Friday, January 22, 2010

अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-21)

उपरोक्त चिंतन से एक साइंटिफिक प्रश्न का भी उत्तर मिल सकता है। यकीनन आइंस्टीन ने द्रव्यमान-ऊर्जा संरक्षण का सिद्धान्त दिया। यानि यूनिवर्स के कुल द्रव्यमान और ऊर्जा का योग नियत है। लेकिन इस नियतांक का मान क्या है? इस बारे में यह सिद्धान्त मौन है। 



उदाहरण के लिए किसी रासायनिक अभिक्रिया में कोई दो पदार्थ लिये गये। जिनमें से एक का द्रव्यमान बीस ग्राम और दूसरे का दस ग्राम लिया गया। रासायनिक अभिक्रिया के बाद भी दो पदार्थ बन रहे हैं। जिनमें से अगर पहले का द्रव्यमान पन्द्रह ग्राम है तो दूसरे का भी पन्द्रह ग्राम होगा। क्योंकि द्रव्यमान संरक्षण के अनुसार अभिक्रिया से पहले का कुल द्रव्यमान अभिक्रिया के बाद के कुल द्रव्यमान के बराबर होगा। यहां पर द्रव्यमान संरक्षण का नियतांक तीस ग्राम है। सवाल उठता है कि अगर हम ब्रह्माण्ड की समस्त ऊर्जा ले लें और समस्त द्रव्यमान। तो इनका कुल योग कितना आयेगा? बहुत से लोग कह सकते हैं कि योग निकालना असंभव है। यह तो तय है कि योग निश्चित है। लेकिन कितना, यह बताना असंभव है।



लेकिन कोई भी मनुष्य इसपर आश्चर्य कर सकता है कि यह योग न केवल निश्चित है बल्कि बताया भी जा सकता है और एक विलक्षण संख्या के बराबर आता है। यह विलक्षण संख्या है शून्य अर्थात ज़ीरो। कैसे? मेरे पास इस परिणाम को लिखने की दलील है जो वैज्ञानिक रूप में भी मिलती है और धर्मग्रंथों से भी।



जैसा कि इससे पहले बिग बैंग सिद्धान्त में बताया गया है कि प्रारम्भ में समस्त द्रव्यमान और ऊर्जा एक बिन्दु में समाहित थी। ज्योमेट्री के अनुसार बिन्दु उसे कहते हैं जो विमाहीन और द्रव्यहीन होता है। उसकी कोई लम्बाई चौड़ाई या ऊंचाई नहीं होती। फिर उस बिन्दु में विस्फोट हुआ और द्रव्यमान ऊर्जा और समय की उत्पत्ति हुई। स्पष्ट है कि द्रव्यमान ऊर्जा संरक्षण नियम उसी समय लागू हो गया था जब बिन्दु में विस्फोट भी नहीं हुआ था। और यह साफ है कि द्रव्यमान ऊर्जा का कुल योग उस समय शून्य था। जाहिर है उपरोक्त नियम के अनुसार वह योग वर्तमान में भी शून्य रहेगा। धर्मग्रन्थ भी यही कहते हैं कि सृष्टि का निर्माण शून्य से हुआ इसलिए द्रव्यमान ऊर्जा का कुल योग सदैव से शून्य रहा है और सदैव शून्य रहेगा।


अल्लाह छिपी हुई बातों को जानता है। वह किसी भी प्राणी के विचारों तक पहुंच जाता है। और मन के छिपे हुए भेदों को जान जाता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह कथन इसलिए युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता क्योंकि यहां ईश्वर का मानवीकरण करके देखा जाता है। फिर जो कमजोरियां मानव और दूसरे प्राणियों में होती हैं वही उसपर भी लागू कर दी जाती हैं। जबकि देखा गया है कि कई मनुष्य अपनी विलक्षण बुद्धि और तजुर्बे के बल पर सामने वाले के दिल का भेद जान लेते हैं। 


लेकिन यहां पर अगर हम अल्लाह का मानवीकरण करके न देखें और उसे एक महाशक्ति मान लें तो शक्ति का एक छोटा सा उदाहरण उपरोक्त कथन के लिए मजबूत दलील का कार्य करेगा।--------continued

1 comment:

Tarkeshwar Giri said...

जनाब सचमुच आपके लेख काफी प्रभाशाली है, और मैं उम्मीद करता हूँ की आप सही तरीके से ही ब्याख्या करते रहेंगे। लेकिन एक चीज और आल्लाह और भगवान या किसी भी धर्म के भगवान एक ही है। उनका वजूद एक ही है। ईश्वर एक है , ईश्वर अनंत है , सब उसके बच्चे है , बस जीने का तरीका सबका अलग अलग है।