Saturday, January 16, 2010

अल्लाह का वजूद - साइंस की दलीलें (पार्ट-17)


खुदा से सम्बंधित विवादास्पद गुण :

विरोधाभासों के स्पष्टीकरण के बाद हम खुदा से सम्बंधित उन गुणों का अध्ययन करते हैं जो विवादास्पद माने जाते हैं। ऐसे गुण जो किसी मनुष्य की अक्ल में नहीं समा पाते और इस वजह से वह यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि ईश्वर वास्तव में है या नहीं? क्योंकि उसे वह गुण तर्कसंगत नहीं मालूम होते।

कुछ इस तरह के तर्कसंगत न प्रतीत होने वाले गुण इस प्रकार हैं :

अल्लाह का कोई आकार या रूप नहीं है। वह निराकार है और किसी को दिखाई नहीं देगा। हालांकि कुछ मान्यताओं के अनुसार वह कयामत के रोज दिखाई देगा। लेकिन यह मान्यता बेबुनियाद है और कुछ धर्मगुरुओं द्वारा फैलायी गयी गलतफहमी का परिणाम है। धर्मग्रंथों से इसका कोई सुबूत नहीं मिलता। कुछ मजहब खुदा को सशरीर मानते हैं। लेकिन यह भी एक गलत मान्यता है।  दरअसल अल्लाह का निराकार होना लोगों की अक्ल में नहीं समाता और उपरोक्त मान्यताएं इसी कन्फ्यूजन का परिणाम हैं।

अल्लाह हमेशा से है और हमेशा रहेगा। यह बात भी अक्सर लोगों के गले नहीं उतरती और वे उस डोर का सिरा तलाश करने में जुट जाते हैं जहां से खुदा की पैदाइश हुई है। जब वे देखते हैं कि उनके आसपास प्रत्येक प्राणी और वस्तु नश्वर है, कभी न कभी मिट जाती है तो वे अल्लाह से सम्बंधित इस गुण के बारे में कन्फ्यूज हो जाते हैं। इसलिए उसकी उत्पत्ति और अंत के बारे में बहुत सी गलत मान्यताएं प्रचलित हो गयीं। कुछ लोग उसकी उत्पत्ति कमल नाल से मानने लगे तो कुछ ने उसका भी वंश चला दिया। जिसमें एक ईश्वर मिटता है तो दूसरा पैदा हो जाता है। कहीं पर ये मान्यता प्रचलित हो गयी कि मनुष्य जैसे प्राणियों को दूसरे प्राणियों ने बनाया और उन प्राणियों को पुन: दूसरे प्राणियों ने बनाया और इस तरह यह क्रम चलता रहता है।

अल्लाह छुपी हुई बातों को जानता है। किसी प्राणी के मस्तिष्क में कौन से विचार उमड़ रहे हैं और कौन से विचार पैदा होने वाले हैं सबसे वह भली भाँती वाकिफ है। ईश्वर का यह गुण भी कुछ समझ में नहीं आता कि इधर मनुष्य के मस्तिष्क में कोई बात आयी और उधर ईश्वर को मालूम हो गयी। यह कुछ तर्कसंगत नहीं मालूम होता।

अल्लाह हर तरह के जज्ब़ात से बेनियाज़ है। उसे न तो जोश आता है, न क्रोध । न वह खुश होता है न नाराज। न उसे किसी से ईर्ष्या होती है और न ही उसे कोई गम सताता है। न सृष्टि के निर्माण में उसने गर्व का अनुभव किया है और न कोई चीज नष्ट होने पर उसे अफसोस होता है। यानि कोई भी भावना उसे उत्तेजित नहीं कर सकती। अल्लाह का भावनाहीन होना भी तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता है। क्योंकि बहुत से धर्मग्रंथों में इस तरह की कहानियां मिलती हैं जब उसने किसी बन्दे से खुश होकर उसे बहुत कुछ प्रदान कर दिया और किसी जाति से अप्रसन्न होकर प्रलय मचा दी और वह पूरी की पूरी जाति नष्ट हो गयी। हज़रत नूह पैगम्बर के वक्त में आया तूफान इसका उदाहरण है। अगर अल्लाह में क्रोध या प्रसन्न होने की भावना नहीं होती तो क्यों वह इस तरह की घटनाओं को घटित करता है? सृष्टि की रचना के पीछे उसका उद्देश्य क्या है? इस प्रकार के बहुत से सवालों के कारण उसका भावनारहित होना अक्ल से परे हो जाता है। 

2 comments:

timeforchange said...

aap sahi disha mein soch rahein hain . aur padhiye aur samhiye , doosre dharmon ke baare mein bhi padhiye , aur logon ko bataiye unki galat fehmiyan door kegiye , hindu aur muslim dharam mein god ka concept ek hi jaisa hai , sayad aapko ye nahi maloom hoga .

zeashan zaidi said...

timeforchange ji,
हिन्दू धर्म और मुस्लिम धर्म में ईश्वर की अवधारणा काफी हद तक मिलती जुलती है. बस हिन्दू धर्म में जो अवतार का कांसेप्ट है, वह मुस्लिम धर्म में नहीं है.