शय गायब व पोशीदा नहीं है और ये क्योंकर हो सकता है कि जिसने चीजों को खल्क किया उस को मालूम न हो कि उसने क्या खल्क फरमाया और वह तो सब से बड़ा पैदा करने वाला इल्म वाला है। उसके दूसरे जुमले का मतलब है वह बता रहा है कि उन को खैर में से कुछ नहीं पहुंचेगा जैसे कि कहावत है क़सम खुदा की फलां हमारी तरफ नहीं देखता। इस से वह ये मतलब लेते हैं कि उससे हमें खैर में से कुछ नहीं पहुंचता। तो इसी तरह अल्लाह का अपनी मखलूक के साथ नज़र से मतलब है। उस की मखलूक की तरफ नज़र से मुराद रहमत है।

इसके बाद उस शख्स ने कहा, ‘(मुल्क 16) क्या तुम उस की ज़ात से जो आसमानों पर है बेखौफ हो के वह तुम को जमीन में धंसा दे फिर वह जोश में आकर उलटने पलटने लगे।’ उस ने ये भी फरमाया, ‘(ताहा 5) वह रहमान है जो अर्श पर तैयार हो।’ और उसने ये भी फरमाया ‘(ईनाम 3) वही अल्लाह आसमानों और जमीन में है वह तुम्हारी खुफिया और एलानिया बातों को जानता है।’ फिर उसने कहा, ‘(हदीद 3) वही जाहिर और पोशीदा है।’ और उसने फरमाया, ‘(हदीद 4) और वह तुम्हारे साथ है जहाँ कहीं भी हो।’ और उसने कहा कि ‘(क़ाफ 16) और हम तो उसकी शह रग से भी ज्यादा करीब हैं।’ तो ये बातें एक दूसरे से कितनी अलग हैं।

जवाब में इमाम अली इब्ने अबी तालिब (अ-स-) ने फरमाया कि अल्लाह की जात बुलन्द व अलग है उससे कि जो कुछ मखलूक से सरज़द हो, उस से सरज़द हो वह तो लतीफ व खबीर है (आप जो कुछ भी मखलूक के बारे में सोचते हैं या देखते हैं, अल्लाह तआला की ज़ात उससे अलग है।) वह जलील तर है इसलिये कि उस से कोई चीज़ ऐसी जाहिर हो जो उस की मखलूक से जाहिर हो रही हो। मिसाल के तौर पर मखलूक अगर सामने है तो पोशीदा नहीं हो सकती। लेकिन अल्लाह की जात के लिये यह कायदा नहीं है। अगर अर्श की बात की जाये तो उस का इल्म अर्श पर छाया हुआ है। वह हर राज व सरगोशी का गवाह है और वह हर शय पर किफायत करने वाला है और तमाम अशिया का मुदबिर है। अल्लाह तआला की ज़ात बहुत बुलन्द है इस से कि वह अर्श पर हो।

इस तरह उस शख्स ने इमाम हज़रत अली (अ-स-) से कुरआन के मुताल्लिक अनेकों सवाल किये और उन के मुनासिब जवाब पाकर इत्मिनान जाहिर किया। यकीनन पूरे कुरआन का इल्म हर एक को नहीं हासिल है जिसकी वजह से लोग अक्सर शक में मुब्तिला हो जाते हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि कुरआन हर लिहाज से अल्लाह का कलाम है। और जिस तरह अल्लाह की बनाई दुनिया राजों से भरी हुई है लेकिन उन राजों से परदा उठाने के लिये गौरो फिक्र जरूरी है उसी तरह कुरआन के बारे में भी गौरो फिक्र तमाम शक व शुबहात को दूर कर देती है।  
   
सन्दर्भ : शेख सुद्दूक (अ र)  की किताब अल तौहीद

Thursday, April 21, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-2)

आगे उस शख्स ने कुरआन पर एतराज़ करते हुए कहा, ‘(सूरे क़यामत आयत 22-23) उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ और दूसरी जगह वह कहता है, ‘(सूरे इनाम आयत 104) उस को आँखें नहीं देख सकती हैं और वह (लोगों की) निगाहों को देखता है। वह लतीफ खबीर है। और कहता है कि ‘(नज्म 13-14) और उन्होंने उस को एक बार और देखा है सिदरतुल मुन्तहा के नज़दीक।’ और ये भी फरमाता है कि ‘(ताहा 109-110) उस दिन किसी की सिफारिश काम न आयेगी मगर जिस को खुदा ने इजाज़त दी हो और उस का कौल उस को पसंद आये। जो कुछ उन के सामने है और जो कुछ उन के पीछे है वह जानता है और ये लोग अपने इल्म के जरिये उसपर हावी नहीं हो सकते।’
और जिस की निगाहें उस तक पहुंच जायें तो गोया उन का इल्म हावी हो गया। तो भला ये किस तरह हो सकता है?

अब जवाब में हजरत इमाम अली (अ-स-) ने फरमाया कि जिस जगह पर औलिया अल्लाह (अल्लाह के करीबी बन्दे) हिसाब से फारिग होने के बाद एक नहर पर पहुंचेंगे जिस का नाम नहरे हीवान होगा तो वह उसमें गुस्ल करेंगे और उस का पानी पियेंगे तो उन के चेहरे चमक दमक के साथ खूबसूरत नज़र आयेंगे और उन से हर तरह की परेशानी दूर हो जायेगी। फिर उनको जन्नत में दाखिल होने का हुक्म दिया जायेगा तो इस जगह से वह अपने परवरदिगार की तरफ से देखेंगे कि वह उनको किस तरह का बदला यानि फल देता है और उनमें से कुछ लोग जन्नत में दाखिल हो जायेंगे। इसी बिना पर अल्लाह का कौल है, ‘उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ यहाँ अल्लाह की तरफ देखने से मतलब ये है कि वह उस के सवाब को देखेंगे। मगर उस के कौल ‘उस को आँखें नहीं देख सकती हैं’ का मतलब ये है कि इंसानी अक्ल व आँखें उस तक नहीं पहुंच सकतीं। और ‘वह (लोगों की) निगाहों को देखता है।’ का मतलब कि वह उन तक पहुंच सकता है और वह लतीफ खबीर है। और यह एक तारीफ है जिस के जरिये हमारे रब ने अपनी ज़ात की तारीफ फरमाई है। और इन्तिहाई बलन्दी के साथ पाक व पाकीजा हुआ।

और अल्लाह के इस कौल ‘और उन्होंने उस को एक बार और देखा है सिदरतुल मुन्तहा के नज़दीक’ से मतलब ये है कि हज़रत मोहम्मद(स-अ-) ने जिब्रील को सिदरतुल मुन्तहा के मुकाम पर देखा जहाँ मखलूके खुदा में किसी का गुजर नहीं हो सकता। और आखिरी आयत में उसका ये कहना कि ‘(नज्म 17-18) उन की आँख किसी दूसरी तरफ मायल हुई और न हद से आगे बढ़ी उन्होंने अपने परवरदिगार की बड़ी निशानियाँ देखीं।’ उन्होंने जिब्रील को उस की खिलकत की सूरत में दूसरी बार देखा। और इस का सबब ये है कि अल्लाह ने जिब्रील को पैदा किया जो उन रूहानियों में से है जिन के खल्क के राज़ो का परदा सिवाय अल्लाह के कोई नहीं हटा सकता। ‘ये लोग अपने इल्म के जरिये उसपर हावी नहीं हो सकते।’ से मतलब ये है कि कोई भी मखलूक अपने इल्म यानि ज्ञान के जरिये अल्लाह की हस्ती तक नहीं पहुंच सकती। क्योंकि उस अल्लाह की बुलन्द ज़ात ने लोगों के दिलों पर परदा डाल दिया है। न कोई अक्ल व दिमाग उस की कैफियत से वाकिफ हो सकता है और न कोई दिल उसकी हदों या सीमाओं से वाकिफ हो सकता है। फिर न कोई उसका गुण बयान कर सकता है जिस तरह कि उस ने अपने गुणों को बयान किया है। उस जैसी कोई शय नहीं है। वह समीअ-बसीर है वही अव्वल व आखिर है। वही जाहिर व बातिन है। वह खलिक है। उस ने चीजों को खल्क किया। चीज़ों में से कोई चीज उस की तरह नहीं है। उस की ज़ात बाबरकत और बुलन्द व बाला है।
(-----जारी है।)

सन्दर्भ : शेख सुद्दूक(र-) की किताब अल तौहीद

Wednesday, April 20, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-1)

कुरआन नाजिल होने के चौदह सौ सालों के भीतर बहुत से काबिल लोग इसपर उंगली उठा चुके हैं। सैंकड़ों किताबें लिखी जा चुकी हैं इसके खिलाफ। लेकिन आखिरी नतीजा यही रहा कि सबने मुंह की खायी। कुरआन के खिलाफ लिखी हर बात का जवाब हमारे इमामों व विद्वानों द्वारा दिया जा चुका है। आज और इसके बाद के कुछ ब्लागों में मैं इसी तरह के एतराज़ात और उनके जवाबात को लिखूंगा।

यह एतराज़ात इमाम हज़रत अली(अ-स-) के सामने एक शख्स ने पेश किये थे और हज़रत अली(अ-स-) ने उनका जवाब दिया था। गुफ्तगू काफी लम्बी है इसलिये इसको दो तीन किस्तों में पेश करूंगा।

पहला एतराज उस शख्स ने इस तरह पेश किया, 
‘‘सूरे आराफ की 51वीं आयत में है, ‘तो हम(अल्लाह) भी आज उनको भूल जायेंगे जिस तरह ये आज के दिन की मुलाकात को भूल गये।’ जबकि सूरे मरियम की 65 वीं आयत में है, ‘और तुम्हारा रब भूलने वाला नहीं।’ तो कभी अल्लाह खबर देता है कि वह भूल जाता है तो कभी आगाह करता है कि वह नहीं भूलता। ये किस तरह मुमकिन है?’’

इसके जवाब में इमाम हजरत अली(अ-स-) ने फरमाया, ‘‘पहली आयत से मतलब ये निकलता है कि जो लोग दुनिया में अल्लाह को भूल गये यानि उसकी बातों पर अमल नहीं किया तो ऐसे लोगों को वह अपने सवाब में से कुछ भी नहीं देगा यानि ऐसे लोगों को कयामत के दिन अल्लाह की मेहरबानियों में से कुछ भी हासिल नहीं होगा।
जबकि दूसरी आयत में भूलने से मतलब गाफिल होने से है। यानि जैसे कि किसी के ज़हन से कोई बात निकल जाये। तो अल्लाह इससे बहुत बुलन्द है।

दूसरा एतराज उस शख्स ने ये पेश किया, ‘‘सूरे नबा की 38 वीं आयत है ‘जिस दिन रूह और फ़रिश्ते सफबस्ता खड़े होंगे उस से कोई बात नहीं कर सकेगा मगर जिस को इन्तिहाई मेहरबान अल्लाह इजाज़त दे और दुरुस्त बात कहे।’ और उसने कहा कि उन को बोलने की इजाज़त दी गयी तो वह कहने लगे, ‘(सूरे अनाम की 23 वीं आयत ) और अल्लाह की कसम जो हमारा रब है हम मुशरिक नहीं हैं।’ फिर सूरे अन्कुबूत की 25 वीं आयत है, ‘फिर कयामत के दिन तुममें से एक दूसरे का इंकार करेगा और एक दूसरे पर लानत करेगा।’ और उसने ये भी कहा कि (सूरे साद 64 वीं आयत) ‘बेशक अहले जहन्नुम का आपस में लड़ना बिल्कुल दुरुस्त है।’ और ये भी फरमाया (सूरे क़ाफ 28 वीं आयत) ‘मेरे सामने झगड़ा न करो और मैंने पहले ही अज़ाब की खबर दे दी थी।’ सूरे यास की 65 वीं आयत में उसने कहा, ‘हम उनके लबों पर मुहर लगा देंगे और उन के हाथ हम से बातें करेंगे और उन के पाँव गवाही देंगे उस के मुताल्लिक जो वह करते रहे हैं।
इस तरह कभी अल्लाह कहता है कि वह कलाम करेंगे तो कभी खबर देता है कि वह बात नहीं करेंगे मगर जिस को रहमान इजाज़त दे और सही बात कहे। और कभी यह कहता है कि मखलूक गुफ्तगू नहीं करेगी और फिर उनकी गुफ्तगू के बारे में कहता है ‘कसम खुदा की वह हमारा रब है हम मुशरिक नहीं हैं।’ और कभी ये बताता है कि वह झगड़ा करते हैं। ये किस तरह मुमकिन है?’’

इसके जवाब में इमाम हजरत अली(अ-स-) ने फरमाया, कि ये सारी बातें कयामत के रोज अलग अलग वक्त में होंगी। कयामत का दिन पचास हज़ार साल लंबा है, जिसमें अल्लाह तमाम लोगों को जमा करेगा जो अलग अलग जगहों में होंगे और एक दूसरे से कलाम करेंगे। और एक दूसरे के लिये भलाई की दुआ करेंगे। ये वो लोग होंगे जो हक़वालों के सरदारों में से होंगे, जिन्होंने दुनिया में अल्लाह की इताअत की होगी। और उन गुनाहगार लोगों पर लानत करेंगे जिन से नफरत व अदावत का इजहार हुआ और जिन्होंने दुनिया में जुल्म व जबर पर एक दूसरे की मदद की। 
गुनाहगार व जालिम एक दूसरे को काफिर कहेंगे और एक दूसरे पर लानत करेंगे। फिर वह एक दूसरी जगह पर जमा होंगे जहाँ वह रोएंगे। अगर ये आवाजें दुनिया वाले सुन लें तो अपने सारे काम धंधे छोड़ दें और उनके दिल फट जायें। इसके बाद वह दूसरी जगह जमा होंगे तो बातें करेंगे और कहेंगे कि ‘कसम खुदा की हमारे रब, हम मुशरिक नहीं थे।’ फिर अल्लाह उन के मुंह पर मुहर लगा देगा और हाथ पैर व खालें बोलने लगेंगी। फिर जिस्म के हिस्से उन के हर गुनाह की गवाही देंगे। फिर उन की जबानों से मुहरों को हटा लिया जायेगा तो वह अपने जिस्म के हिस्सों से कहेंगे तुमने हमारे खिलाफ किस वजह से गवाही दी? तो वह कहेंगे कि हम को उस अल्लाह ने बोलने की ताकत दी जिसने हर शय को कूव्वते फहम अता की।

इस तरह कुरआन की ये आयतें एक दूसरे से अलग नहीं हैं।
(-----जारी है।)

सन्दर्भ : शेख सुद्दूक(र.) की किताब अल तौहीद

Friday, September 18, 2015

किताब ‘खुदा को किसने बनाया?’ का विमोचन


सेंट रोज़ पब्लिक स्कूल, गढ़ी पीर खाँ, लखनऊ में 13 सितंबर 2015 को आयोजित एक समारोह में डा0ज़ीशान हैदर ज़ैदी की किताब ‘खुदा को किसने बनाया?’ का विमोचन जे.एन.यू के पूर्व हेड(उर्दू विभाग) प्रोफेसर शारिब रुदौलवी के करकमलों से हुआ। समारोह की अध्यक्षता मौलाना सैयद क़ायम मेहदी पूर्व इन्फार्मेशन आफिसर ने की व मुख्य अतिथि के रूप में श्री एस.एम.रिज़वी आई.ए.एस उपस्थित थे जबकि विशिष्ट अतिथि थे सूफी सैयद इज़हार अली। उपरोक्त पुस्तक को अब्बास बुक एजेंसी, दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ ने प्रकाशित किया है। कार्यक्रम के संयोजक सेन्ट रोज़ पब्लिक स्कूल के संस्थापक व प्रबंधक डा0मंसूर हसन खाँ थे जबकि संचालन वरिष्ठ पत्रकार व शिक्षक सैयद आले हाशिम ने किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि श्री एस.एम.रिज़वी आई.ए.एस. ने कहा कि दुनिया की इन्टेलिजेन्ट डिज़ाइन ख़ुदा के अस्तित्व का सुबूत है और ख़ुद को केवल दिल की आँखों से देखा जा सकता हैं
प्रोफेसर शारिब रुदौलवी ने कहा कि इस तरह की पुस्तकें विचारों के नये दरवाजे खोलती हैं ओैर लोगों को सोचने पर मजबूर करती हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मौलाना सैयद क़ायम मेहदी ने कहा कि यदि ख़ुदा के लिए यह पूछा जाए कि वह कबसे है तो पहले इस सवाल का जवाब देना होगा कि वह कब नहीं था। 
किताब के लेखक डा0ज़ीशान हैदर ज़ैदी ने बताया कि उनकी ये किताब दरअसल उन मुबाहिसों का मजमुआ है जो उन्होंने इण्टरनेट पर गैर मुस्लिमों, नास्तिकों इत्यादि से किये। और इनमें इस्लाम से सम्बन्धित तमाम उन सवालों पर बहस हुई जो लोगों के ज़हन में उभरते रहते हैं।
कार्यक्रम के अन्त में मौलाना अली अब्बास तबातबाई, प्रोपराइटर अब्बास बुक एजेंसी ने मेहमानों का धन्यवाद 
कार्यक्रम में अन्य गण्यमान अतिथियों में लेखिका रिफअत शाहीन, आर्टिस्ट अज़हर हुसैन, शायर शकील गयावी, नाज़ खान, आमिर मुख्तार, इत्यादि उपस्थित थे।
पुस्तक मिलने का पता 
अब्बास बुक एजेंसी, 
दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ
Ph : (+91) 9415102990, (+91) 9369444864

Wednesday, July 15, 2015

ख़ुदा को किसने बनाया?

इस्लामी उसूलों और मान्यताओं पर ग़ैर मुस्लिमों से बहस.