Tuesday, June 14, 2016

आधुनिक वैज्ञानिक खोजें जो दरअस्ल इस्लाम की हैं

इस किताब में ऐसी आधुनिक साइंसी खोजों को शामिल किया गया है जिनके बारे में पुरानी इस्लामी किताबों में ज़िक्र मौजूद है. मिसाल के तौर पर इसके कुछ लेख इस तरह हैं :
* क्या बिग बैंग थ्योरी गलत है?
* क्या 'ग्रैंड डिजाइन' स्टीफन हॉकिंग ने चोरी की है?
* डी.एन.ए. का कांसेप्ट दिया इस्लाम ने.
* क्या कोशिका की खोज रोबर्ट हुक ने की थी? 
* क्या क्वासर के बारे में इस्लाम कुछ कहता है?
* डार्क मैटर की हकीकत बताता है इस्लाम.
* इमाम अली (अ.) ने पेश की जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी.
* इस्लाम ने ही पेश की महाद्वीपों के एक होने की थ्योरी.
इसका ई संस्करण प्रकाशित हो चुका है जिसे आप निम्न फोटो लिंक से डाउनलोड करके स्मार्ट फोन, किंडल या कंप्यूटर पर पढ़ सकते हैं.

Friday, May 27, 2016

"ख़ुदा को किसने बनाया?"

जब किसी नास्तिक से कहा जाता है कि पूरी दुनिया ख़ुदा ने बनाई तो वह पलट कर सवाल करता है की फिर ख़ुदा को किसने बनाया?
इस तरह के तमाम अटपटे सवालों के जवाब इस्लामी मान्यताओं के मुताबिक़ देती है किताब - "ख़ुदा को किसने बनाया?"
इसका ई संस्करण प्रकाशित हो चुका है जिसे आप निम्न फोटो लिंक से डाउनलोड करके स्मार्ट फोन, किंडल या कंप्यूटर पर पढ़ सकते हैं.


Sunday, April 24, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-3)

उस शख्स ने कुरआन पर अगला एतराज़ कुछ यूं किया, ‘(अश-शूरा 51) और किसी आदमी के लिये ये मुमकिन नहीं कि खुदा उससे बात करे मगर 'वही' (दिल में सीधे उतारना) के जरिये या पर्दे के पीछे से, या कोई रसूल (फ़रिश्ता भेज दे) यानि वह अपने अज्ऩ व अख्तियार से जो चाहता है पैगाम भेजता है।’ और उस ने फरमाया ‘(निसा 164) अल्लाह ने मूसा से बातें कीं।’ उसने ये भी कहा, ‘(आराफ 22) और उन दोनों के परवरदिगार ने उन को आवाज़ दी।’ और उसने ये भी फरमाया ‘(अहज़ाब 59) ऐ नबी तुम अपनी बीबियों और लड़कियों से कह दो।’ और उसने ये फरमाया, ‘(मायदा 67) ऐ रसूल जो तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से नाजिल हुआ है उसे पहुंचा दो।’ तो ये सब बातें कैसे एक साथ सच हैं?

अब जवाब में इमाम हजरत अली (अ-) ने फरमाया, कि किसी बशर के लिये मुनासिब नहीं कि अल्लाह से बगैर 'वही' कलाम करे और ऐसा वाकिया होने वाला नहीं है मगर पर्दे के पीछे से या किसी फ़रिश्ते को भेजे फिर वह उसकी इजाज़त से जो चाहे वही करे। इस वास्ते अल्लाह ने अपने लिये ‘बहुत बलन्द’ फरमाया है। रसूल पर आसमानी रसूलों (फरिश्तों) के जरिये वही की जाती थी। तो फ़रिश्ते ज़मीन के रसूलों तक पहुंचते थे। और ज़मीन के रसूलों और उस के दरमियान गुफ्तगू बगैर उस कलाम के होती थी जो आसमानी रसूलों के जरिये भेजा जाता था। रसूल अल्लाह (स-अ-) ने फरमाया ऐ जिब्रील क्या तुमने अपने रब को देखा है? तो जिब्रील ने अर्ज़ किया कि बेशक मेरा रब देखा नहीं जा सकता। तब रसूल (स-अ-) ने फरमाया तुम ‘वही’ कहां से लेते हो? उन्होंने कहा इस्राफील से लेता हूं। आप ने फरमाया इस्राफील कहां से लेते हैं? जिब्रील कहने लगे कि वह उस फ़रिश्ते से लेते हैं जो रूहानीन से बुलन्द है। आप ने फरमाया कि वह फ़रिश्ता कहां से लेता है? जिब्रील ने कहा कि उस के दिल में तेजी के साथ बगैर किसी रुकावट के ऊपर से आती है तो यही ‘वही’ है। और यह अल्लाह का कलाम है और अल्लाह का कलाम एक तरह का नहीं होता। वह रसूलों से बात करता है तो वह उसी की तरफ से होता है और उस के जरिये से वह दिल में डालता है। और उसी की तरफ से रसूलों को ख्वाब दिखाता है और उसी की तरफ से ‘वही’ लिखी है जो तिलावत की जाती है और पढ़ी जाती है वही कलाम अल्लाह है।

आगे उस शख्स ने कहा कि मैं अल्लाह को कहते हुए पाता हूं, ‘(यूनुस 61) और तुम्हारे रब से न ज़मीन में न आसमान में जर्रा बराबर शय गायब रह सकती है।’ और वह फरमाता है ‘(आले इमरान 77) और अल्लाह कयामत के दिन उन की तरफ रहमत की नज़र से न देखेगा और न उन को पाक करेगा।’ 
वह किस तरह नज़र व रहमत करेगा जो उस से छुपे होंगे?

इसके जवाब में इमाम हज़रत अली (अ-स-) ने फरमाया, ‘कि हमारा रब इसी तरह का है कि जिस से कोई शय गायब व पोशीदा नहीं है और ये क्योंकर हो सकता है कि जिसने चीजों को खल्क किया उस को मालूम न हो कि उसने क्या खल्क फरमाया और वह तो सब से बड़ा पैदा करने वाला इल्म वाला है। उसके दूसरे जुमले का मतलब है वह बता रहा है कि उन को खैर में से कुछ नहीं पहुंचेगा जैसे कि कहावत है क़सम खुदा की फलां हमारी तरफ नहीं देखता। इस से वह ये मतलब लेते हैं कि उससे हमें खैर में से कुछ नहीं पहुंचता। तो इसी तरह अल्लाह का अपनी मखलूक के साथ नज़र से मतलब है। उस की मखलूक की तरफ नज़र से मुराद रहमत है।

इसके बाद उस शख्स ने कहा, ‘(मुल्क 16) क्या तुम उस की ज़ात से जो आसमानों पर है बेखौफ हो के वह तुम को जमीन में धंसा दे फिर वह जोश में आकर उलटने पलटने लगे।’ उस ने ये भी फरमाया, ‘(ताहा 5) वह रहमान है जो अर्श पर तैयार हो।’ और उसने ये भी फरमाया ‘(ईनाम 3) वही अल्लाह आसमानों और जमीन में है वह तुम्हारी खुफिया और एलानिया बातों को जानता है।’ फिर उसने कहा, ‘(हदीद 3) वही जाहिर और पोशीदा है।’ और उसने फरमाया, ‘(हदीद 4) और वह तुम्हारे साथ है जहाँ कहीं भी हो।’ और उसने कहा कि ‘(क़ाफ 16) और हम तो उसकी शह रग से भी ज्यादा करीब हैं।’ तो ये बातें एक दूसरे से कितनी अलग हैं।

जवाब में इमाम अली इब्ने अबी तालिब (अ-स-) ने फरमाया कि अल्लाह की जात बुलन्द व अलग है उससे कि जो कुछ मखलूक से सरज़द हो, उस से सरज़द हो वह तो लतीफ व खबीर है (आप जो कुछ भी मखलूक के बारे में सोचते हैं या देखते हैं, अल्लाह तआला की ज़ात उससे अलग है।) वह जलील तर है इसलिये कि उस से कोई चीज़ ऐसी जाहिर हो जो उस की मखलूक से जाहिर हो रही हो। मिसाल के तौर पर मखलूक अगर सामने है तो पोशीदा नहीं हो सकती। लेकिन अल्लाह की जात के लिये यह कायदा नहीं है। अगर अर्श की बात की जाये तो उस का इल्म अर्श पर छाया हुआ है। वह हर राज व सरगोशी का गवाह है और वह हर शय पर किफायत करने वाला है और तमाम अशिया का मुदबिर है। अल्लाह तआला की ज़ात बहुत बुलन्द है इस से कि वह अर्श पर हो।

इस तरह उस शख्स ने इमाम हज़रत अली (अ-स-) से कुरआन के मुताल्लिक अनेकों सवाल किये और उन के मुनासिब जवाब पाकर इत्मिनान जाहिर किया। यकीनन पूरे कुरआन का इल्म हर एक को नहीं हासिल है जिसकी वजह से लोग अक्सर शक में मुब्तिला हो जाते हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि कुरआन हर लिहाज से अल्लाह का कलाम है। और जिस तरह अल्लाह की बनाई दुनिया राजों से भरी हुई है लेकिन उन राजों से परदा उठाने के लिये गौरो फिक्र जरूरी है उसी तरह कुरआन के बारे में भी गौरो फिक्र तमाम शक व शुबहात को दूर कर देती है।  
   
सन्दर्भ : शेख सुद्दूक (अ र)  की किताब अल तौहीद

Thursday, April 21, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-2)

आगे उस शख्स ने कुरआन पर एतराज़ करते हुए कहा, ‘(सूरे क़यामत आयत 22-23) उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ और दूसरी जगह वह कहता है, ‘(सूरे इनाम आयत 104) उस को आँखें नहीं देख सकती हैं और वह (लोगों की) निगाहों को देखता है। वह लतीफ खबीर है। और कहता है कि ‘(नज्म 13-14) और उन्होंने उस को एक बार और देखा है सिदरतुल मुन्तहा के नज़दीक।’ और ये भी फरमाता है कि ‘(ताहा 109-110) उस दिन किसी की सिफारिश काम न आयेगी मगर जिस को खुदा ने इजाज़त दी हो और उस का कौल उस को पसंद आये। जो कुछ उन के सामने है और जो कुछ उन के पीछे है वह जानता है और ये लोग अपने इल्म के जरिये उसपर हावी नहीं हो सकते।’
और जिस की निगाहें उस तक पहुंच जायें तो गोया उन का इल्म हावी हो गया। तो भला ये किस तरह हो सकता है?

अब जवाब में हजरत इमाम अली (अ-स-) ने फरमाया कि जिस जगह पर औलिया अल्लाह (अल्लाह के करीबी बन्दे) हिसाब से फारिग होने के बाद एक नहर पर पहुंचेंगे जिस का नाम नहरे हीवान होगा तो वह उसमें गुस्ल करेंगे और उस का पानी पियेंगे तो उन के चेहरे चमक दमक के साथ खूबसूरत नज़र आयेंगे और उन से हर तरह की परेशानी दूर हो जायेगी। फिर उनको जन्नत में दाखिल होने का हुक्म दिया जायेगा तो इस जगह से वह अपने परवरदिगार की तरफ से देखेंगे कि वह उनको किस तरह का बदला यानि फल देता है और उनमें से कुछ लोग जन्नत में दाखिल हो जायेंगे। इसी बिना पर अल्लाह का कौल है, ‘उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ यहाँ अल्लाह की तरफ देखने से मतलब ये है कि वह उस के सवाब को देखेंगे। मगर उस के कौल ‘उस को आँखें नहीं देख सकती हैं’ का मतलब ये है कि इंसानी अक्ल व आँखें उस तक नहीं पहुंच सकतीं। और ‘वह (लोगों की) निगाहों को देखता है।’ का मतलब कि वह उन तक पहुंच सकता है और वह लतीफ खबीर है। और यह एक तारीफ है जिस के जरिये हमारे रब ने अपनी ज़ात की तारीफ फरमाई है। और इन्तिहाई बलन्दी के साथ पाक व पाकीजा हुआ।

और अल्लाह के इस कौल ‘और उन्होंने उस को एक बार और देखा है सिदरतुल मुन्तहा के नज़दीक’ से मतलब ये है कि हज़रत मोहम्मद(स-अ-) ने जिब्रील को सिदरतुल मुन्तहा के मुकाम पर देखा जहाँ मखलूके खुदा में किसी का गुजर नहीं हो सकता। और आखिरी आयत में उसका ये कहना कि ‘(नज्म 17-18) उन की आँख किसी दूसरी तरफ मायल हुई और न हद से आगे बढ़ी उन्होंने अपने परवरदिगार की बड़ी निशानियाँ देखीं।’ उन्होंने जिब्रील को उस की खिलकत की सूरत में दूसरी बार देखा। और इस का सबब ये है कि अल्लाह ने जिब्रील को पैदा किया जो उन रूहानियों में से है जिन के खल्क के राज़ो का परदा सिवाय अल्लाह के कोई नहीं हटा सकता। ‘ये लोग अपने इल्म के जरिये उसपर हावी नहीं हो सकते।’ से मतलब ये है कि कोई भी मखलूक अपने इल्म यानि ज्ञान के जरिये अल्लाह की हस्ती तक नहीं पहुंच सकती। क्योंकि उस अल्लाह की बुलन्द ज़ात ने लोगों के दिलों पर परदा डाल दिया है। न कोई अक्ल व दिमाग उस की कैफियत से वाकिफ हो सकता है और न कोई दिल उसकी हदों या सीमाओं से वाकिफ हो सकता है। फिर न कोई उसका गुण बयान कर सकता है जिस तरह कि उस ने अपने गुणों को बयान किया है। उस जैसी कोई शय नहीं है। वह समीअ-बसीर है वही अव्वल व आखिर है। वही जाहिर व बातिन है। वह खलिक है। उस ने चीजों को खल्क किया। चीज़ों में से कोई चीज उस की तरह नहीं है। उस की ज़ात बाबरकत और बुलन्द व बाला है।
(-----जारी है।)

सन्दर्भ : शेख सुद्दूक(र-) की किताब अल तौहीद

Wednesday, April 20, 2016

क्या कुरआन में गलतियां हैं? (भाग-1)

कुरआन नाजिल होने के चौदह सौ सालों के भीतर बहुत से काबिल लोग इसपर उंगली उठा चुके हैं। सैंकड़ों किताबें लिखी जा चुकी हैं इसके खिलाफ। लेकिन आखिरी नतीजा यही रहा कि सबने मुंह की खायी। कुरआन के खिलाफ लिखी हर बात का जवाब हमारे इमामों व विद्वानों द्वारा दिया जा चुका है। आज और इसके बाद के कुछ ब्लागों में मैं इसी तरह के एतराज़ात और उनके जवाबात को लिखूंगा।

यह एतराज़ात इमाम हज़रत अली(अ-स-) के सामने एक शख्स ने पेश किये थे और हज़रत अली(अ-स-) ने उनका जवाब दिया था। गुफ्तगू काफी लम्बी है इसलिये इसको दो तीन किस्तों में पेश करूंगा।

पहला एतराज उस शख्स ने इस तरह पेश किया, 
‘‘सूरे आराफ की 51वीं आयत में है, ‘तो हम(अल्लाह) भी आज उनको भूल जायेंगे जिस तरह ये आज के दिन की मुलाकात को भूल गये।’ जबकि सूरे मरियम की 65 वीं आयत में है, ‘और तुम्हारा रब भूलने वाला नहीं।’ तो कभी अल्लाह खबर देता है कि वह भूल जाता है तो कभी आगाह करता है कि वह नहीं भूलता। ये किस तरह मुमकिन है?’’

इसके जवाब में इमाम हजरत अली(अ-स-) ने फरमाया, ‘‘पहली आयत से मतलब ये निकलता है कि जो लोग दुनिया में अल्लाह को भूल गये यानि उसकी बातों पर अमल नहीं किया तो ऐसे लोगों को वह अपने सवाब में से कुछ भी नहीं देगा यानि ऐसे लोगों को कयामत के दिन अल्लाह की मेहरबानियों में से कुछ भी हासिल नहीं होगा।
जबकि दूसरी आयत में भूलने से मतलब गाफिल होने से है। यानि जैसे कि किसी के ज़हन से कोई बात निकल जाये। तो अल्लाह इससे बहुत बुलन्द है।

दूसरा एतराज उस शख्स ने ये पेश किया, ‘‘सूरे नबा की 38 वीं आयत है ‘जिस दिन रूह और फ़रिश्ते सफबस्ता खड़े होंगे उस से कोई बात नहीं कर सकेगा मगर जिस को इन्तिहाई मेहरबान अल्लाह इजाज़त दे और दुरुस्त बात कहे।’ और उसने कहा कि उन को बोलने की इजाज़त दी गयी तो वह कहने लगे, ‘(सूरे अनाम की 23 वीं आयत ) और अल्लाह की कसम जो हमारा रब है हम मुशरिक नहीं हैं।’ फिर सूरे अन्कुबूत की 25 वीं आयत है, ‘फिर कयामत के दिन तुममें से एक दूसरे का इंकार करेगा और एक दूसरे पर लानत करेगा।’ और उसने ये भी कहा कि (सूरे साद 64 वीं आयत) ‘बेशक अहले जहन्नुम का आपस में लड़ना बिल्कुल दुरुस्त है।’ और ये भी फरमाया (सूरे क़ाफ 28 वीं आयत) ‘मेरे सामने झगड़ा न करो और मैंने पहले ही अज़ाब की खबर दे दी थी।’ सूरे यास की 65 वीं आयत में उसने कहा, ‘हम उनके लबों पर मुहर लगा देंगे और उन के हाथ हम से बातें करेंगे और उन के पाँव गवाही देंगे उस के मुताल्लिक जो वह करते रहे हैं।
इस तरह कभी अल्लाह कहता है कि वह कलाम करेंगे तो कभी खबर देता है कि वह बात नहीं करेंगे मगर जिस को रहमान इजाज़त दे और सही बात कहे। और कभी यह कहता है कि मखलूक गुफ्तगू नहीं करेगी और फिर उनकी गुफ्तगू के बारे में कहता है ‘कसम खुदा की वह हमारा रब है हम मुशरिक नहीं हैं।’ और कभी ये बताता है कि वह झगड़ा करते हैं। ये किस तरह मुमकिन है?’’

इसके जवाब में इमाम हजरत अली(अ-स-) ने फरमाया, कि ये सारी बातें कयामत के रोज अलग अलग वक्त में होंगी। कयामत का दिन पचास हज़ार साल लंबा है, जिसमें अल्लाह तमाम लोगों को जमा करेगा जो अलग अलग जगहों में होंगे और एक दूसरे से कलाम करेंगे। और एक दूसरे के लिये भलाई की दुआ करेंगे। ये वो लोग होंगे जो हक़वालों के सरदारों में से होंगे, जिन्होंने दुनिया में अल्लाह की इताअत की होगी। और उन गुनाहगार लोगों पर लानत करेंगे जिन से नफरत व अदावत का इजहार हुआ और जिन्होंने दुनिया में जुल्म व जबर पर एक दूसरे की मदद की। 
गुनाहगार व जालिम एक दूसरे को काफिर कहेंगे और एक दूसरे पर लानत करेंगे। फिर वह एक दूसरी जगह पर जमा होंगे जहाँ वह रोएंगे। अगर ये आवाजें दुनिया वाले सुन लें तो अपने सारे काम धंधे छोड़ दें और उनके दिल फट जायें। इसके बाद वह दूसरी जगह जमा होंगे तो बातें करेंगे और कहेंगे कि ‘कसम खुदा की हमारे रब, हम मुशरिक नहीं थे।’ फिर अल्लाह उन के मुंह पर मुहर लगा देगा और हाथ पैर व खालें बोलने लगेंगी। फिर जिस्म के हिस्से उन के हर गुनाह की गवाही देंगे। फिर उन की जबानों से मुहरों को हटा लिया जायेगा तो वह अपने जिस्म के हिस्सों से कहेंगे तुमने हमारे खिलाफ किस वजह से गवाही दी? तो वह कहेंगे कि हम को उस अल्लाह ने बोलने की ताकत दी जिसने हर शय को कूव्वते फहम अता की।

इस तरह कुरआन की ये आयतें एक दूसरे से अलग नहीं हैं।
(-----जारी है।)

सन्दर्भ : शेख सुद्दूक(र.) की किताब अल तौहीद

Friday, September 18, 2015

किताब ‘खुदा को किसने बनाया?’ का विमोचन


सेंट रोज़ पब्लिक स्कूल, गढ़ी पीर खाँ, लखनऊ में 13 सितंबर 2015 को आयोजित एक समारोह में डा0ज़ीशान हैदर ज़ैदी की किताब ‘खुदा को किसने बनाया?’ का विमोचन जे.एन.यू के पूर्व हेड(उर्दू विभाग) प्रोफेसर शारिब रुदौलवी के करकमलों से हुआ। समारोह की अध्यक्षता मौलाना सैयद क़ायम मेहदी पूर्व इन्फार्मेशन आफिसर ने की व मुख्य अतिथि के रूप में श्री एस.एम.रिज़वी आई.ए.एस उपस्थित थे जबकि विशिष्ट अतिथि थे सूफी सैयद इज़हार अली। उपरोक्त पुस्तक को अब्बास बुक एजेंसी, दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ ने प्रकाशित किया है। कार्यक्रम के संयोजक सेन्ट रोज़ पब्लिक स्कूल के संस्थापक व प्रबंधक डा0मंसूर हसन खाँ थे जबकि संचालन वरिष्ठ पत्रकार व शिक्षक सैयद आले हाशिम ने किया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि श्री एस.एम.रिज़वी आई.ए.एस. ने कहा कि दुनिया की इन्टेलिजेन्ट डिज़ाइन ख़ुदा के अस्तित्व का सुबूत है और ख़ुद को केवल दिल की आँखों से देखा जा सकता हैं
प्रोफेसर शारिब रुदौलवी ने कहा कि इस तरह की पुस्तकें विचारों के नये दरवाजे खोलती हैं ओैर लोगों को सोचने पर मजबूर करती हैं।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मौलाना सैयद क़ायम मेहदी ने कहा कि यदि ख़ुदा के लिए यह पूछा जाए कि वह कबसे है तो पहले इस सवाल का जवाब देना होगा कि वह कब नहीं था। 
किताब के लेखक डा0ज़ीशान हैदर ज़ैदी ने बताया कि उनकी ये किताब दरअसल उन मुबाहिसों का मजमुआ है जो उन्होंने इण्टरनेट पर गैर मुस्लिमों, नास्तिकों इत्यादि से किये। और इनमें इस्लाम से सम्बन्धित तमाम उन सवालों पर बहस हुई जो लोगों के ज़हन में उभरते रहते हैं।
कार्यक्रम के अन्त में मौलाना अली अब्बास तबातबाई, प्रोपराइटर अब्बास बुक एजेंसी ने मेहमानों का धन्यवाद 
कार्यक्रम में अन्य गण्यमान अतिथियों में लेखिका रिफअत शाहीन, आर्टिस्ट अज़हर हुसैन, शायर शकील गयावी, नाज़ खान, आमिर मुख्तार, इत्यादि उपस्थित थे।
पुस्तक मिलने का पता 
अब्बास बुक एजेंसी, 
दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ
Ph : (+91) 9415102990, (+91) 9369444864

Wednesday, July 15, 2015

ख़ुदा को किसने बनाया?

इस्लामी उसूलों और मान्यताओं पर ग़ैर मुस्लिमों से बहस.

Tuesday, June 16, 2015

कौन है इस्लाम का सर्वोच्च अधिकारी? (भाग 14 - अंतिम भाग)

अभी तक इस सीरीज़ में हमने इस्लाम के ऐसे धर्माधिकारियों की बात की जो शहीद हो चुके हैं और यह दुनिया उन्हें खो चुकी है। अब सीरीज़ के इस अन्तिम भाग हम इस्लाम के ऐसे धर्माधिकारी की बात करेंगे जो आज भी इस दुनिया में मौजूद है। और रहती दुनिया तक बाक़ी रहेगा क्योंकि अल्लाह का वादा है कि जब तक ये दुनिया क़ायम है ज़मीन पर हमेशा अल्लाह का एक बंदा मौजूद होगा जो इस ज़मीन का मालिक होगा और धर्म को स्थापित करने वाला होगा। उसी की वजह से यह ज़मीन और इस पर धर्म क़ायम रहेगा वरना खत्म हो जायेगा। जैसा कि कुरआन की सूरह ज़खरुफ आयत 28 में है, उन्होंने (इब्राहीम ने) इस पैगाम (इस्लाम) को अपनी औलादों में कलमा बाक़िया यानि बाक़ी रहने वाली चीज़ क़रार दिया।

इसकी व्याख्या करते हुए इमाम जाफर सादिक़(अ.) फरमाते हैं कि इस बाक़ी रहने वाले कलमे से मतलब वह इमामत है जो इमाम हुसैन(अ.) की औलाद में क़यामत तक बाक़ी रहेगी। इस तरह कुरआन की ये आयत आखिरी इमाम(अ.) के बारे में खबर देती है। जो इस दुनिया के खात्मे तक ज़मीन पर मौजूद होगा। ये इमाम पैगम्बर मोहम्मद(स.) और इमाम हुसैन(अ.) की नस्ल से होगा। दुनियाए इस्लाम उस इमाम को इमाम मेहदी(अ.) के नाम से जानती है। 

देखा जाये तो हज़रत इब्राहीम की नस्ल उनके दो बेटों से चली। हज़रत इस्माईल और हज़रत इस्हाक़। इनमें से हज़रत इस्हाक़ के सिलसिले में हज़रत ईसा(अ.) आज भी जिंदा हैं। जबकि हज़रत इस्माईल के सिलसिले में इमाम मेहदी(अ.) जिंदा हैं।  

इससे पहले के भागों में हमने पैगम्बर मोहम्मद(स.) की उन भविष्यवाणियों का ज़िक्र किया जिनमें पैगम्बर ने अपने बाद इस्लाम के बारह धर्माधिकारियों की खबर दी थी। इनमें से ग्यारह के बारे में हम विस्तार से पिछले भागों में बता चुके हैं। अब अय्यून अखबारुलरज़ा किताब 2, हदीस 230 के मुताबिक बारहवें इमाम(अ.) के आने की भविष्यवाणी पैगम्बर मोहम्मद(स.) इन अलफाज़ में दे चुके हैं , ‘उस वक्त तक क़यामत बरपा न होगी यहाँ तक कि हममें से एक शख्स हक़ के लिये उठेगा और ये उस वक्त होगा जब अल्लाह उसे इजाज़त फरमायेगा। अगर क़यामत आने में एक दिन भी बाक़ी रह जायेगा तो अल्लाह उस दिन को इतना बड़ा कर देगा कि उसकी हुकूमत क़ायम हो जाये। वह तमाम दुनिया को उसी तरह अद्ल व इंसाफ से भर देगा जैसी वह ज़ुल्म व बेइंसाफी से भर चुकी होगी। जो उनकी पैरवी करेगा निजात पायेगा और जो पीछे रहेगा हलाक़ हो जायेगा। बन्दगाने खुदा! खुदा से डरते रहो। तुम्हें बर्फ से गुज़र कर भी उनके पास जाना पड़े तो भी चले जाओ। क्योंकि वह खुदा का और मेरा खलीफा होगा। 

उपरोक्त हदीस अलफाज़ के थोड़े हेरफेर के साथ सहीह तिरमिदी, सिनान अबू दाऊद, मुसनद अहमद बिन हम्बल जैसी तमाम किताबों में मिलती है। इस्लाम के कुछ फिरके समझते हैं कि अभी उस बारहवें इमाम(अ.) का जन्म नहीं हुआ है लेकिन कुछ बड़े फिरकों जैसे कि शियों का पुख्ता यकीन है कि बारहवें इमाम(अ.) का जन्म ग्यारह सौ साल पहले ही हो चुका है और वे इस दुनिया में मौजूद हैं लेकिन लोगों की आँखों से ओझल हैं। इसके पीछे एक दलील ये है कि इस्लामी धर्माधिकारी का जन्म हमेशा उसी घर में होता है जो गुनाहों से पूरी तरह पाक हो। और आज के दौर में ऐसा घर कहीं बचा हुआ नहीं दिखाई देता।   

हक़ीक़त यही है कि बारहवें इमाम के बारे में रसूल(स.) की भविष्यवाणी उस वक्त सच होकर सामने आयी जब 29 जुलाई 869 ई. (15 शाबान 255 हिजरी) फज्र के वक्त ग्यारवें इमाम हसन अस्करी(अ.) के घर सामरा में उनके फर्ज़न्द(अ.) की पैदाइश हुई। उस वक्त अब्बासी बादशाह मोत्तमिद व मुअतनर इमाम(अ.) के घर की हर पल निगरानी करा रहे थे। क्योंकि वह रसूल(स.) के घराने को हमेशा के लिये इस दुनिया से मिटा देना चाहते थे। उन्हें रसूल(स.) की उपरोक्त भविष्यवाणी का भी यक़ीन था। और ये डर सताये हुए था कि इस्लाम का ये आखिरी धर्माधिकारी उनकी हुकूमतों समेत ज़ुल्म की तमाम हुकूमतों का तख्ता पलट देगा और दुनिया में हुए तमाम अत्याचारों का बदला लेगा। लिहाज़ा वह ऐसे बच्चे को जिंदा ही नहीं रहने देना चाहते थे। लेकिन उनकी तमाम कोशिशें बेकार साबित हुईं और आखिरी धर्माधिकारी के दुनिया में आने की उन्हें भनक भी न लग पायी। यहाँ तक कि इमाम हसन अस्करी(अ.) की पत्नी जो कि एक रोमन शहज़ादी थीं, ने जब बच्चे को जन्म दिया तो उससे पहले उनमें गर्भावस्था के कोई लक्षण नहीं दिखाई देते थे।

फिर कुछ खास लोगों के अलावा बारहवें इमाम(अ.) को किसी ने भी नहीं देखा। जब ग्यारहवें इमाम हसन अस्करी(अ.) की शहादत हुई तो उनके भाई जाफर ने नमाज़ जनाज़ा पढ़ानी चाही। उस वक्त पाँच साल का एक बच्चा सामने आया, उसने चाचा को हटाकर खुद नमाज़ पढ़ाई मय्यत को दफनाने के बाद वहाँ से गायब हो गया। उसके बाद बादशाह के हुक्म से इमाम हसन अस्करी(अ.) के घर की सघन तलाशी ली गयी लेकिन वह बच्चा कहीं नहीं मिला। दरअसल यही बारहवें इमाम मेहदी (अ.) थे। सामरा में वह गुफा आज भी मौजूद है जहाँ इमाम मेहदी (अ.) गायब होकर बादशाह के सिपाहियों के हत्थे नहीं लगे थे। उसके बाद से वह आज भी जिंदा हैं ये बात इस्लाम के शिया सुन्नी वगैरा तमाम फिरकों की किताबों में मिलती है।

कुछ किताबों में ये मिलता है कि ग्यारहवें इमाम हसन अस्करी(अ.) ने अपनी शहादत से पहले खास असहाब से बारहवें इमाम मेहदी (अ.) की मुलाकात करवा दी थी। इन असहाब में शामिल हैं, याक़ूब बिन मनक़ूश, मोहम्मद बिन उस्मान उमरी, अबी हाशिम, मूसा बिन जाफर बिन वहब बगदादी वगैरा। एक सहाबी अबू हारून का कथन है कि मैंने बचपन में बारहवें इमाम मेहदी (अ.) को देखा है। उनका चेहरा चैदहवीं के चाँद की तरह चमकता था।

ग्यारहवें इमाम हसन अस्करी(अ.) की शहादत के बाद बारहवें इमाम मेहदी (अ.) की इमामत का दौर शुरू हुआ। इस पूरे दौर को दो हिस्सों में बाँटा जाता है। पहले हिस्से में लगभग पचहत्तर बरस तक इमाम(अ.) गायब तो थे लेकिन उनका सम्पर्क पूरी तरह अवाम से नहीं टूटा था। बल्कि अपने कुछ खास नायबों के ज़रिये वे अवाम के सम्पर्क में थे और उनके मसलों को हल करते थे। उन खास नायबों में पहले हज़रत उस्मान बिन सईद उमरी थे। फिर हज़रत मोहम्मद बिन उस्मान फिर हज़रत हुसैन बिन रूह और फिर हज़रत अली बिन मोहम्मद इमाम मेहदी(अ.) के नायब बने। 

हज़रत अली बिन मोहम्मद के बाद इमाम मेहदी (अ.) की इमामत का दूसरा दौर शुरू हुआ जिसमें नायबों का सिलसिला खत्म हो गया और इमाम मेहदी (अ.) पूरी तरह ग़ैबत के पर्दे में चले गये। इस बारे में हज़रत अली बिन मोहम्मद को इमाम(अ.) का पैगाम अपने इंतिकाल के छः दिन पहले इन अलफाज़ में मिला, ‘ऐ अली बिन मोहम्मद, खुदा वन्दे आलम तुम्हारे बारे में तुम्हारे भाईयों और दोस्तों को सब्र अता करे। तुम्हें मालूम हो कि तुम छः दिन में वफात पाने वाले हो। तुम अपने इंतिज़ामात कर लो और आइंदा के लिये अपना कोई सिलसिला तलाश न करो। इसलिए कि बड़ी ग़ैबत शुरू हो गयी है और खुदा की मर्ज़ी के बगैर ज़हूर नामुमकिन होगा। ये ज़हूर बहुत लंबे अर्से के बाद होगा।

इस तरह इमाम मेहदी(अ.) की ग़ैबत का लंबा दौर शुरू हुआ जो आज भी चल रहा है। हालांकि इस दौर में भी इमाम(अ.) घनी बादली में सूरज की तरह कभी कभी नज़र आये और फिर छुप गये। कुछ निशानियों से इमाम(अ.) के चाहने वालों ने उन्हें पहचाना। 

मसलन हर दौर में काबे और उसके पत्थर हज्रे अस्वद का असली वारिस इमाम(अ.) ही होता है। और उसके अलावा कोई भी काबे के पत्थर को उसकी जगह पर नहीं लगा सकता। सन 921 ई (307 हि.) में ऐसी ही घटना हुई जब काबे की निगरानी करने वालों ने हज्रे अस्वद को निकाल लिया था। वे उसे दुरुस्त करके फिर से लगाना चाहते थे। उस दौर में अबुलकासिम नामक आलिम ने जब ये सुना तो अपने वफादार नौकर को वहाँ एक खत के साथ भेजा और कहा कि जो उस पत्थर को लगाये उसे ये खत दे देना। नौकर ने देखा कि वहाँ मौजूद बहुत सारे लोगों ने कोशिश की लेकिन उस पत्थर को लगा नहीं सके। इतने में एक खूबसूरत जवान एक तरफ से आया और उसने उस पत्थर को उसकी जगह पर लगा दिया। जब वह वापस जाने लगा तो अबुलकासिम का नौकर उसके पीछे लग गया। रास्ते में उस जवान ने पलट कर नौकर को उसके नाम से पुकारा और कहा कि अपने मालिक का खत मुझे दे दे और उनसे कहना कि उन्होंने मुझसे अपनी उम्र के बारे में पूछा है तो अभी वो तीस साल और जिंदा रहेंगे। नौकर ने आकर आलिम से ये बात बतायी। अबुलकासिम समझ गये कि हज्रे अस्वद को लगाने के लिये इमाम मेहदी(अ.) ही आये थे। उसके बाद अबुलकासिम तीस साल जिंदा रहे।      

कुछ लोग एतराज़ करते हैं कि अगर इमाम गायब है तो वह इमाम कैसा? क्योंकि गायब होकर वह लोगों की हिदायत नहीं कर सकता। लेकिन यह सोचना गलत है कि खुदा का बनाया इमाम गायब होकर हिदायत नहीं कर सकता। क्योंकि वह तो पूरे सिस्टम की ही हिदायत कर रहा है। यानि उसी की वजह से ज़मीन के तमाम सिस्टम सुचारू तरीके से चल रहे हैं। और ज़मीन उसी तरह जिंदा है जैसे कि इंसान अपनी आत्मा के साथ जिंदा होता है। खुदा का बनाया इमाम इंसानों के साथ साथ दुनिया की हर मख्लूक़ जानदार व बेजान सबकी हिदायत करता है और इसीलिए ज़मीन का सिस्टम क़ायम रहता है।

एक सवाल और पैदा होता है कि अगर इमाम के पास इतनी ही ताकत है कि दुनिया के तमाम सिस्टम्स उसके इशारों पर कायम हैं तो उसे किसी के डर से छुपने होने की ज़रूरत क्या है। वह सिर्फ इशारा कर दे तो दुनिया के तमाम ज़ालिम मिट जायें।

इसका जवाब ये है कि इमाम ज़मीन पर अल्लाह का नायब होता है। तो ज़ाहिर है जो अल्लाह की मर्ज़ी होती है वही उसका मिजाज़ होता है। और अल्लाह की मर्ज़ी ये है कि लोग अपनी मर्ज़ी से उसकी राह पर चलें व उसकी इबादत करें। वह किसी के साथ ज़बरदस्ती नहीं करता। उसकी रहमत से वह भी फायदा उठाते हैं जो उससे इंकार करते हैं और उसके प्यारे बंदों पर अत्याचार करते हैं। तसव्वुर कीजिए अगर अल्लाह सामने होता तो? फिर लोगों में उसका खौफ रहता, जैसे कि किसी बादशाह की हुकूमत में होता है। फिर लोग दिल से नहीं बल्कि ज़बरदस्ती उसकी इबादत करते। इस तरह की इबादत भी एक तरह का ज़ुल्म होती। और यकीनन खुदा ज़ालिम नहीं है।

तो अगर खुदा का नायब यानि इमाम छुपा हुआ न होता तो दो में से एक बात होती। या तो इमाम ज़ालिमों पर ग़ालिब आ जाता। तो फिर ज़ालिम ज़बरदस्ती खुदा की इबादत करने पर मजबूर हो जाते। और खुदा को ज़बरदस्ती की इबादत मंज़ूर नहीं। या फिर दूसरी बात ये होती कि इमाम लोगों को उनके हाल पर छोड़ देता। तो फिर ज़ालिम उसपर ग़ालिब आने की कोशिश करते। अब अगर इमाम उनसे जिहाद करके ग़ालिब आ जाता तो खुदा की हुज्जत क़ायम न होती और अगर ज़ालिम इमाम के ऊपर ग़ालिब आ जाते तो करबला जैसा हादसा फिर हो जाता और ज़मीन पर कोई धर्माधिकारी बाकी न रह जाता। इस तरह खुदा की मसलहत इसी में थी कि इमाम(अ.) गायब रहकर दुनिया की हिदायत करे।

यहाँ एक सवाल और भी लोग उठा सकते हैं कि जब आखिरी इमाम को छुपाकर रखना खुदा की मसलहत है तो पहले के इमामों को ज़ाहिर क्यों किया गया? इसका जवाब बहुत आसान है। दरअसल बाक़ी इमामों को ज़ाहिर करने के पीछे भी खुदा की हुज्जत ही थी ताकि दुनिया ये न कहे कि अगर वो ज़ाहिर होते तो हम उनसे हिदायत हासिल कर लेते। लेकिन उन इमामों के साथ दुनिया ने जो सुलूक किया उसके बाद उन्हें ये कहने का कोई हक़ नहीं रह गया कि आखिरी इमाम(अ.) को खुदा ने छुपाकर क्यों रखा। हालांकि ग़ैब के पर्दे में रहने के बावजूद सख्त ज़रूरत पड़ने पर इमाम(अ.) अपने चाहने वालों की मदद भी करते हैं।

इस ज़माने के इमाम(अ.) के लिये पहले इमाम अली(अ.) ने भी भविष्यवाणी की है। किताब नहजुल बलागा के खुत्बा 148 में इमाम अली(अ.) फरमाते हैं, ‘वह लोगों से पोशीदा होगा। खोज लगाने वाली पैहम नज़रें जमाने के बावजूद भी उसके नक़्शे कदम को न देख सकेंगे।’ यानि इमाम हमारी नज़रों के सामने से गुज़रेंगे लेकिन हमारी आँखें उन्हें देखने से लाचार होंगी। जब इमाम(अ.) खुद चाहेंगे तभी उन्हें कोई देख सकेगा।

इमाम मेहदी(अ.) के सामने आने से पहले दुनिया पूरी तरह बदलकर लगभग बरबादी के कगार पर खड़ी होगी। किताबों में इमाम मेहदी(अ.) के सामने आने से पहले के कुछ हालात इस तरह बयान किये गये हैं:  

रिश्वत और शराबखोरी आम होगी - वज़ीर झूठे होंगे - सहक़ यानि औरतें औरतों के ज़रिये शहवत की आग बुझायेंगी - सदक़ा व खैरात से नाजायज़ फायदा उठाया जायेगा - पश्चिम से सूरज निकलेगा - एक सुर्खी ज़ाहिर होगी जो आसमान और सूरज पर गालिब आ जायेगी - लोग सवारियों से टकराकर मरेंगे - शाम(सीरिया) तबाह व बरबाद हो जायेगा - शाम (सीरिया) में चीनी घुस जायेंगे - कुछ गिरोह सुअर और बन्दर की सूरत में बदल जायेंगे - बुराई का हुक्म अपने बच्चों को दिया जायेगा और अच्छाई से रोका जायेगा - मस्जिदें आबाद मगर हिदायत से खाली होंगी - लड़के औरतों की तरह उजरत पर इस्तेमाल होंगे - औरतें अपने शौहरों को मर्दों के साथ बदफेअली पर मजबूर करेंगी - जज फैसले में रिश्वत लेंगे - क़ब्र से कफन चुराकर बेचा जायेगा - लाश का मज़ाक उड़ाया जायेगा - ऐसे हाकिम होंगे कि जब उनसे कोई बात करेगा तो क़त्ल कर दिया जायेगा - सूदखोरी खुलेआम होगी - दरिन्दे इंसानों से बातें करने लगेंगे - इंसान की रानें बोलने लगेंगी और वह उसके घर के लोगों ने जो कुछ किया होगा घर के मालिक से बताने लगेंगी - मस्जिदों से आवाज़ें ऊंची होंगी - एक यमनी बादशाह ‘हसन’ नामी यमन से खुरूज करेगा - हज का रास्ता बन्द कर दिया जायेगा - अहले नाक़स ‘नुसैरी’ की हुकूमत पूरी दुनिया पर छा जायेगी - हिन्द तिब्बत की वजह से तबाह होगा और तिब्बत की तबाही चीन की वजह से होगी - दुनिया में हब्शियों की हुकूमत क़ायम हो जायेगी 

हम देख सकते हैं कि इन भविष्यवाणियों में से बहुत सी आज के दौर में सच होती दिख रही हैं, और बहुत सी आइंदा हक़ीक़त बनकर सामने आ जायेंगी, आसार कुछ ऐसे ही नज़र आ रहे हैं। इस तरह खुदा का वादा पूरा होकर रहेगा, ज़ुल्म व ज़्यादतियों के दौर में इमाम(अ.) का ज़हूर होगा जो ज़ालिमों से जंग करेगा और हक़ व अदालत की रविश क़ायम करेगा। किताबों के मुताबिक जब इमाम(अ.) ज़ाहिर होंगे तो आप चालीस साल के जवान होंगे। जिस्मानी ताकत इतनी होगी कि मज़बूत पेड़ों को अपने बाज़ुओं की ताकत से उखाड़ देंगे। रफ्तार इतनी तेज़ कि चन्द कदमों में पूरी दुनिया नाप लेंगे। 

आपके अहदे हुकूमत में मुकम्मल अमन व सुकून होगा। बकरी और भेड़िया, गाय और शेर, इंसान और साँप, जुंबील और चूहे सब एक दूसरे से बेखौफ होंगे। तमाम लोग पाकबाज़ होंगे। आजिज़ों, ज़ईफों की दादरसी होगी। ज़ुल्म दुनिया से मिट जायेगा। दीन के मुरदा दिल में ताज़ा रूह पैदा हो जायेगी। दुनिया के तमाम मज़हब खत्म हो जायेंगे। सिर्फ खुदा का बताया हुआ धर्म होगा और उसी का डंका बजता होगा। खुदा की तरफ से शहरे मक्का के हरे भरे मैदान में मेहमानी होगी। सारी दुनिया खुशियों से भर जायेगी। दुनिया के तमाम मज़लूम बुलाये जायेंगे और उनपर ज़ुल्म करने वाले हाज़िर किये जायेंगे। इमाम हुसैन(अ.) के खून का मुकम्मल बदला लिया जायेगा और इस तरह इमाम मेहदी(अ.) ‘दम तोड़ चुकने वाली किताब व सुन्नत को फिर से जिंदा कर देंगे।

मनाक़िब अहलेबैत के मुताबिक जब आखिरी धर्माधिकारी ज़हूर करेंगे तो वह मिस्र की तरफ जायेंगे। उस शहर की जामा मस्जिद में मेंबर पर बैठेंगे और लोगों के सामने खुत्बा पढ़ेंगे। फिर बहुत जल्द ज़मीन को इंसाफ की खुशखबरी दी जायेगी। आसमान बारिश बरसायेगा, दरख्त फल देंगे। ज़मीन तमाम नबातात उगायेगी। ज़मीन को उसपर रहने वालों के लिये ज़ीनत बख्शी जायेगी। लोग दरिन्दों से महफूज़ हो जायेंगे। यहाँ तक कि दरिन्दे रास्ते में जानवरों की तरह चरेंगे। इल्म व दानिश लोगों के दिलों में जगह बनायेगी। यहाँ तक कि कोई मोमिन इल्म में अपने भाई का मोहताज नहीं होगा।
--समाप्त--

Saturday, April 11, 2015

कौन है इस्लाम का सर्वोच्च अधिकारी? (भाग 13)

पैगम्बर मोहम्मद(स.) उस धर्म के आखिरी पैगम्बर थे जिसे अल्लाह ने दुनिया के तमाम इंसानों के लिये पसन्द किया। उस धर्म के पहले संदेशवाहक हज़रत आदम(अ.) थे और उसकी शरीयत को मुकम्मल करने वाले थे पैगम्बर मोहम्मद(स.)। इस्लाम की शरीयत को मुकम्मल करके पैगम्बर मोहम्मद(स.) सन 632 ई में इस दुनिया से विदा हो गये। लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि उसके बाद बिना किसी सर्वोच्च धर्माधिकारी के धर्म अनाथ हो गया। बल्कि अल्लाह ने हमेशा अपनी शरीयत व धर्म को क़ायम रखने के लिये दुनिया में एक सर्वोच्च धर्माधिकारी के वजूद को बाक़ी रखा। और सदियां गुज़रने के बावजूद धर्म आज भी अनाथ नहीं है।

जब इमाम अली नक़ी(अ.) की शहादत हुई, उस वक्त तक उस दौर के बादशाहों का ज़ुल्म अपनी हद को पार कर रहा था। ऐसे वक्त में अगले सर्वोच्च धर्माधिकारी इमाम हसन अस्करी(अ.) इस दुनिया में तशरीफ लाये। 

इमाम हसन अस्करी(अ.) इमाम अली नक़ी(अ.) के बेटे थे और इनकी पैदाइश सामरा में हुई। इमाम अली नक़ी(अ.) ने अपने बाद के दो आखिरी इमामों की खबर इस तरह दी, ‘यकीनन मेरे बाद मेरा फर्ज़न्द ‘हसन’ इमाम होगा। और मेरे हसन के बाद उसका फर्ज़न्द ‘क़ायम’ इमाम होगा। और वही है जो ज़मीन को अद्ल व इंसाफ से भर देगा जिस तरह वह ज़ुल्म व जोर से भर चुकी होगी। 
 
बाइस साल की उम्र में इमाम हसन अस्करी(अ.) ने अपने वालिद की शहादत के बाद इमामत का पद संभाला लेकिन सिर्फ छह साल बाद यानि अट्ठाइस साल की उम्र में आपको शहीद कर दिया गया। और इसके पीछे एक बड़ी वजह थी।

इमाम हसन अस्करी(अ.) के दौर के ज़ालिम बादशाह पैगम्बर मोहम्मद की बारह धर्माधिकारियों की भविष्यवाणी को पूरी तरह सच जानते थे। हालांकि आम जनता के बीच इसे झुठलाने की पूरी कोशिश करते थे लेकिन उनके दिल में ये डर पूरी तरह बैठा हुआ था कि बारहवाँ इमाम जो कि दुनिया से तमाम ज़ुल्म मिटाने आयेगा वह उनकी हुकूमत को भी नेस्त व नाबूद कर देगा। लिहाज़ा उन्होंने ग्यारहवें इमाम हसन अस्करी(अ.) व उनके पूरे घर को नज़रबन्द कर दिया था और उनकी पल पल की निगरानी की जा रही थी। और फिर थोड़े अर्से के बाद उन्हें शहीद भी कर दिया गया।

लेकिन उन बादशाहों की तमाम कोशिशें नाकाम हो गयीं। क्योंकि ग्यारहवें इमाम की शहादत से पहले ही बारहवां इमाम(अ.) इस दुनिया में अपना जलवा दिखाने के लिये आँखें खोल चुका था। बारहवें इमाम(अ.) के बारे में हम बातफसील गुफ्तगू करेंगे अगले भाग में।

इमाम हसन अस्करी(अ.) की जिंदगी का ज़्यादातर हिस्सा कैदखाने, नज़रबन्दी और ज़ालिम हाकिमों के ज़ुल्म सहते हुए बीता। एक बार इमाम(अ.) को ऐसे क़ैदखाने में डाला गया जिसका जेलर एक निहायत ज़ालिम शख्स था। उसकी बीवी ने उससे कहा कि खुदा से डरो। तुम नहीं जानते कि तुम्हारे घर में कौन है। उस शख्स ने कहा कि मैं उनको खुंखार जानवरों के बीच डाल दूंगा। फिर उसने आलाकमान से इस बारे में इजाज़त भी हासिल कर ली और इमाम(अ.) को खुंखार जानवरों के बीच डलवा दिया। लेकिन अगले दिन जब वह आया तो इमाम(अ.) को सही सलामत इबादत करते हुए पाया। इमाम(अ.) के गिर्द खुंखार जानवर घेरा बनाये हुए सर झुकाए खड़े थे। उसने चुपचाप इमाम(अ.) को वापस उस घर में भेज दिया जहाँ वह नज़रबन्द थे। 

इस्लाम के तमाम धर्माधिकारियों की तरह इमाम हसन अस्करी(अ.) भी लोगों के दिलों के हाल व उनकी ज़रूरतों से बखूबी वाक़िफ रहते थे। एक बार कामिल नाम के सहाबी जब इमाम(अ.) की खिदमत में हाज़िर हुए तो देखा कि इमाम(अ.) सफेद रंग का नर्म व खूबसूरत लिबास पहने हुए हैं। कामिल ने अपने दिल में कहा कि इमाम(अ.) दूसरों को तो मोटा लिबास पहनने व रूखा सूखा खाने का उपदेश देते हैं और खुद इतना नर्म व कीमती कपड़ा पहने हुए हैं। जैसे ही कामिल के दिल में ये ख्याल आया इमाम(अ.) मुस्कुराए और अपनी आस्तीन उलट दी। कामिल ने देखा कि उस कि उस नर्म कपड़े के नीचे इमाम(अ.) ने टाट का मोटा लिबास पहना हुआ था। उसके बाद इमाम(अ.) ने फरमाया, ऐ कामिल ये मोटा लिबास अल्लाह के लिये है और नर्म लिबास तुम्हारे लिये है।

मोहम्मद बिन अली नामक एक व्यक्ति का बयान है कि एक बार मेरी माली हालत बहुत खराब हो गयी थी तो मेरे वालिद ने मुझसे कहा कि इमाम हसन अस्करी(अ.) के पास चलते हैं और उनसे मदद माँगते हैं। दोनों उनके पास जाने के लिये निकले। रास्ते में वालिद ने कहा कि हमें 500 दरहम की ज़रूरत है। 200 दरहम कपड़े के लिये, 200 कर्ज़े के लिये और सौ बाकी खर्चों के लिये। मोहम्मद ने अपने मन में कहा कि मुझे तो 300 दरहम मिल जायें तो काफी है। 100 दरहम से चैपाया खरीदता, 100 में कपड़े बनवाता और 100 दूसरे खर्चों के लिये। और फिर जबल चला जाता।

ये दोनों जल्दी ही इमाम(अ.) की खिदमत में पहुंचे। लेकिन वहाँ मुलाकात के बावजूद शर्म की वजह से अपनी ज़रूरतें नहीं बतायीं। जब ये इमाम(अ.) के घर से निकल आये तो इमाम(अ.) का नौकर इनके पास पहुंचा। उसके हाथ में दो थैलियां थीं। एक थैली उसने मोहम्मद के वालिद को थमाई और कहा कि ये 500 दरहम हैं। 200 कपड़े के लिये, 200 कर्ज़े के लिये और 100 बाकी खर्चों के लिये। फिर उसने दूसरी थैली मोहम्मद की तरफ बढ़ाई और कहा कि इमाम(अ.) ने फरमाया है कि इसमें 300 दरहम हैं, 100 दरहम चैपाया खरीदने के लिये, 100 कपड़े बनवाने के लिये और 100 दूसरे खर्चों के लिये। लेकिन जबल मत जाना बल्कि सूरिया की तरफ जाना।

अपने पूर्वजों की तरह इमाम हसन अस्करी(अ.) को भी खुदा की इबादत से खास लगाव था। नमाज़ के वक्त आप तमाम काम छोड़ देते थे। उनके एक मिलने वाले एक बार जब इमाम(अ.) के पास आये तो उस वक्त इमाम(अ.) कुछ लिख रहे थे कि नमाज़ का वक्त आ गया। इमाम(अ.) ने वह तहरीर अलग रख दी और नमाज़ के लिये खड़े हो गये। 

इमाम(अ.) इस तरह इबादत करते थे कि दूसरे देख कर खुदा को याद करने लगते थे। जिस वक्त इमाम(अ.) बादशाह के हुक्म से कैद में थे उस वक्त वहां के इन्चार्ज ने दो ऐसे पहरेदारों को उनपर नियुक्त किया जो निहायत सख्त थे। और उन्हें इमाम पर सख्ती का हुक्म भी दिया गया था। लेकिन वह दोनों इमाम(अ.) के साथ रहते रहते बिल्कुल बदल गये। और नमाज़ व इबादतों में अपना वक्त गुज़रने लगे।
जब वज़ीर को इस बारे में खबर हुई तो वह दोनों को बुलाकर डाँटने फटकारने लगा। इसपर दोनों ने कहा हम उस इंसान के बारे में क्या कहें जो दिन में रोज़ा रखता है और रात इबादत में बसर करता है। इबादत के अलावा और कोई बात ही नहीं करता और कोई दूसरा काम नहीं करता। जब उसकी नज़र हमपर पड़ती है तो हम काँपने लगते हैं और अपने आप पर काबू नहीं रख पाते हैं।

कई बार इमाम(अ.) ने लोगों को गुमराही से बचाकर असली धर्म की पहचान करायी। एक बार सामरा में अकाल पड़ गया। लोग बारिश के लिये दुआ करते थे लेकिन बारिश नहीं होती थी। उसी दौरान ईसाईयों का बड़ा पादरी जासलीक़ ईसाईयों व दूसरे पादरियों के साथ रेगिस्तान में गया। उनमें से एक पादरी जब भी दुआ के लिये हाथ उठाता था फौरन बारिश होने लगती थी। इतनी बारिश हुई कि लोगों को पानी की ज़रूरत न रही। ये देखकर मुसलमान शक में पड़ गये और उनमें से कई ईसाई बन गये। ये बात मुसलमानों के खलीफा को नागवार गुज़री। उसने इमाम हसन अस्करी(अ.) को कैदखाने से बुलाया और कहा कि आप पैगम्बर मुहम्मद(स.) के वारिस हैं। अब मुहम्मद(स.) की शरीयत से लोग मुंह मोड़ रहे हैं। 

इमाम(अ.) ने जासलीक़ व दूसरे पैगम्बरों को अगले दिन दुआ के लिये रेगिस्तान में बुलवाया। उस दिन इमाम(अ.) व कई मुसलमान वहां पहुंच गये। उस पादरी ने जैसे ही दुआ के लिये हाथ उठाया वहाँ बादल घिरकर आ गये। अब इमाम(अ.) ने हुक्म दिया कि उस पादरी के हाथ में जो कुछ है उसे उठा लो। लोगों ने पादरी के हाथ में रखी चीज़ उठा ली। ये किसी इंसान की काली पड़ गयी हड्डी थी। इमाम(अ.) ने उस हड्डी को कपड़े में लपेट दिया और पादरी से दोबारा दुआ करने के लिये कहा। इसबार पादरी ने जैसे ही दुआ के लिये हाथ उठाया, बरसते हुए बादल वापस लौटने लगे। और वहाँ सूरज चमकने लगा। लोगों ने जब माजरा पूछा तो इमाम(अ.) ने फरमाया कि वह हड्डी दरअसल अल्लाह के नबी की है जो इस पादरी ने कब्र खोदकर हासिल कर ली है। ये हड्डी जैसे ही आसमान के नीचे आती है अल्लाह की रहमत बारिश की शक्ल में बरसने लगती है। फिर लोगों ने उस हड्डी को आज़माया तो इमाम(अ.) की बात सच साबित हुई।

कभी कभी लोग इमाम(अ.) की अजीबोग़रीब बातों को बाद में समझते थे। एक शख्स इमाम(अ.) की खिदमत में आया और कहने लगा कि मैंने फारस के सफर का इरादा किया है और वहां बसने का इरादा रखता हूं। इमाम(अ.) ने फरमाया ‘तुमने फारस के सफर का ज़िक्र किया है। इंशा अल्लाह तुम सही व सलामत मिस्र पहुंचोगे। वहाँ हमारे दोस्तों को हमारा सलाम कहना।’ वह व्यक्ति समझा कि इमाम(अ.) शायद बेखयाली में फारस की बजाय मिस्र बोल गये हैं। फिर वह बगदाद आया और वहाँ से फारस की तरफ जाना चाहता था। हालात कुछ ऐसे बने कि वह फारस न जा सका और बगदाद के बाद मिस्र चला गया। तब उसकी समझ में आया कि इमाम(अ.) ने यह क्यों फरमाया था कि मिस्र पहुँचोगे।

इमाम(अ.) के दौर में मोहम्मद बिन शीबानी नामक एक शख्स था जिसने एक बार किसी मुशरिक से बहस की जो कई खुदाओं को मानता था। शीबानी उसकी कुछ बातों से प्रभावित हो गया और वह दिल ही दिल में कई खुदाओं के होने की संभावना पर गौर करने लगा। फिर उसका सामरा जाना हुआ जहाँ उसकी मुलाकात इमाम हसन अस्करी(अ.) से हो गयी। इमाम(अ.) उसे कुछ देर गौर से देखते रहे और फिर उंगली से इशारा करके फरमाया ‘खुदा एक है, एक है। उसको एक ही मानो।’ यह सुनकर शीबानी हैरत में पड़ गया। क्योंकि उस वक्त तक उसकी इमाम(अ.) से कोई बात ही नहीं हुई थी और न इससे पहले कोई मुलाकात।

खुदा के बारे में इमाम हसन अस्करी(अ.) फरमाते हैं, ‘पाक है वह ज़ात जिसकी तारीफ हद से नहीं की जाती। न मख्लूक़ के गुण से उसे के गुण बताये जाते हैं। उसके जैसी कोई शय नहीं है। और न उससे कोई शय मिलती जुलती है और वह सुनने वाला व देखने वाला है। अल्लाह एक है, न उसने किसी को पैदा किया है न किसी ने उसको। न उसका कोई मिस्ल है न मानिन्द। वह खालिक है मख्लूक़ नहीं। अजसाम वगैरा से जो चाहता है पैदा करता है। वह जिस्म नहीं। वह जैसी सूरत चाहता है बना देता है। वह खुद सूरत नहीं। उसकी सना में बन्दगी है। उसके नामों में तक़द्दुस है। वह बरी है इससे कि कोई शय उससे मिलती जुलती हो।

इमाम हसन अस्करी(अ.) के ज़माने में एक नामी गिरामी फिलास्फर था इस्हाक अल किंदी। वह एक किताब को लिखने में व्यस्त था। जिसमें वह साबित करना चाहता था कि कुरआन में एक दूसरी को काटती हुई विरोधी बातें मौजूद हैं। (आज भी काफी लोग इसे साबित करने में लगे हुए हैं।) अपनी किताब को पूरी करने के लिये वह लोगों से अलग होकर तनहाई में अपने काम में जुट गया। एक दिन उसका एक शगिर्द इमाम(अ.) से मिलने आया तो इमाम(अ.) ने सवाल किया कि क्या तुममें से कोई ऐसा है जो अपने उस्ताद को इस बेमतलब काम से मना करे। तो शागिर्द ने कहा कि हममें से किसी में इतनी हिम्मत नहीं। तब इमाम(अ.) ने कहा कि अल किंदी लोगों की बातें गौर से सुनता है। तुम उससे नज़दीकियां बढ़ाओ और उसके कामों में मदद करो। फिर उससे एक सवाल पूछने की इजाज़त लो। जब इजाज़त दे दे तो सवाल करो कि अगर कुरआन को बयान करने वाला आपके सामने आये और कहे कि मैंने कुरआन के शब्दों का वह मतलब नहीं दिया है जो आप समझ रहे हैं। हो सकता है उन शब्दों का मतलब कुछ और हो जहाँ तक आपकी पहुँच न हो सकी हो।

अल किंदी का शागिर्द अपने गुरू के पास आया और इमाम(अ.) के कहने के मुताबिक अपने गुरू से पेश आया और फिर सवाल किया। अल किंदी इस सवाल को सुनकर गहरी सोच में उूब गया। और फिर उसे ये बात तर्क की कसौटी पर खरी लगी। उसने शागिर्द से पूछा ये सवाल तुम्हारे दिमाग में नहीं आ सकता था। सच बताओ कि ये किसका सवाल है। इसपर शागिर्द ने इमाम(अ.) से मुलाकात का पूरा हाल कह सुनाया। अल किंदी ने कहा कि सच है इस तरह की बात इमाम(अ.) ही कर सकते हैं। उसके बाद अल किंदी ने इस सिलसिले में जो कुछ भी लिखा था सब आग के हवाले कर दिया। 

इमाम हसन अस्करी(अ.) की कुछ नसीहतें इस तरह हैं:
जब दिल खुश हो तो उसे ज्ञान व हिकमत हासिल करने पर लगाओ और जब ग़मगीन हो तो उसे आज़ाद रखो।
जिसने दूसरों के सामने किसी को नसीहत की उसने उसे बदनाम किया।
तमाम बुराईयाँ एक घर में बन्द हैं और झूठ उसकी कुंजी है।
एहतियात की भी एक हद है, जब उससे गुज़र जाये तो बुज़दिली है।

अपने भाई को नसीहत करते हुए इमाम(अ.) ने फरमाया, मैं तुम्हें तक़वाये इलाही की नसीहत करता हूं। तुम्हें नमाज़ के क़याम और ज़कात की अदायगी की ताकीद करता हूं। क्योंकि जो ज़कात अदा नहीं करता उसकी नमाज़ कुबूल नहीं होती। तुम्हें ये भी नसीहत करता हूं कि तुम दूसरों की गलतियों और बुराईयों से दरगुज़र करो। गुस्सा पी जाया करो। रिश्तेदारों के साथ रहम व नेक सुलूक करो। भाईयों के साथ बराबर का बरताव करो। सख्ती और बुरे वक्त में उनकी ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश करो। लोगों की जहालत व नादानी के मुकाबले में उदार रहो। दीन में गहरी नज़र रखो। कामों को मज़बूत तरीके से अंजाम दो। कुरआन का इल्म हासिल करो। अच्छे अमल करो और लोगों को बुरे काम से रोको।

ऐसे होते हैं इस्लाम के सच्चे धमाधिकारी।

Tuesday, March 3, 2015

कौन है इस्लाम का सर्वोच्च अधिकारी? (भाग 12)

इमाम मोहम्मद तक़ी(अ.) को उस ज़माने के ज़ालिम बादशाह ने सिर्फ पच्चीस साल की उम्र में शहीद कर दिया था। लेकिन अल्लाह का वादा कि ज़मीन कभी भी धर्म के सर्वोच्च अधिकारी से खाली नहीं रहेगी, उस वक्त भी पूरा हुआ। और इमाम(अ.) की शहादत से पहले नये धर्माधिकारी का जन्म हो चुका था।

इस्लाम के नये धर्माधिकारी थे इमाम अली नक़ी(अ.) जो इमाम मोहम्मद तक़ी(अ.) के बेटे थे। जब इमाम मोहम्मद तक़ी(अ.) की शहादत हुई उस वक्त इमाम अली नक़ी(अ.) की उम्र मात्र सात-आठ साल थी। उस वक्त जो लोग आले मोहम्मद से उनके ज्ञान व लोकप्रियता के कारण दुश्मनी रखते थे उन्होंने तय किया कि इस बच्चे के लिये कोई ऐसा उस्ताद रख दिया जाये जो उन्हें धर्म के सच्चे ज्ञान से अलग झूठे अकीदों को पढ़ाये और साथ ही इस्लाम के सच्चे मानने वालों से उन्हें दूर रखे। इस काम के लिये जुनैद नामक एक उस्ताद को उन लोगों ने नियुक्त कर दिया।
फिर कुछ महीनों के बाद जब उन लोगों ने जुनैद से इमाम अली नक़ी(अ.) का हाल चाल लिया तो जुनैद ने मुंह बनाकर कहा कि यह बच्चा खुद ही मेरा उस्ताद बन चुका है। इसे कुरआन व इस्लाम का ऐसा ज्ञान है जो इस दुनिया में किसी को नहीं।    

इमाम अली नक़ी(अ.) के ज़माने में बादशाहत अपने पूरे आतंकी रूप में आ चुकी थी। उस वक्त मुत्वक्किल की ‘खिलाफत’ थी और वह अत्याचार के मामले में किसी भी हाल में आज की आई.एस. या बोको हराम की ‘खिलाफत’ से कम नहीं थी। मुत्वक्किल ने अपनी हुकूमत में काला लिबास ड्रेस कोड के रूप में लागू कर दिया था और सिर्फ इसलिए लोगों को क़त्ल करा देता था कि वे ये ड्रेस नहीं पहनते थे।

मशहूर शायर व अदीब इब्ने सुकैत मुत्वक्किल के बेटों का उस्ताद था। मुतवक्किल ने उससे पूछा कि तुम्हें मेरे बेटे ज़्यादा प्यारे हैं या हसन(अ.) व हुसैन(अ.)? इब्ने सुकैत ने जवाब दिया कि मुझे तेरे बेटों के मुकाबले में हसन(अ.) व हुसैन(अ.) के गुलाम ज़्यादा प्यारे हैं। नाराज़ होकर मुत्वक्किल ने इब्ने सुकैत की ज़बान गुद्दी से खिंचवाने का हुक्म दे दिया और इस तरह अरब के नामवर, दिलेर व बेबाक शायर की मौत हुई।

इस तरह का मुश्किल दौर था इस्लाम के नये धर्माधिकारी इमाम अली नक़ी(अ.) का दौर, जब इंसाफ व सच कहने का मतलब था अपनी जान गंवाना या थर्रा देने वाले अत्याचारों को सहना। लेकिन इस मुश्किल दौर में भी इमाम(अ.) इस्लाम की सच्चाई का पैगाम ज़माने को देने के अपने मिशन पर कायम रहे।

अपनी तमाम सख्तियों के बावजूद मुत्वक्किल को ये डर सताता रहता था कि कहीं इमाम अली नक़ी(अ.) लोगों के साथ मिलकर बगावत न कर दें और उसका तख्ता न पलट जाये। लिहाज़ा उसने इमाम(अ.) को मदीने से सामरा बुला लिया और फिर इमाम(अ.) दोबारा कभी अपने वतन मदीने न जा सके। और आखिरकार मुअतनर अब्बासी के हुक्म से दिये गये ज़हर द्वारा आपकी शहादत हुई।

इस्लाम का सच्चा धर्माधिकारी नामुमकिन को मुमकिन करके दिखाता है और उसे आने वाले हालात का ज्ञान होता है। मुत्वक्किल ने इमाम(अ.) को मदीने से सामरा बुलाने के लिये यहिया नामक सरदार को तीन सौ सिपाहियों के साथ मदीने भेजा। यहिया के लश्कर में एक कातिब भी था जो इमाम(अ.) का चाहने वाला था। चलते हुए वे एक सुनजान जगह पहुंचे जहाँ दूर दूर तक किसी आबादी का नामोनिशान न था। फौज में मौजूद एक अफसर उस कातिब के साथ बहस करते हुए कहने लगा कि तुम्हारे इमाम अली(अ.) का कहना है कि दुनिया में कोई ऐसी जगह नहीं होगी जिस में कब्र न हो या बाद में क़ब्र न बन जाये। तो बताओ कि इस सुनसान जगह में किसकी कब्र होगी। तुम्हारे इमाम यूं ही कह दिया करते हैं। फिर वहां मौजूद सभी लोग उस कातिब का मज़ाक उड़ाने लगे और वह शर्मिन्दा हो गया। फिर लश्कर आगे बढ़ा और जल्दी ही मदीने में दाखिल हो गया। जब इमाम अली नक़ी(अ.) को मुत्वक्किल के बुलावे का पैगाम मिला तो इमाम ने रवानगी के लिये दो तीन दिन की मोहलत माँगी। जब मोहलत मिल गयी तो इमाम ने दर्ज़ी को बुलाया और उससे गर्म कपड़े और टोपियां सिलने को कहीं। ये सुनकर वहाँ मौजूद लश्कर के लोग हैरत में पड़ गये कि इस सख्त गर्मी के मौसम में इमाम(अ.) गर्म कपड़े सिलवा रहे हैं। 

फिर इमाम(अ.) को लेकर ये काफिला सामरा के लिये रवाना हुआ। और जब ठीक उसी सुनसान जगह पहुंचा तो एकाएक मौसम बदल गया। और वहां बिजली की कड़क के साथ ऐसी बारिश होने लगी कि लोगों ने कभी नहीं देखी थी। साथ ही कड़ाके की ठंड पड़ने लगी। इमाम ने अपने साथ लाये हुए गर्म कपड़े पहने और बरसातियों से अपने व अपने सहाबियों के जिस्म ढांक दिये। जब मौसम साफ हुआ तो लोगों ने देखा कि लश्कर के अस्सी लोग इस तूफान की चपेट में आकर मर चुके थे। अब इमाम(अ.) ने यहिया से फरमाया कि खुदा इसी तरह ज़मीन के हर टुकड़े को मुरदों से भरता है। ये सुनकर यहिया अपने घोड़े से उतरा और इमाम(अ.) के हाथों पर बोसा लेकर बोला कि मैं आज से इमामत पर ईमान लाता हूं।

ये काफिला इमाम(अ.) को लेकर जब सामरा पहुंचा तो मुत्वक्किल ने ऐसी जगह इमाम को ठहराने का हुक्म दिया जहाँ शरीफ लोग नहीं टिकते थे। वह फकीरों के बैठने की जगह थी और निहायत गंदी थी। इमाम(अ.) के एक चाहने वाले ने जब इमाम(अ.) को इस हालत में देखा तो गमगीन हो गया। इमाम(अ.) ने उसे तसल्ली देते हुए फरमाया कि ग़म न करो। खुदा ने हमें जो दरजा दिया है उसे कोई नहीं छीन सकता। ये कहते हुए इमाम(अ.) ने उंगली का इशारा किया तो चाहने वाले की नज़र में बेहतरीन बाग़, सब्ज़ा व नहरें नज़र आने लगीं। ये देखकर उसे इत्मिनान हुआ।             

एक सच्चे धर्माधिकारी की एक पहचान ये होती है कि वह दुनिया में बोली जाने वाली तमाम ज़बानों को जानता है। इमाम अली नक़ी(अ.) के बारे में एक वाकिया ये है कि एक दिन उनके सहाबी अबू हाशिम जब उनसे मिलने आये तो इमाम (अ.) उनसे हिंदी ज़बान में बातें करने लगे। जब अबू हाशिम समझ न सके तो इमाम(अ.) ने पास में पड़ी एक कंकरी उठायी और अपने मुंह में रख ली। फिर वह कंकरी इमाम(अ.) ने अबू हाशिम को देकर उसे चूसने के लिया कहा। जैसे ही अबू हाशिम ने वह कंकरी चूसी वह तिहत्तर ज़बानों के आलिम बन गये जिनमें हिंदी भी शामिल थी।

इस्लाम का सच्चा धर्माधिकारी किसी भी तरह के हालात को बदलने की योग्यता रखता है। और हर मुश्किल को आसान कर सकता है। यूनुस नाम का नगीना तराश सामरा में इमाम(अ.) का पड़ोसी था और बराबर इमाम(अ.) की खिदमत में हाज़िरी दिया करता था। एक बार वह डरता काँपता हुआ आया और बताने लगा कि बादशाह के एक वज़ीर ने मुझे एक क़ीमती नग तराशने के लिये दिया था। वह तराशते वक्त दो टुकड़े हो गया। अब मुझे क़त्ल होने से कोई नहीं बचा सकता। इमाम(अ.) ने मुस्कुराते हुए कहा, जाओ तुम्हें कुछ नहीं होगा। अल्लाह सब ठीक कर देगा।

फिर दूसरे दिन यूनुस फिर आया। अब उसके चेहरे से खुशी छलक रही थी। इमाम(अ.) के पूछने पर उसने माजरा बताया कि वह वज़ीर के बुलाने पर वह जब गया तो वज़ीर ने कहा कि मेरी दो बच्चियां उस नग के लिये आपस में जिद कर रही हैं। क्या तुम उस नग को दो कर सकते हो? हम तुम्हें उसका भरपूर ईनाम देंगे।
इमाम(अ.) ने पूछा कि फिर तुमने क्या जवाब दिया? तो यूनुस ने कहा कि मैंने उससे कहा कि मुझे थोड़ी मोहलत दो ताकि मैं गौर कर सकूं कि इस काम को कैसे करना है। इमाम(अ.) ने फरमाया कि तुमने अच्छा जवाब दिया।

इमाम अली नक़ी(अ.) के कुछ कीमती कौल इस तरह हैं,
ईमान वह है जिसे दिल कुबूल कर ले और आमाल उसकी तस्दीक़ करें।
जो खुदपसन्द (अपने को पसंद करने वाला) होगा उससे ज़्यादा लोग नाराज़ रहेंगे।
बेहूदा बातें बेवकूफों की तफरीह और नादानों का काम है।
जिसने अपनी शख्सियत को ज़लील व रुस्वा किया तुम उसके शर से मुतमईन न रहो। 
अगर कोई साहिबे हक़ बेवकूफी की हरकतें करने लगे तो उसकी हरकतों के कारण उसके हक़ का नूर खामोश हो सकता है।

इमाम अली नक़ी(अ.) अपनी शहादत से पहले अपने बाद के धर्म के सर्वोच्च अधिकारियों की खबर दे चुके थे। सहाबी अबुल क़ासिम को अपने बाद के इमामों की खबर देते हुए इमाम अली नक़ी(अ.) ने फरमाया, मेरे बाद मेरे बेटे ‘हसन’ इमाम होंगे और उनके बाद उनके बेटे। वह दिखाई नहीं देंगे। उनका नाम लेने की इजाज़त नहीं है जब तक कि वह सामने न आ जायें। वह ज़मीन को अद्ल व इंसाफ से उसी तरह भर देंगे जैसे कि वह ज़ुल्म व जोर (अत्याचारों) से भर चुकी होगी।