Saturday, January 3, 2026

इमामे मुबीन हज़रत अली (अ) इब्ने अबी तालिब

 13 रजब को इमामे मुबीन हज़रत अली (अ) इब्ने अबी तालिब की विलादत खानए काबा के अन्दर हुई थी.

इमाम हज़रत अली (अ) पैगम्बर मुहम्मद (स) के जानशीन थे जिनके बारे में रसूल ने फ़रमाया “जिसका मैं मौला हूँ उसके अली मौला हैं।“ और ये भी फ़रमाया 'मैं शहर ए इल्म हूँ और अली उसका दरवाज़ा हूँ।
माना जाता है की जीवों में कोशिका (cell) की खोज 17 वीं शताब्दी में लीवेन हुक ने की. लेकिन नहजुल बलागा का निम्न कथन ज़ाहिर करता है कि अली(अ.) कोशिका के बारे में चौदह सौ साल पहले बता चुके थे. ‘‘जिस्म के हर हिस्से में बहुत से अंग होते हैं. जिनकी रचना उपयुक्त और उपयोगी है. सभी को

ज़रूरतें पूरी करने वाले शरीर दिए गए हैं. सभी को काम सौंपे गए हैं और उनको एक छोटी सी उम्र दी गई है. ये अंग पैदा होते हैं और अपनी उम्र पूरी करने के बाद मर जाते हैं. (खुत्बा-81)’’ स्पष्ट है कि ‘अंग’ से अली का मतलब कोशिका ही था.
खुत्बा 81 में ही इमाम अली (अ) ने इंसानी जिस्म के इम्यून सिस्टम (immune system) के बारे में बताया इन अलफ़ाज़ के साथ ‘और सलामती के हिसारों के....’। यहां पर इमाम फरमा रहे हैं कि हमारे जिस्म की सलामती के लिये परवरदिगार ने कुछ हिसार यानि घेरे (protection covers) भी अता किये हैं। दरअसल न सिर्फ इंसानी जिस्म बल्कि दूसरे जानदारों के जिस्म में भी कुछ ऐसे सिस्टम मौजूद होते हैं जो बाहरी हमलों यानि बीमारियों के जरासीमों (बैक्टीरिया, वायरस वगैरा) से जिस्म की हिफाज़त करते हैं। ये जिस्म के लिये खतरनाक जरासीमों की पहचान करते हैं और उनके जिस्म पर असर करने से पहले ही उन्हें खत्म कर देते हैं। हमारे जिस्म पर न जाने कितनी बीमारियों के वायरस या बैक्टीरिया व दूसरे माइक्रोआर्गेनिज़्म हमला करते रहते हैं लेकिन जिस्म का हिफाज़ती सिस्टम उन्हें असरअंदाज़ नहीं होने देता।
दुनिया की नज़र में इम्म्यून सिस्टम की खोज अट्ठारहवीं सदी के आखिर में लुइस पाश्चर ने की.
हज़रत अली सितारों द्वारा भविष्य जानने के खिलाफ थे, लेकिन खगोलशास्त्र सीखने के हामी थे, उनके शब्दों में ‘‘ज्योतिष सीखने से परहेज़ करो, हाँ इतना ज़रूर सीखो कि ज़मीन और समुद्र में रास्ते मालूम कर सको.’’ (77वाँ खुत्बा - नहजुल बलागा)
कुरआन को पैगम्बर मोहम्मद(स.) के बाद सबसे बेहतर समझाने वाले इमाम हज़रत अली(अ.) थे। कुरआन और इस्लाम पर आज भी हर तरफ बहस चल रही है। इमाम हज़रत अली(अ.स.) के सामने अक्सर लोगों ने कुरआन से मुताल्लिक़ एतराज़ात पेश किये और इमाम हज़रत अली(अ.स.) ने उनका जवाब दिया।
एक बार किसी ने सवाल उठाया, ‘(सूरे क़यामत आयत 22-23) उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ और दूसरी जगह वह कहता है, ‘(सूरे इनाम आयत 104) उस को आँखें नहीं देख सकती हैं और वह (लोगों की) निगाहों को देखता है। वह लतीफ खबीर है। तो ये दो बातें विरोधी हैं।
जवाब में हजरत इमाम अली (अ.स.) ने फरमाया कि जिस जगह पर औलिया अल्लाह (अल्लाह के करीबी बन्दे) हिसाब से फारिग होने के बाद अपनी जगह से अपने परवरदिगार की तरफ से देखेंगे कि वह उनको किस तरह का बदला यानि फल देता है और उनमें से कुछ लोग जन्नत में दाखिल हो जायेंगे। इसी बिना पर अल्लाह का कौल है, ‘उस रोज़ बहुत से चेहरे तरोताजा होंगे और अपने परवरदिगार की तरफ देख रहे होंगे।’ यहाँ अल्लाह की तरफ देखने से मतलब ये है कि वह उस के सवाब को देखेंगे।
मगर उस के कौल ‘उस को आँखें नहीं देख सकती हैं’ का मतलब ये है कि इंसानी अक्ल व आँखें उस तक नहीं पहुंच सकतीं। और ‘वह (लोगों की) निगाहों को देखता है।’ का मतलब कि वह उन तक पहुंच सकता है और वह लतीफ खबीर है। और यह एक तारीफ है जिस के जरिये हमारे रब ने अपनी ज़ात की तारीफ फरमाई है। और इन्तिहाई बलन्दी के साथ पाक व पाकीजा हुआ। कोई भी मखलूक अपने इल्म यानि ज्ञान के जरिये अल्लाह की हस्ती तक नहीं पहुंच सकती। क्योंकि उस अल्लाह की बुलन्द ज़ात ने लोगों के दिलों पर परदा डाल दिया है। न कोई अक्ल व दिमाग उस की कैफियत से वाकिफ हो सकता है और न कोई दिल उसकी हदों या सीमाओं से वाकिफ हो सकता है। फिर न कोई उसका गुण बयान कर सकता है जिस तरह कि उस ने अपने गुणों को बयान किया है। उस जैसी कोई शय नहीं है। वह समीअ-बसीर है वही अव्वल व आखिर है। वही जाहिर व बातिन है। वह ख़ालिक़ है। उस ने चीजों को खल्क किया। चीज़ों में से कोई चीज उस की तरह नहीं है। उस की ज़ात बाबरकत और बुलन्द व बाला है।
उस ज़माने के जाहिलों ने कभी इल्म के इस दरिया को चैन की सांस नहीं लेने दी और आखिर में उस वक़्त ज़हर बुझी तलवार से शहीद कर दिया जब वो मस्जिद में सुबह की नमाज़ अदा कर रहे थे।

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