Saturday, March 3, 2018

कितने अक्षर हो सकते हैं एक आदर्श भाषा में?


अक्षर हमारी ज़बान और भाषा के मूल होते हैं। अक्षरों के बिना कोई भी भाषा शुरू नहीं होती। अलग अलग भाषाओं में अक्षरों की संख्या अलग अलग है। अगर अंग्रेजी में 26 अक्षर हैं तो उर्दू में 38। हिन्दी में 47 अक्षर हैं तो मराठी में 52। अगर म अक्षरों से निकलने वाली आवाजों की बात करें तो अलग अलग भाषाओं के अक्षरों को समरूपता के आधार पर एक मान सकते हैं। मिसाल के तौर पर अंग्रेजी का ‘ए’, हिन्दी का ‘अ’ और उर्दू का ‘अलिफ’ एक ही माने जायेंगे। इसी तरह अंग्रेजी का ‘डी’, हिन्दी का ‘ड’ और उर्दू का ‘डाल’ एक जैसी आवाज़ निकालते हैं। 

कुछ ऐसी भी आवाजें होती हैं जिनके एक भाषा में तो अक्षर मिलते हैं लेकिन दूसरी में नहीं। जैसे ‘प’ के लिये हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी में तो अक्षर हैं लेकिन अरबी में नहीं। इसी तरह अंग्रेजी ‘ज़ेड’ के लिये हिन्दी में शुद्ध अक्षर नहीं है अत: उसे लिखने के लिये ज के नीचे बिन्दी लगानी पड़ती है। 

एक ही भाषा में कई ऐसे भी अक्षर हो सकते हैं जिनकी आवाज़ एक जैसी निकले। जैसे हिन्दी का ग और ज्ञ। या श और ष। अगर एक जैसी आवाजों वाले अक्षर कम कर दिये जायें, तो वर्णमाला में कम अक्षरों से काम चल सकता है। तो एक बड़ा सवाल ये पैदा होता है कि एक आदर्श वर्णमाला में कितने अक्षर कम से कम रखे जायें कि सारी आवाजें निकल आयें? 
अगर अंग्रेजी को आदर्श मानें तो उसमें द, त और श के लिये अक्षर नहीं हैं। यानि इनके लिये 26 से ज्यादा अक्षर होने चाहिए। इसी तरह अरबी को भी आदर्श नहीं मान सकते वरना ‘प’ के लिये कोई अक्षर नहीं मिलेगा। उर्दू और हिन्दी में ज़रूरत से ज्यादा अक्षर हैं।

इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिये आईए रुख करते हैं इस्लाम की तरफ। 

इस्लामी विद्वान शेख सुद्दूक (र.) की किताब ‘अय्यून अखबारुलरज़ा’ में इसके मुताल्लिक इमाम अली रज़ा (अ.स.) का कौल मौजूद है जो इस तरफ हमारी रहनुमाई करता है। इमाम अली रज़ा (अ-स-) खलीफा मामून रशीद के दौर की सबसे अहम शख्सियत थे, और पैगम्बर मोहम्मद (स.अ.) के सातवीं पीढ़ी के वंशज थे। उनके कौल के मुताबिक, ‘अल्लाह की पहली खिलक़त़ व इरादा और मशीयत हुरूफ अबजद (वर्णमाला या alphabet) हैं। जिन्हें अल्लाह ने हर चीज़ की बुनियाद और हर चीज़ की दलील और फैसला करने वाला बनाया। और इन्ही हुरूफ (अक्षरों) से हक़ व बातिल के तमाम नामों में जुदाई कायम की और इन्ही हुरूफ को फेअल व मफ़ऊल (एक्शन व रिएक्शन ), मतलब व गैर मतलब का जरिया बनाया और तमाम कामों का दारोमदार इन्ही हुरूफ पर रखा और अलग अलग हुरूफ की तखलीक से सिर्फ उन्ही हुरूफ के मतलब पेशे नज़र रखे गये। 
और अल्लाह जो कि आसमानों और जमीन का नूर है, उस ने अपने नूर से ही अजीम (महान) हुरूफों की तखलीक़ की और ये उस का सबसे पहला काम है। यानि हुरूफ ज़ाते हक़ के फेले अव्वल के मफऊल अव्वल हैं। और यह हुरूफ ही हैं जिन पर कलाम और इबादाते इलाही का दारोमदार है। अल्लाह तआला ने तैंतीस (33) हुरूफ खल्क किये जिन में अरबी जबान में अट्‌ठाइस हुरूफ इस्तेमान होते हैं। और इन्ही अट्‌ठाइस हुरूफ में से बाइस (22) हुरूफ सूरयानी (Suryani) व इबरानी (हिब्रू) में मौजूद हैं। और पाँच दूसरे हुरूफ अज्मी (अरब से बाहर की ज़बानें जैसे अफ्रीका वगैरा की) और दूसरी ज़बानों में बोले जाते हैं। और यूं इन की कुल तादाद तैंतीस (33) है। 

इस तरह यह साफ होता है अल्लाह ने तैंतीस (33) अक्षरों की खिलकत की है। और यह खिलकत मैटर की खिलकत से भी पहले की खिलकत है। यानि इंसान की पैदाइश बाद में हुई, लेकिन उसकी ज़बान की पैदाइश उससे पहले ही हो गयी थी। अब इमाम अली रज़ा (अ-स-) के कौल के मुताबिक किसी भी भाषा में अलग अलग आवाजों के तैंतीस हुरूफ यानि अक्षर हो सकते हैं। 

यानि अगर किसी ज़बान में तैंतीस अक्षर अलग अलग आवाजों के लिये जायें तो उनसे पूरी ज़बान यानि भाषा मुकम्मल तरीके से बोली जा सकती है। किसी भी ज़बान में अगर इससे ज्यादा अक्षर हैं तो उनकी आवाजें एक दूसरे से मिलने लगती हैं। जो कि हमारे लिये अनुपयोगी होता है। भाषा विज्ञानी को अगर इसपर अच्छी तरह रिसर्च करें तो आवाज़ पर चलने वाले कम्प्यूटर जैसे यन्त्र विकसित किये जा सकते हैं। जो बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं। और शायद आगे चलकर ऐसे कम्प्यूटर विकसित हो जायें जो केवल हमारी आवाज पर काम करने लगें।

फिलहाल आज भी साइंस इस्लामी साइंस से पीछे ही चल रही है। 

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Thursday, March 1, 2018

कहाँ बनते हैं ला ऑफ़ नेचर यानी कुदरत के कानून?


कुदरत के कानूनों के बारे में हम बहुत कुछ जानते हैं। ज़मीन सूरज के गिर्द चक्कर लगा रही है, चाँद जमीन के गिर्द चक्कर लगा रहा है, यह कुदरत का कानून है। बकरी घास खाती है जबकि शेर गोश्त खाता है, यह भी कुदरत का कानून है। कुदरत के कानून पूरे यूनिवर्स में मौजूद हैं। इसी के नतीजे में बादल बनते हैं और उनसे पानी बरसता है। इसी के नतीजे में मुर्गी के अण्डों में से मुर्गी के ही बच्चे निकलते हैं और साँप के अण्डों में से संपोलिये निकलते हैं। डर और गुस्से में इंसान काँपने लगता है जबकि बहुत ज्यादा थक जाने पर उसमें आराम की ख्वाहिश जाग उठती है। यह भी कुदरत के ही कानून हैं। 
खास बात ये है कि कोई भी कुदरत का कानून अपनी मर्जी का मालिक नहीं है। बल्कि हर कुदरत के कानून के पीछे मैथेमैटिक्स की बड़ी बड़ी समीकरणें छुपी हुई हैं। अगर हम ग्रैविटी की बात करें तो उसके पीछे मैथ का एक नियम ‘इनवर्स स्क्वायर ला’ मौजूद है। इसी तरह इंसान का बच्चा इंसान और जिराफ का बच्चा जिराफ हो इसके पीछे भी एक निहायत मुश्किल गणित डी-एन-ए- कोडिंग की शक्ल में मौजूद होती है। यानि कुदरत के कानूनों के पीछे एक पूरी मैथेमैटिक्स कुछ इस तरह मौजूद है जिसके बारे में जानने में साइंसदाँ अगर पूरी जिंदगी गुजार दें तब भी उसकी गहराई तक नहीं पहुंच सकते। 

अब सवाल पैदा होता है यूनिवर्स में वह कौन सी जगह है जहाँ ये निहायत मुश्किल व अहम कानून बनते हैं। वह कौन सी जगह है जहां वजूद में आने से पहले या वजूद में आने के बाद किसी चीज का पूरा ज्ञान मौजूद है?
उस जगह का नाम है अर्श । यहीं पर बनते हैं कुदरत के कानून और यहीं पर हर मखलूक की किस्मत का फैसला होता है। आईए समझते हैं अर्श को कुरआन और हदीस के जरिये।         

कुरआन में कई जगह पर अर्श और कुर्सी का जिक्र है। जैसे कि

सूरे बक़रा आयत 255 : अल्लाह ही वह ज़ाते पाक है कि उसके सिवा कोई माबूद नहीं। (वह) जिन्दा है और सारे जहान का संभालने वाला है। उसको न ऊंघ आती है न नींद। जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में है उसी का है। कौन ऐसा है जो बगैर उसकी इजाज़त के उसके पास किसी की सिफारिश करे जो कुछ उनके सामने मौजूद है और जो कुछ उनके पीछे है जानता है और लोग उसके इल्म में से किसी चीज़ पर भी अहाता नहीं कर सकते मगर वह जिसे जितना चाहे। उसकी कुर्सी सब आसमानों व ज़मीनों को घेरे हुए है और उन दोनों की निगेहदाश्त उसपर कुछ भी मुश्किल नहीं और वह आलीशान बुजुर्ग व मरतबा है। 

सूरे हदीद आयत 4 : और वही तो है जिसने सारे आसमान व ज़मीन को छह दिन में पैदा किया फिर अर्श पर आमादा हुआ जो चीज़ ज़मीन में दाखिल होती है और जो उससे निकलती है और जो चीज़ आसमान से नाजिल होती है और जो उसकी तरफ चढ़ती है उसको मालूम है और तुम जहाँ कहीं रहो वह तुम्हारे साथ है और जो कुछ भी तुम करते हो अल्लाह उसे देख रहा है।
सूरे ताहा आयत 5 : वही रहमान है जो अर्श पर आमादा और मुस्तईद है

इन आयतों से कुछ ऐसा मालूम होता है कि अर्श कोई ऐसी जगह है जहाँ अल्लाह मौजूद है। और कुर्सी से उसे कुछ ऐसा लगता है जैसे यह अल्लाह के बैठने की गद्दी है जहाँ वह किसी दुनियावी बादशाह की तरह विराजमान है। लेकिन यह बात पूरी तरह गलत है। क्योंकि उसी ने (अल्लाह ने) जगह और मकान (स्पेस और डाइमेंशन) बनाये हैं। वह तो उस वक्त भी मौजूद था जब कि कोई जगह मौजूद न थी। इसलिये वह अर्श पर मौजूद है और कुर्सी पर बैठा है यह सोचना हरगिज जायज़ नहीं। 

तो फिर अर्श और कुर्सी की असलियत क्या है? इसको समझने के लिये गौर करते हैं इमाम जाफर सादिक (अ-स-) के कौल पर जो शेख सुद्दूक (र.) की किताब ‘अल तौहीद’ में मौजूद है। 

इमाम जाफर सादिक (अ-स-) ने फरमाया अर्श और कुर्सी दोनों गैब में हैं (यानि आँखों को दिखाई नहीं देते)। अर्श मुल्क पर हावी है और यह मुल्क अशिया में वाके (happen) होने वाले हालात व अहवालों का मुल्क है। फिर यह कि अर्श मुत्तसिल होने में कुर्सी से बिल्कुल बेनजीर व यगाना है। क्योंकि वह दोनों गय्यूब के दरबाये कबीरा से हैं और वह दोनों भी गैब हैं। गैब में दोनों साथ साथ हैं क्योंकि कुर्सी उस गैब का जाहिरी दरवाजा है जो मतला ईजाद व इब्तिदा है और जिससे तमाम अशिया मौजूद हुईं। और अर्श वह दरे बातिन है जिसमें हालत व कैफियत, वजूद, कद्र, हद और ऐन व मशीयत और सिफते इरादत का इल्म है और अलफाज़ व हरकात और तर्क का इल्म है और इख्तिताम और इब्तिदा का इल्म है पस ये दोनों इल्म के करीबी दरवाजे हैं क्योंकि मुल्के अर्श मुल्के कुर्सी से सिवा है और इस का इल्म कुर्सी के इल्म से ज्यादा गैब में (छुपा हुआ) है तो इसी वजह से कुरआन में कहा गया है रब्बिल अर्शिल अज़ीम (अल्लाह महान अर्श का रब है।) यानि इस की सिफत कुर्सी की सिफत से ज्यादा अज़ीम है। और वह दोनों इस वजह से एक साथ हैं। अर्श कुर्सी का हमसाया इस तरह हो गया कि उस में कैफियत व अहवाल का इल्म है। और उस में अबवाब बिदा व मुकामात व मवाज़ा जाहिर हैं। और उन की इस्लाह व दुरुस्ती की हद है। ये दोनों पड़ोसी हैं। इन दोनों में से एक ने अपने साथी को बतौर सिर्फ कलाम उठा रखा है।
आसान अलफाज़ में कहा जाये तो अर्श वह जगह है जहाँ चीजों की हालत, उनकी शुरुआत व खात्मा, उनका मशीनरी सिस्टम, यूनिवर्स की बनावट जैसी हर चीज़ का ज्ञान मौजूद है। यहीं पर शब्द पैदा होते हैं और यहीं मख्लूकात की किस्मत में तब्दीली होती है। यह चीज़ों की खिलकत का शुरूआती मरकज़ है और पूरे यूनिवर्स का कण्ट्रोल रूम है. 

दूसरी तरफ कुर्सी एक तरह का दरवाज़ा है जहाँ से यह ज्ञान निकलकर अपने वक्त पर सामने आता है। दुनिया में जो कुछ भी होता है चीजें और जानदार जिस तरह भी बिहेव करते हैं उसका इल्म इसी कुर्सी के जरिये अर्श से निकलकर जाहिर होता है। यहीं पर तमाम कुदरत के कानूनों का भी इल्म मौजूद है और यहीं पर ये कानून खल्क भी होते रहते हैं जो इस तमाम कायनात को चला रहे होते हैं। 
इन कानूनों का खालिक अल्लाह है। लेकिन ये सोचना गलत है कि अल्लाह अर्श नाम की जगह पर बैठकर इन कानूनों की खिलकत करता रहता है। हकीकत ये है कि वह तमाम जगहों और वक्त का खालिक है। 
  
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Saturday, February 17, 2018

किसने बताया ज़मीन गोल है और अपने अक्ष पर घूम रही है?


ज़मीन की शक्ल कैसी है और दिन रात कैसे बनते हैं इस बारे में साइंस हमेशा असमंजस में रही। और इसके बारे में लोगों ने तरह तरह की थ्योरीज़ ईजाद कर लीं जो वक्त के साथ साथ बदलती रहीं।

ज़मीन को कुछ लोगों ने चौकोर बताया तो कुछ ने गोल। हालांकि जिन लोगों ने गोल बताया वह भी अपनी थ्योरी में कन्फर्म नहीं थे और अटकलों से ही यह बात कह रहे थे। ईसाईयों ने ज़मीन को एक ऐसे गोल घेरे की तरह माना जिस का केन्द्र ईसा मसीह का जन्मस्थल यानि येरुशलम था। पुराने ज़माने के जो नक्शे मिलते हैं, उसमें कहीं पर ज़मीन को चौकोर दिखाया गया है तो कहीं गोल घेरे की तरह। और कुछ ऐसे नक्शे भी मिले हैं जिसमें ज़मीन पूरी तरह गेंद की तरह गोल भी दिखाई गयी है।
यूरोपियन इतिहास के अनुसार पहली बार जिसने इस बात को पूरी तरह कनफर्म किया वह था पुर्तगाली नाविक माजीलान। जो सोलहवीं शताब्दी में जन्मा था। वह अधिकतर समुन्द्री यात्राओं पर रहता था और दूर तक फैले समुन्द्र का कर्व रूप देखकर उसने यह निष्कर्ष निकाला था।

अब सवाल उठता है कि माजीलान से पहले इस्लामी विद्वानों का इस बारे में क्या विचार था? वह ज़मीन को गोल मानते थे या चपटी? 

कुछ लोग कुरआन हकीम की 71 वीं सूरे नूह की उन्नीसवी और बीसवीं आयत ‘और अल्लाह ने ही तुम्हारे लिये ज़मीन को फर्श बनाया ताकि तुम उसके बड़े बड़े कुशादा रास्तों में चला फिरा करो।’ को आधार बनाकर कहा करते हैं कि कुरआन में ज़मीन को चपटा बताया गया है। जबकि इस आयत से ऐसा कुछ नहीं साबित होता। हकीकत ये है कि इस्लाम ने हमेशा ज़मीन को गोल माना।   

शेख सुद्दूक (र.) की किताब अल तौहीद का हम इससे पहले भी जिक्र कर चुके हैं। इस किताब में इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम ने रसूल अल्लाह मोहम्मद (स.) की एक हदीस कुछ इस तरह से बयान की है कि एक बार एक अत्तारह (इत्र बेचने वाली) रसूल अल्लाह (स.) के घर में इत्र बेचने के लिये आयी जब उसकी रसूल अल्लाह (स.) से मुलाकात हुई तो उसने अल्लाह की अज़मत के बारे में दरियाफ्त किया। जवाब में रसूल अल्लाह (स.) ने फरमाया कि अल्लाह का जलाल बड़ी शान वाला है। मैं उस के जलाल के मुताल्लिक तुमसे थोड़ा सा बयान करूंगा। 

उसके बाद रसूल अल्लाह (स.) ने फरमाया, कि 'ये ज़मीन, इसमें जो कुछ है और जो कुछ इस के ऊपर है, जिस के नीचे चटियल मैदान हैं, दायरे की तरह है और ये दोनों और जो भी इन दोनों में और दोनों के ऊपर है उस के नज़दीक है कि जिस के नीचे बे आब व ग्याह मैदान में हल्क़े की तरह है और तीसरी यहाँ तक कि सातवीं तक मुन्तही होती है।...........'

अगर इस हदीस पर गौर किया जाये तो ज़मीन को एक हल्के (गोले को ही उर्दू में हल्क़ा कहते हैं।) की तरह बताया जा रहा है जो एक ऐसे चटियल मैदान में मौजूद है जहाँ कुछ नहीं यानि कि स्पेस या निर्वात है। और अगर हदीस बयान करने वालों की गलतियों को नज़रअंदाज़ कर दिया जाये तो मुमकिन है यहां रसूल अल्लाह (स.) का मतलब ज़मीन का दायरे की शक्ल में घूमने से भी था। लेकिन चूंकि हदीस लिखने वाले को ये बात मालूम नहीं था इसलिये उसने अपनी तरफ से अलफाज़ में कमी बेशी कर दी।    

अब बात करते हैं ज़मीन की अपने अक्ष पर घूमने की। जिसकी वजह से दिन और रात बनते हैं। वास्तव में उन्नीसवीं सदी तक दुनिया इससे अनजान थी कि ज़मीन अपने अक्ष पर किसी लट्‌टू की तरह घूमती है। यहाँ तक कि सत्रहवीं शताब्दी में जब न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण की खोज की तब भी यह मालूम नहीं हो पाया था कि दिन रात कैसे बनते हैं।    

ज़मीन का अपने अक्ष पर घूमना कनफर्म हुआ पहली बार फोको पेंडुलम की ईजाद के बाद। इसे बनाया था लियोन फोको ने सन 1851 में। इस पेंडुलम की मदद से उसने पेरिस में कुछ तजुर्बात किये और उससे सिद्ध किया कि ज़मीन अपने अक्ष के चारों तरफ घूम रही है। उसके बाद बीसवीं शताब्दी में जब अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी के बाहर गये तो वहाँ से उन्होंने ज़मीन के घूमने का नज़ारा किया।

कुरआन हकीम की 27 वीं सूरे है अलनम्ल जिसकी आयत नं- 88 इस तरह है, ‘‘तुम पहाड़ों को देखते हो और समझते हो कि ये जामिद (ठहरे हुए हैं।) हैं। लेकिन ये बादलों की तरह चल रहे हैं। ये अल्लाह की कुदरत का करिश्मा है जिस ने हर चीज़ को हिकमत से अस्तवार किया है वह खूब जानता है जो तुम किया करते हो।’

आज से चौदह सौ साल पहले नाज़िल हुआ कुरआन साफ साफ बयान कर रहा है कि पहाड़ बादलों की तरह चल रहे हैं और ये तभी मुमकिन है जब पूरी ज़मीन ही बादलों की तरह चल रही हो। अगर इसमें रसूल (स.) की हदीस शामिल की जाये तो ये गोल ज़मीन की गर्दिश साबित होती है। और इस सच्चाई पर मोहर लगायी रसूल (स.) की पाँचवीं पीढ़ी से इमाम जाफर सादिक (अ.) ने...........      

स्ट्रेसबर्ग यूनिवर्सिटी के इस्लामिक रिसर्च सेंटर में 1940-50 के बीच एक रिसर्च हुई। इस रिसर्च में 25 विद्वानों, साइंसदानों वगैरा ने हिस्सा लिया था। यह रिसर्च हुई थी इमाम जाफर सादिक (अ.) के बारे में, और रिसर्च करने वालों में ज्यादातर तादाद गैर मुस्लिम्स की थी। इस थीसिस का ईरान में ‘मग्ज़े मुत्फक्किरे जहाने शिया-जाफर अल सादिक़ (यानि इस्लाम के शिया फिरके का दिमाग - जाफर अल सादिक अलैहिस्सलाम) नाम से फारसी में तर्जुमा हुआ। अब इसका उर्दू और हिन्दी में तर्जुमा मौजूद है। इस किताब का एक अंश इस तरह है, 

‘इमाम जाफर सादिक (अ.) ने आज से बारह सौ साल पहले ये मालूम कर लिया था कि ज़मीन अपने गिर्द घूमती है और एक के बाद एक दिन व रात का सबब ज़मीन के गिर्द सूरज की गर्दिश नहीं बल्कि अपने गिर्द ज़मीन की गर्दिश है जिस से रात और दिन वजूद में आते हैं और हमेशा ज़मीन का आधा हिस्सा तारीक और रात की हालत में और दूसरा आधा हिस्सा रोशन और दिन के आलम में रहता है। उस ज़माने में जो लोग ज़मीन के गोल होने की हकीकत से वाकिफ थे, ये जानते थे कि हमेशा ज़मीन के आदेह हिस्से में रात व आधे में दिन रहता है लेकिन वह इसका सबब सूरज की ज़मीन के चारों तरफ की गर्दिश को मानते थे।’’

इमाम जाफर सादिक (अ.) के बाद दसवीं शताब्दी में अबू रेहान अल बिरूनी नामक मुस्लिम वैज्ञानिक हुआ जिसने ज़मीन की त्रिज्या त्रिकोणमिति के ज़रिये ज्ञात की उसमें ज़मीन के अपने अक्ष पर घूमने के तथ्य का इस्तेमाल हुआ था। उसकी कैलकुलेशन से ज़मीन की त्रिज्या निकल कर आयी थी 6339.9 किलोमीटर जो मौजूदा वैल्यू 6356.7 किलोमीटर से सिर्फ 16.8 के अन्तर पर थी।

तो इस तरह रसूल अल्लाह (स.), इस्लामी विद्वानों और इमामों को बखूबी मालूम था कि ज़मीन न सिर्फ गोल है बल्कि अपने अक्ष पर गर्दिश भी कर रही है।

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Thursday, February 15, 2018

क्या काबा ज़मीन का केन्द्र (Centre) है?

यह एक हकीकत है की हम जिस ज़मीन पर सांस ले रहे हैं वह गोल है और उसकी बाहरी परत पर हम और तमाम जानदार व बेजान चीज़ें ज़मीन की ग्रैविटी की वजह से तिकी हुई हैं. यह भी तय है कि किसी गोले की बाहरी सतह पर कोई भी पॉइन्ट केन्द्र नहीं होता या दूसरे शब्दों में आप किसी भी पॉइन्ट को केन्द्र मान सकते हैं.
लेकिन अगर हम कुछ पुरानी इस्लामी हदीसों की स्टडी करें तो कुछ इस तरह की बातें मिलती हैं :
शेख सुद्दूक (अ.र.) की किताब एलालुश्शाराए में दर्ज हदीस के मुताबिक हज़रत इमाम हसन बिन अली बिन अबी तालिब अलैहिस्सलाम से रवायत है कि एक मर्तबा चन्द यहूदी रसूल अल्लाह (स.) की खिदमत में आये और आपने मुख्तलिफ बातें पूछीं। उनमें से एक बात ये थी कि काबे का नाम काबा क्यों रखा गया? आनहज़रत (स.) ने फरमाया इसलिए कि ये दुनिया का विसत या मरकज़ (केन्द्र) है।
इसी किताब में दर्ज एक और हदीस के मुताबिक इमाम मोहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि अल्लाह तआला ने मख्लूकात से पहले काबे को खल्क किया। इसके बाद ज़मीन को खल्क किया और काबे के नीचे से ज़मीन बिछायी।
उसूले काफी के बाब 124 हदीस 17 में इमाम मोहम्मद बाकिर अलैहिस्सलाम से रवायत है कि रसूल अल्लाह (स.) ने फरमाया मैं और बारह इमाम मेरी औलाद से और तुम ऐ अली ये सब इस ज़मीन के लिये मेखें और पहाड़ हैं ताकि ज़मीन अपने साकिनों के साथ हिले डुले नहीं। जब बारहवां मेरी औलाद से ख़त्म हो जायेगा तो ज़मीन मय अपने साकिनों के बैठ जायेगी और फिर उनको मोहलत न मिलेगी। 
तो क्या इस्लाम की इन हदीसों को ग़लत मान लिया जाये?
इसके लिये एक अहम् साइंसी खोज पर चर्चा करना मुनासिब होगा।   
अलफ्रेड वेगनर एक जर्मन साइंसदां था जिसने 1915 में पहली बार दुनिया के सामने एक थ्योरी पेश की कि सभी महाद्वीप (Continents) वक्त के साथ अपनी जगह से खिसक रहे हैं। और करोड़ों साल पहले ये सब महाद्वीप एक दूसरे से मिले हुए एक ही जगह पर मौजूद थे। और यह सुपरमहाद्वीप चारों तरफ से महासमुन्द्र में घिरा हुआ था। यह नतीजा वेगनर ने महाद्वीपों के नक्शों की स्टडी करके निकाला था। उसने कहा कि अलग अलग महाद्वीप के किनारे आपस में जोड़ने पर इस तरह फिट हो जाते हैं जैसे किसी ने खींच कर उन्हें अलग कर दिया हो। इसलिए यह मुमकिन है कि करोड़ों साल पहले वे एक दूसरे से मिले हुए हों और बाद में खिसक कर अलग हो गये हों। उसकी यह थ्योरी दुनिया के लिये नयी थी और ज्यादातर साइंसदानों ने उसकी इस बात को कुबूल नहीं किया लेकिन जब 1950 में नयी तकनीकों के ज़रिये डाटा एनेलिसिस की गयी तो उसकी बात सच साबित हुई। इस मिले हुए सुपरमहाद्वीप को नाम दिया गया पैंगिया Pangaea । बाद में ये भी अंदाज़ा लगाया गया कि पैंगिया भी कुछ पहले के महाद्वीपों के आपस में मिलने से बना था। इनके नाम गोंडवाना व यूरेमेरिका दिये गये। इस तरह पुराने महाद्वीपों से नये का बनना व बिगड़ना साइक्लिक प्रोसेस है। 

लेकिन जो सबसे खास बात महाद्वीपों के खिसकने में मिलती है वह ये कि ज़मीन की उम्र का अंदाज़ा लगभग 4-5 बिलियन वर्ष लगाया गया है। ज़मीन की ऊपरी पपड़ी जिसपर जानदार रहते हैं और जिसके ऊपर समुन्द्र तथा खुश्क जगहें मौजूद हैं ये पूरी पपड़ी प्लेट्‌स की शक्ल में है। अलग अलग प्लेट्‌स लगातार खिसक रही हैं। इनके खिसकने की वजह से ही महाद्वीप खिसक रहे हैं। और जब ये महाद्वीप एक में मिले हुए थे उस वक्त उस पूरी खुश्क ज़मीन का मरकज़ वही जगह थी जहां आज  मक्का में मौजूद काबा शरीफ है।  

ऐसे में उपरोक्त हदीसें नज़र में फिर जाती हैं जो इस हकीकत को बयान करती हैं जिनकी तरफ बीसवीं सदी से पहले की सांइस अँधेरे में थी। 
उपरोक्त हदीसें ऐसे हैरतअंगेज़ इन्किशाफ कर रही हैं जिनकी हकीकत मौजूदा साइंस से ही समझ में आती है। काबा हर तरह से दुनिया का केन्द्र है। करोड़ों साल पहले के सुपर महाद्वीप पैंगिया के नक्शे में खास बात जो नज़र आती है वह ये कि मक्का यानि कि काबा उसके केन्द्र में नज़र आता है। साथ ही साइंसदानों ने अंदाज़ा लगाया है कि लगभग दो सौ बिलियन सालों के बाद सारे महाद्वीप एक बार फिर मिलकर एक हो जायेंगे। उसका उन्होंने एक अनुमानित नक्शा भी तैयार किया है। और हैरत की बात ये है कि उस नक्शें में एक बार फिर काबा केन्द्र में नज़र आ रहा है। इस तरह ये बात लगभग साबित हो जाती है कि ज़मीन जितनी बार भी एक हुई या अलग हुई हमेशा उसका मरकज़ काबा ही रहा। यही बात बगदाद यूनिवर्सिटी के जियोलोजिस्ट डा0सालेह मुहम्मद की रिसर्च में निकलकर सामने आती है। डा0सालेह के अनुसार ज़मीन की प्लेट्‌स जिनके ऊपर समुन्द्र और महाद्वीप मौजूद हैं, लगातार निहायत धीमी रफ्तार से अपनी जगह बदल रही हैं। साथ ही उनकी शक्ल भी बदल रही है। उनमें से कुछ आपस में जुड़कर तो कुछ टूटकर नयी प्लेट्‌स बनाती रहती हैं। कभी कभी इनकी रफ्तार अनियमित भी हो जाती है नतीजे में ज़लज़ले और सूनामी पैदा होते हैं। अब ये साइंसी फैक्ट है कि सभी बनती बिगड़ती प्लेटें एक मरकज़ यानि अरबियन प्लेट के चारों तरफ सुस्त रफ्तारी से घूम रही हैं यानि कि तवाफ कर रही हैं। और इस अरबियन प्लेट का मरकज़ है काबा। 

दुनिया में जितनी पुरानी सभ्यताएं पैदा हुई जिनमें मेसोपोटामिया, सिन्धु घाटी, रोमन व अफ्रीकन सभ्यताएं शामिल हैं उनको शामिल करते हुए अगर एक दायरा खींचा जाये तो उसका मरकज़ मक्का मुकर्रमा और काबा आता है। इस केन्द्र से 8000 किलोमीटर के दायरे में सभी पुरानी सभ्यताएं विकसित हुईं।

अगर काबे को केन्द्र मानते हुए 13000 किलोमीटर का दायरा खींचा जाये तो इसमें अमेरिका, आस्ट्रेलिया व सभी महाद्वीपों के शहर शामिल हो जाते हैं। 
एक सवाल जो साइंसदानों के लिये पहेली बना हुआ है कि इन महाद्वीपों के बनने की शुरूआत कहा से हुई? कुछ लोग कह सकते हैं कि हो सकता है ये महा ज़मीनें हमेशा से मौजूद रही हों। लेकिन ऐसा नहीं है। साइंसदानों ने जो रिसर्च की है उसके अनुसार बहुत पहले ज़मीन एक आग का गोला थी जो सूरज के चारों तरफ चक्कर लगा रहा था। तो फिर ये आज की धरती की शक्ल में जिसका 71 प्रतिशत हिस्सा समुन्द्र है किस तरह बदल गयी? ज़मीन पर इतना पानी कहां से आया यह साइंसदानों के लिये एक अनसुलझी पहेली है। कुछ साइंसदानों के अनुसार ज़मीन पर से पानी हमेशा से भाप की शक्ल में मौजूद था। जबकि कुछ के अनुसार बर्फीले पुच्छल तारे (Comet) के टकराने से यह पानी धरती पर आया। इस पानी ने पूरी पृथ्वी को ठंडा किया और साथ ही तेज़ बारिश के ज़रिये समुन्द्र की शक्ल में हर तरफ फैल गया। उस वक्त खुश्की का कोई वजूद नहीं था और कोई महाद्वीप नहीं बना था। फिर एक प्रोसेस मैण्टिल कन्वेक्शन के ज़रिये समुन्द्र के बीच में ऊंची कोर्स (Cores) का निर्माण हुआ जिनके चारों तरफ धीरे धीरे चट्‌टानों के जमने से महाद्वीप बने। पहली कोर ज़मीन के किस हिस्से में बनी इस बारे में फिलहाल साइंस खामोश है। लेकिन जिस तरह ज़मीन की प्लेट्‌स अरबियन प्लेटस के चारों तरफ मौजूद हैं और दूसरे साइंसी डाटा मिल रहे हैं उससे यही अंदाज़ा लगता है कि पहली कोर वहीं पर बनी जहां काबा मौजूद है। लिहाज़ा साइंसी डाटा इस हदीस के फेवर में हैं कि ‘इसके बाद ज़मीन को खल्क किया और इसी के नीचे से ज़मीन बिछायी।’

जिस तरह ज़मीन की अलग अलग प्लेटस एक दूसरे से जुड़ी हुई मौजूद हें और उनके नीचे ज़मीन का मैटीरियल पिघली और गर्म हालत में है, उससे उन प्लेटस का टिका रहना यकीनन हैरतअंगेज़ है और रसूल (स.) की हदीस के पूरी तरह म्वाफिक है कि ‘मैं और बारह इमाम मेरी औलाद से और तुम ऐ अली ये सब इस ज़मीन के लिये मेखें और पहाड़ हैं ताकि ज़मीन अपने साकिनों के साथ हिले डुले नहीं। जब बारहवां मेरी औलाद से ख़त्म हो जायेगा तो ज़मीन मय अपने साकिनों के बैठ जायेगी और फिर उनको मोहलत न मिलेगी।’ इससे एक बात और जाहिर होती है कि एक वक्त आयेगा जब ज़मीन की प्लेटस अपनी जगह पर टिकी न रहकर धंस जायेगी और महाद्वीपों का वजूद मिट जायेगा।             

और आखिर में एक खास बात और काबे के सिलसिले में। ज़मीन के चुंबकीय क्षेत्र का दक्षिणी सिरा मौजूदा वक्त में में कनाडा की दिशा में है। इस तरह चुम्बकीय क्षेत्र की equatorial line मक्का यानि कि काबे से होकर गुज़रती है। इस लाइन पर सभी जगह चुम्बकीय क्षेत्र का Vertical Component शून्य होता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि काबा चुम्बकीय क्षेत्र के बीचों बीच (विसत में) मौजूद है। यकीनन काबे ने ज़मीन की खिलकत के सिलसिले में इतना अहम किरदार निभाया है कि उसका तवाफ करना बहुत बड़ी इबादत है।
नोट : इस तरह की और जानकारियों के लिये पढ़ें मेरी किताब - आधुनिक वैज्ञानिक खोजें जो दरअस्ल इस्लाम की हैं. यह ई बुक निम्न लिंक पर उपलब्ध है :
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Monday, February 12, 2018

क्या ज़मीन बिछौने की तरह है?

कुछ एतराज़ करने वाले जब क़ुरआन की सूरे बक़रा की आयत 22 ‘‘जिस ने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना बनाया’’ पढ़ते हैं तो उससे यह मतलब निकालते हैं कि कुरआन में ज़मीन को चपटा कहा जा रहा है। क्योंकि बिछौना या फर्श भी चपटा होता है। हालांकि थोड़ी सी अक्ल लगाने पर उनकी यह बात गलत साबित हो जाती हैं। क्योंकि बिछौने की सही डिफनीशन चपटा होना नहीं है बल्कि इंसान को आराम पहुंचाने वाला बिस्तर है। चपटा तो वह इसलिए होता है क्योंकि उसके नीचे का बेड चपटा होता है। हमारे इमामों ने चौदह सौ साल पहले इस आयत की जो तफसीर बतायी है उसमें भी यही मतलब लिया गया है कि ज़मीन अल्लाह ने कुछ इस तरह खल्क़ की है जो यहां बसने वाली मख्लूक़ात के लिए आरामदेय हो। 

शेख सुद्दूक (अ.र.) की किताब अल-तौहीद में इमाम अली इब्ने हुसैन यानि इमाम ज़ैनुलआबिदीन अलैहिस्सलाम ने इरशादे इलाही के बारे में फरमाया ‘‘जिस ने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना बनाया (सूरे बक़रा आयत 22)’’ कि अल्लाह ने जानदारों के तब्कों के मुताबिक मुनासिब तुम्हारे अजसाम के म्वाफिक बनाया। उसको शदीद गर्मी और हरारत वाला नहीं बनाया कि जो तुम को जला दे और न इन्तिहाई ठण्डक वाला बनाया कि तुमको जमा दे। और न इतनी ज़बरदस्त खुश्बू रखी जो तुम्हारी खोपड़ियों में दर्द पैदा कर दे। और न उसको शदीद फित्नों वाली बनाया कि वह तुमको हलाक़ कर दे और न इतना ज्यादा नर्म बनाया जैसे कि पानी कि वह तुमको गर्क कर दे। और न इतना सख्त बनाया कि तुम्हारे हरकत करने मकानों व इमारतों को बनाने में रुकावट हो और तुम्हारे मुर्दों की कब्र बनाने में रुकावट हो। बल्कि अल्लाह अज्ज़ोजल ने उसमें ऐसी मज़बूती व पायदारी रखी है कि जिससे तुम फायदा हासिल करते हो। और मज़बूती के साथ चिमटे रहते हो। और इसी पर तुम्हारे बदन और तुम्हारी इमारात कायम रहती हैं। इसी वजह से ज़मीन को तुम्हारे लिये फर्श (बिछौना) करार दिया है।’’

और जदीद साइंस पूरी तरह इमाम के क़ौल को साबित करती है। 

इंसान का वजूद जिन बातों पर निर्भर करता है और साथ साथ दूसरी मख्लूकात का वजूद, उन बातों की एक लम्बी चौड़ी लिस्ट है। इंसान के वजूद के लिए कार्बन, हाईड्रोजन और आक्सीज़न ज़रूरी है और बहुत कम मात्रा में लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस वगैरा चाहिए। साथ ही कुछ का मौजूद न होना भी जरूरी है। जैसे हमें मीथेन, सल्फर डाई आक्साइड या अमोनिया का वायुमण्डल नहीं चाहिए, जैसा कि सौरमंडल के दूसरे ग्रहों पर है। साथ ही ग्रह का तापमान एक निश्चित सीमा में बना रहना चाहिए वरना हमारे शरीर की जैव रासायनिक प्रक्रियाएं (Bio-Chemical Processes) नहीं चल पायेंगी।

टेम्प्रेचर मेन्टेन रखने के लिए ग्रह को एक समान एनर्जी देने वाला तारा चाहिए। ऐसा तारा जिसका जीवनकाल काफी लम्बा हो और वह बिना उतार चढ़ाव के ग्रह को नियमित रूप से ऊर्जा दे। इसके लिए ग्रह की कक्षा भी दीर्घवृत्त न होकर वृत्ताकार होनी चाहिए। ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण इतना होना चाहिए कि वह वायुमंडल को बाँध कर रख सके। लेकिन यह गुरुत्वाकर्षण इतना ज्यादा भी नहीं होना चाहिए कि चलने फिरने में हड्‌िडयां टूटने की नौबत आ जाये।

हमारी ज़मीन और सूरज इन सब शर्तों को बखूबी पूरा करते हैं इसलिए यहां हमारा और दूसरे जानदारों का वजूद है। क्या ऐसा नहीं लगता कि किसी ने अपनी कुदरत से ज़मीन को हम सब लोगों के निवास के काबिल बनाया? ऐसी ज़मीन जहां बहुत सी आसानियाँ हमें हासिल हैं। मिसाल के तौर पर बाहरी वायुमंडल में मौजूद ओजोन की परत सूरज से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी किरणों से हमारी हिफाज़त करती है। ज़मीन पर ताकतवर चुम्बकीय क्षेत्र इस पर मौजूद जानदारों को कास्मिक किरणों और सबएटामिक पार्टिकिल्स की बमबारी से बचाता है।

इसी तरंह आम नियम है कि ताप घटने के साथ साथ द्रव का घनत्व बढ़ता है और जब वह ठोस में बदलने लगता है तो उसका घनत्व द्रव रूप की अपेक्षा कम हो जाता है और भारी होकर वह द्रव की सतह में बैठ जाता है। लेकिन पानी इसका अपवाद है। ताप घटने पर इसका घनत्व पहले चार डिग्री सेण्टीग्रेड तक बढ़ता है लेकिन ताप और कम होने पर इसका घनत्व फिर घटने लगता है। यही कारण है कि बर्फ पानी से हल्की होती है। पानी के इस गुण के कारण ठण्डे स्थानों में जब पूरा तालाब बर्फ में परिवर्तित हो जाता है तो नीचे की सतह पहले की तरंह द्रव रूप में रहती है और उसमें उपस्थित मछलियां अपना जीवन यापन करती रहती हैं।

ज़मीन सूरज से एक संतुलित दूरी पर मौजूद है। अगर यह सूरज के पास होती तो ज्वारीय बलों (Tidal Forces) के कारण इसकी घूर्णन गति समाप्त हो जाती। नतीजा यह होता कि ग्रह के एक तरफ हमेशा दिन होता जबकि दूसरी तरफ रात। फलस्वरूप दोनों तरफ टेम्प्रेचर चरम सीमा पर पहुंच जाता। और आखिर में एक तरफ पानी और वायुमण्डल समाप्त हो जाते जबकि दूसरी ताफ जमकर बर्फ में परिवर्तित हो जाते। स्पष्ट था कि फिर जीवन पनपने का कोई आसार ही नहीं रह जाता।

यहां पर लगता है कि ज़मीन को जीवन क्षेत्र बनाने के लिए पूरी तरंह ‘सुविधायुक्त’ किया गया। और इसी की तरफ आयत और इमाम की हदीस इशारा कर रही है, ‘‘जिस ने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना बनाया’’

Sunday, September 24, 2017

इमाम हज़रत अली(अ.) का साइंसी इल्म - Part 1

इमाम हज़रत अली(अ.) के कलाम नहजुलबलाग़ा के पहले खुत्बे में बयान है कि ‘‘हर सिफत शाहिद है कि वह अपने मौसूफ की ग़ैर है और हर मौसूफ शाहिद है कि वह सिफत के अलावा कोई चीज़ है।’’

यहाँ पर इमाम अली (अ.) यूनिवर्स की बहुत बड़ी हकीक़त को ज़ाहिर कर रहे हैं। सिफत यानि कि गुण (property) और मौसूफ, जिसमें वह गुण पाया जाये। गुस्सा, प्यार, ताकत, कमज़ोरी वगैरा गुण हैं, और इंसान में ये गुण हैं इसलिये वह मौसूफ है। ग्रैविटेशन फोर्स एक गुण है और माद्दा जिसमें ये गुण पाया जाता है मौसूफ है। ऑक़्सीजन मौसूफ है और ‘जलने में मदद देना’ इसकी सिफत यानि गुण है। 

अब यूनिवर्स की हकीक़त ये है कि हर मौसूफ को उसकी सिफत से अलग किया जा सकता है। और ये बात साइंटिफिक एक्सपेरिमेन्ट्स से ज़ाहिर होती है। किसी चुम्बक का चुम्बकीय गुण एक खास टेम्प्रेचर (क्यूरी टेम्प्रेचर) के बाद खत्म हो जाता है। इलेक्ट्रान पर निगेटिव चार्ज होता है। देखा ये गया है कि घूमने (spin) की एक खास कण्डीशन में उसका निगेटिव चार्ज खत्म हो जाता है। हर चीज़ में कुछ ऐसी सिफत होती हैं जिनसे उस चीज़ की पहचान होती है। इसके बावजूद उस चीज़ से वे सिफतें हटाई जा सकती हैं। हालांकि अभी साइंस उस लेवेल तक नहीं पहुंच पायी है। लेकिन हो सकता है आने वाले कल में ऐसी बॉडीज़ बनने लगें जिसमें ग्रैविटेशन का गुण न मौजूद हो। ज़ाहिर है कि इसका रिवर्स भी मुमकिन होना चाहिये। यानि ग्रैविटेशन फोर्स मौजूद होना चाहिये बिना किसी बॉडी की मौजूदगी के। बिना चुम्बक चुम्बकीय गुण मौजूद होना चाहिये। साइंस अभी इसपर रिसर्च कर रही है कि क्या बिना किसी ज़रिये (source) के चुम्बकीय क्षेत्र पैदा किया जा सकता है? या ग्रैविटेशन फोर्स ऐसी जगह मौजूद हो सकता है जहाँ किसी बॉडी का असर न हो? 

कुछ हद तक साइंस को इसमें कामयाबी मिली है। साइंस उन ज़र्रात (particles) को ढूंढने में कामयाबी पा चुकी है जो इलेक्ट्रोमैग्नीटिक फोर्स और न्यूक्लियर फोर्स को पैदा करने के जिम्मेदार हैं। ये ज़र्रात हैं फोटॉन और मेसॉन। और माना जाता है कि ग्रैविटेशन फोर्स की पैदाइश के लिये ग्रैविटॉन नाम के ज़र्रे ज़िम्मेदार हैं। ज़ाहिर है कि चूँकि ये ज़र्रे उन बॉडीज़ से अलग हैं जिनमें ये ताकतें मौजूद होती हैं। इसका मतलब हुआ कि इन ताकतों को उन बाडीज़ से अलग करके पैदा किया जा सकता है। इस तरह इमाम हज़रत अली(अ.) की इमामत का इल्म चौदह सौ साल पहले उन ज़र्रात को देख रहा था जो सिफत की पैदाईश करते हैं।

इस तरह की और जानकारियों के लिये देखें किताब : 
नहजुलबलाग़ा का साइंसी इल्म
लेखक : ज़ीशान हैदर ज़ैदी
प्रकाशक : अब्बास बुक एजेंसी, रुस्तम नगर, दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ - 226003 
मो. : 9415102990, 9369444864

Sunday, July 9, 2017

नहजुल बलाग़ह का साइंसी इल्म

मेरी नई किताब "नहजुल बलाग़ह का साइंसी इल्म" का कवर पेज.


किताब शीघ्र ही आपके सामने होगी। जिसके  प्रकाशक हैं 
अब्बास बुक एजेंसी,
दरगाह हज़रत अब्बास, लखनऊ
Ph : (+91) 9415102990, (+91) 9369444864

Saturday, June 17, 2017

ज़मीन का वायुमण्डल, आसमान का रंग और सूरज की परिधि इमाम हज़रत अली (अ.) ने बताई

 शेख सुद्दूक (अ.र.) की किताब एललुश्शरा में दर्ज हदीस के मुताबिक़ एक मरतबा हज़रत अली इब्ने अबी तालिब अलैहिस्सलाम मस्जिदे कूफा में थे। मजमे से एक मर्द शामी उठा और अर्ज किया या अमीरलमोमिनीन में आपसे चन्द चीजों के मुताल्लिक कछ दरियाफ्त करना चाहता हूं। आपने फरमाया सवाल करना है तो समझने के लिये सवाल करो। महज़ परेशान करने के लिये सवाल न करना। उसके बाद सायल ने सवाल किये उनमें से तीन सवाल इस तरह थे,

उसने सवाल किया कि ये दुनियावी आसमान किस चीज़ से बना? आपने फरमाया आँधी और बेनूर मौजों से। उसने सूरज का तूल व अर्ज (परिधि) के मुताल्लिक पूछा। आपने फरमाया नौ सौ फरसख को नौ सौ फरसख से ज़र्ब दे दो। उसने सातों आसमान के रंग और उनके नाम दरियाफ्त किये। तो आपने फरमाया पहले आसमान का नाम रफीअ है और उसका रंग पानी व धुएं की मानिन्द है।....

अब हम इन सवालो व जवाबों को मौजूदा साइंस की रोशनी में गौर करते हैं।

अगर ज़मीन के आसमान की बात की जाये तो पूछने वाले का मतलब वायुमंडल से था जो ज़मीन के ऊपर हर तरफ मौजूद है। हम जानते हैं कि वायुमंडल में गैसें हैं और साथ में आयनोस्फेयर है जहां पर आयनों की शक्ल में गैसों की लहरें हैं। ये गैसें कभी एक जगह पर तेजी के साथ इकट्ठा होती हैं तो आँधियों की शक्ल में महसूस होती हैं और कभी बिखरती है तो मौसम पुरसुकून होता है। इसके बावजूद फिज़ा कभी इन गैसों से खाली नहीं होती। 

अगर आम आदमी को समझाने के लिये कहा जाये तो ज़मीन की फिज़ा में आँधियां हैं और लहरें या मौजें। चूंकि ये मौजें रोशनी की नहीं है बल्कि मैटर की हैं लिहाज़ा हम इन्हें बेनूर मौजें कह सकते हैं। और यही बात इमाम अली अलैहिस्सलाम के जवाब में आ रही है।  

सवाली का दूसरा सवाल सूरज के तूल व अर्ज़ यानि कि परिधि के मुताल्लिक था। जवाब में हज़रत अली (अ.) ने फर्सख में ये लम्बाई बतायी जो उस वक्त लम्बाई नापने की आम यूनिट थी। फर्सख फासला नापने की फारसी यूनिट होती है। ये उस फासले के बराबर होती है जो एक घोड़ा एक घण्टे में तय करता है। 19 वीं सदी में इसे 6.23 किलोमीटर के बराबर माना गया। जबकि अरब में इसे 4.83 किलोमीटर के बराबर माना गया। 
सूरज की डायमीटर नासा के अनुसार 1391000 किलोमीटर है। इस तरह इसकी परिधि की लम्बाई हुई 4370000 यूनिट्स। 900 को 900 से ज़र्ब देने पर नतीजा आता है 810000 फर्सख। अगर इसे फारसी यूनिट के अनुसार किलोमीटर में बदला जाये तो नतीजा आयेगा 5046300 यूनिट्स। जबकि अरबी यूनिट के अनुसार नतीजा होगा 3912300 यूनिट्स। 

अगर फर्सख को किलोमीटर में बदलने में अलग अलग जगहों के फर्क को नज़र में रखा जाये तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सरूज की परिधि के बारे में जो बताया वह पूरी तरह मौजूदा साइंस की कैलकुलेशन से मैच कर रहा है। 

चाँद का साइज़ बताने में कई दूसरे साइंसदानों जैसे कि आर्यभट वगैरा का भी जिक्र आता है। और ये उतनी हैरत की बात भी नहीं क्योंकि चाँद की तरफ नज़र की जा सकती है और यह ज़मीन के करीब भी है। लेकिन सूरज जिसकी तरफ नज़र टिक ही नहीं सकती, उसके बारे में इतनी सटीक कैलकुलेशन यकीनन इमाम अली अलैहिस्सलाम की इमामत का चमत्कार ही कहा जायेगा।  

तीसरा सवाल आसमान के रंग के मुताल्लिक था। जब हम ज़मीन पर रहते हुए आसमान की तरफ नज़र करते हैं तो यह नीले रंग का दिखाई देता है। जबकि शाम या सुबह के वक्त इसका रंग थोड़ा बदला हुआ लाल या काला मालूम होता है। 
लेकिन जो लोग स्पेसक्राफ्ट के ज़रिये ज़मीन से बाहर जा चुके हैं। उन्हें न तो ये आसमान नीला दिखाई दिया और न ही लाल। इसलिए क्योंकि ये रंग ज़मीन पर इसलिए दिखाई देते हैं क्योंकि ज़मीन का वायुमंडल सूरज की रोशनी में से खास रंग को हर तरफ बिखेर देता है। 
चूकि ज़मीन के बाहर वायुमंडल नहीं है इसलिए वहां ये रंग नहीं दिखाई देते। तो फिर वहां कौन सा रंग दिखाई देगा? ज़ाहिर है कि वहां चारों तरफ ऐसा कालापन दिखाई देगा जिसमें पानी की तरह रंगहीनता (colorlessness) होगी। यही रंग बाहर जाने वाले फिज़ाई मुसाफिरों ने देखी और यही बात इमाम अली अलैहिस्सलाम अपने जवाब में बता रहे हैं कि पहले आसमान का रंग पानी व धुएं की मानिन्द है। 
पानी का रंग नहीं होता और धुएं का रंग काला होता है। दोनों को मिक्स करने पर जो रंग बनता है वही फिज़ाई मुसाफिरों को ज़मीन से बाहर निकलने पर दिखाई देता है।
जो बातें आज साइंसदानों को ज़मीन से बाहर निकलने पर मालूम हुई हैं वह इमाम अली अलैहिस्सलाम चौदह सौ साल पहले मस्जिद में बैठे हुए बता रहे थे। और इस्लाम के सच और इल्म की गवाही दे रहे थे। वह इल्म जो दुनिया के सामने चौदह सौ साल बाद आने वाला था।
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इस तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिये मेरी किताब "51 जदीद साइंसी तहक़ीक़ात जो दरअस्ल इस्लाम की हैं" देखें जो अब्बास बुक एजेंसी लखनऊ ने प्रकाशित  है. 

Friday, June 2, 2017

मोर मोरनी की किवंदती और इमाम हज़रत अली(अ.)

मोर मोरनी की कहानी भी बहुत पुरानी किवंदती है और हज़ारों साल से बड़े बड़े जस्टिस शर्मा जैसे विद्वान भी इसे सच मानते आ रहे हैं। लेकिन आज से चौदह सौ साल पहले ही इस्लाम के धर्माधिकारी इसे गलत बता चुके हैं। आज से चौदह सौ साल पहले का इमाम हज़रत अली(अ.) का मोर के बारे में यह बयान किताब नहजुल बलाग़ा में खुत्बा नंबर 163 में दर्ज है। किताब ‘नहजुल बलाग़ा’ आसानी से हर जगह लगभग हर भाषा में उपलब्ध है।

इमाम अली(अ.) नहजुल बलाग़ा के इस खुत्बे में कहते हैं कि ‘‘मोर भी और मुरगों की तरह जफ्ती खाता है और (अपनी मादा को) गर्भवती करने के लिये जोश व हीजान में भरे हुए नरों की तरह जोड़ खाता है। मैं इस (बयान) के लिये ‘एक्सपेरीमेन्ट’ को तुम्हारे सामने पेश करता हूं। अटकल लगाने वालों की ये सिर्फ अटकल या वहम है कि वह अपने आँख के बहाये हुए उस आँसू से अपनी मादा को अण्डों पर लाता है कि जो उसकी पलकों के दोनों किनारों में आकर ठहर जाता है और मोरनी उसे पी लेती है और फिर वह अण्डे देने लगती है।’’
इस तरह चौदह सौ साल पहले ही इमाम अली(अ.) मोर के बारे में उस ज़माने में फैली गलत मान्यताओं को नकार रहे हैं। गलत मान्यता ये है कि मोर अपनी आँखों में बसे आँसुओं के क़तरे से मोरनी को अण्डे देने के लिये तैयार करता है। जब मोरनी उन आँसुओं को पी लेती है तो अण्डे देने लगती है।

इमाम अली(अ.) फरमाते हैं कि इन बातों में कोई सच्चाई नहीं। हक़ीक़त ये है कि मोर व मोरनी के बीच उसी तरह ताल्लुक क़ायम होता है जिस तरह दूसरे परिन्दों में नर व मादा के बीच, जैसे कि मुर्ग व मुर्गी। 

Tuesday, June 14, 2016

आधुनिक वैज्ञानिक खोजें जो दरअस्ल इस्लाम की हैं

इस किताब में ऐसी आधुनिक साइंसी खोजों को शामिल किया गया है जिनके बारे में पुरानी इस्लामी किताबों में ज़िक्र मौजूद है. मिसाल के तौर पर इसके कुछ लेख इस तरह हैं :
* क्या बिग बैंग थ्योरी गलत है?
* क्या 'ग्रैंड डिजाइन' स्टीफन हॉकिंग ने चोरी की है?
* डी.एन.ए. का कांसेप्ट दिया इस्लाम ने.
* क्या कोशिका की खोज रोबर्ट हुक ने की थी? 
* क्या क्वासर के बारे में इस्लाम कुछ कहता है?
* डार्क मैटर की हकीकत बताता है इस्लाम.
* इमाम अली (अ.) ने पेश की जनरल थ्योरी ऑफ़ रिलेटिविटी.
* इस्लाम ने ही पेश की महाद्वीपों के एक होने की थ्योरी.
इसका ई संस्करण प्रकाशित हो चुका है जिसे आप निम्न फोटो लिंक से डाउनलोड करके स्मार्ट फोन, किंडल या कंप्यूटर पर पढ़ सकते हैं.