Saturday, April 19, 2014

कौन है इस्लाम का सर्वोच्च अधिकारी? (भाग 8)

दीने इस्लाम की यह बुनियादी मान्यता है कि ज़मीन पर हमेशा अल्लाह का एक बंदा मौजूद होता है। जो धर्म का सर्वोच्च अधिकारी होता है। दुनिया की ज़रूरत के एतबार से वह धर्म व ज्ञान की बातों को सामने लाता है। वह अपने दौर का सबसे बड़ा ज्ञानी होता है। और ज़रूरत पड़ने पर वह उस ज्ञान को ज़ाहिर करता है। 

आठवीं सदी ई. के शुरूआती दौर में दुनिया प्राचीन ज्ञान को भूल चुकी थी और साथ ही उसे नये ज्ञान की ज़रूरत भी महसूस हो रही थी क्योंकि इल्म की कमी ने दुनिया की तरक्की रोक दी थी।

इमाम मोहम्मद बाक़िर(अ.) ने इस ज़रूरत को समझा और मदीने में स्कूल कायम किया जिसकी शुरूआत मस्जिदे नबवी से हुई। लेकिन उनकी शहादत ने इस मिशन को अधूरा छोड़ दिया। उनके बाद इस मिशन को मुकम्मल किया इस्लाम के अगले धर्माधिकारी इमाम जाफर सादिक़(अ.) ने। और इस अंदाज़ में मुकम्मल किया कि आज तमाम दुनिया की साइंसी तरक्की की जड़ें उनके तालीमी मरकज़ की तरफ पहुंचती हैं। 

आज भी साइंस की कोई भी ऐसी शाखा नहीं जिसकी शुरूआत इमाम जाफर सादिक़(अ.) ने नहीं की है। इमाम मोहम्मद बाक़िर(अ.) का क़ायमकर्दा स्कूल इमाम जाफर सादिक़(अ.) के ज़माने में यूनिवर्सिटी की शक्ल में तब्दील हो चुका था। और इस यूनिवर्सिटी में पूरी दुनिया के लगभग चार हज़ार तालिबइल्मों ने इमाम के इल्म से फैज़ हासिल किया।

सच कहा जाये तो इस्लाम के गोल्डेन पीरियड में जो भी साइंसी तरक्की हुई और उसके बाद यूरोप अपनी डार्क एज से उबरकर साइंस की रोशनी में आया उसकी बुनियाद रखी थी इमाम मोहम्मद बाक़िर(अ.) और इमाम जाफर सादिक़(अ.) ने।   

इमाम जाफर सादिक़(अ.) ने कई पुरानी मान्यताओं को रद् करते हुए सही साइंसी थ्योरीज़ दुनिया के सामने पेश कीं। उन्होंने अरस्तू के चार मूल तत्वों की थ्योरी को गलत सिद्ध किया और कहा कि मुझे हैरत है कि अरस्तू ने कहा दुनिया में सिर्फ चार तत्व हैं, मिट्टी, पानी, आग और हवा। मिट्टी तत्व नहीं है बल्कि इसमें बहुत सारे तत्व हैं। मिट्टी में पाई जाने वाली हर धातु एक तत्व है। इसी तरह इमाम ने पानी, आग और हवा को भी तत्व नहीं माना। हवा को भी तत्वों का मिक्सचर कहा और बताया इनमें से हर तत्व साँस लेने के लिए जरूरी है।

अठारहवीं सदी में लैवोजिए ने आक्सीजन की खोज की। तब उपरोक्त थ्योरी सही साबित हुई। उन्नीसवीं सदी के वैज्ञानिकों ने पाया कि प्योर आक्सीजन जीवों को फायदे की बजाय नुकसान पहुंचाती है। इस तरह इमाम जाफर सादिक(अ.) की थ्योरी पूरी तरह सच साबित हो गयी।

यह अकाट्य सत्य है कि आधुनिक केमिस्ट्री का फादर कहा जाने वाला साइंटिस्ट जाबिर इब्ने हय्यान उर्फ गेबर इमाम जाफर सादिक(अ.) का शिष्य था। यह बात उसने खुद अपनी किताबों में ज़ाहिर की है। सल्फ्यूरिक एसिड, हाइड्रोक्लोरिक एसिड, नाइट्रिक एसिड और एक्वा रिजिया जैसे अहम केमिकल की ईजाद की थी जाबिर इब्ने हय्यान ने। उसने ऐसे कागज़ की ईजाद की थी जो आग में नहीं जलता था साथ ही ऐसी स्याही की ईजाद की जिसका लिखा रात में भी पढ़ा जा सकता था।

इमाम के कुछ और मशहूर शागिर्दों में शामिल हैं, इसहाक़ इब्ने अम्मार, अबू हमज़ा शुमाली, मालिक इब्ने अनस, सूफियान शूरी, हातिम बिन इस्माईल, इब्राहीम बिन मोहम्मद, हश्शाम बिन हकम, मफज़्ज़ल बिन अम्र और इमाम बिन अबू हनीफा वगैरा। 

मेडिकल साइंस में इमाम जाफर सादिक ने बताया कि मिट्टी में पाये जाने वाले सभी तत्व इंसान के जिस्म में भी होते है। इनमें चार तत्व अधिक मात्रा में होते हैं, आठ कम मात्रा में तथा आठ अन्य सूक्ष्म मात्रा में होते हैं। आधुनिक मेडिकल साइंस खोज कर चुकी है कि चार तत्व आक्सीजन, कार्बन, हाइड्रोजन तथा नाइट्रोजन मानव शरीर में अधिक मात्रा में होते हैं तथा मैग्नीशियम, सोडियम, पोटैशियम, कैल्शियम, फास्फोरस, सल्फर, आइरन और क्लोरीन कम मात्रा में होते हैं। शरीर में सूक्ष्म मात्रा में पाये जाने वाले तत्व हैं मालिब्डेनम, कोबाल्ट, मैंग्नीज, कापर, जिन्क, फ्लोरीन, सिलिकन और आयोडीन।

इमाम जाफर अल सादिक(अ.स.) जिस्म की बनावट के बारे में निहायत बारीक बातें बतायीं। तौहीद मुफज़्ज़ल में कानों के बारे में इमाम फरमाते हैं, 
‘अगर हवा न हो जो आवाज़ को कानों तक पहुंचाती है तो कान कभी आवाज़ का अदराक नहीं कर सकते।’ 
ये वह तथ्य है जिसकी खोज का श्रेय सत्रहवीं सदी के जर्मन साइंटिस्ट ओटो वान को दिया जाता है। 

इसी किताब में इमाम जाफर अल सादिक (अ.स.) आगे कहते हैं, ‘कान का भीतरी हिस्सा कैदखाने की तरह क्यों टेढ़ा मेढ़ा बनाया गया है? इसीलिये न कि उसमें आवाज़ जारी हो सके और उस पर्दे तक पहुंच जाये जिससे आवाज़ सुनाई देती है और इसलिए कि हवा की तेज़ी का ज़ोर टूट जाये ताकि सुनने के पर्दे में खराश न डाले।’ यानि कानों की भीतरी बनावट टेढ़ी मेढ़ी होने के पीछे खास राज़ है, वह यह कि हवा का दबाव कान के पर्दे पर न पड़े और खालिस आवाज़ ही कान के पर्दे तक पहुंचे क्योंकि यह पर्दा बहुत नाज़ुक होता है और हवा का सीधा असर इसको चोट पहुंचा सकता है।

इमाम(अ.) की तौहीद मुफज़्ज़ल यूनिवर्स की इण्टेलिजेंट डिज़ाईन की बात करती है और तमाम दलीलों के ज़रिये साबित करती है कि सब कुछ सिस्टेमैटिक है और इसलिए इसे बनाने वाली एक सुपरपावर मौजूद है।   

इमाम जाफर सादिक ने प्रकाश के बारे में सिद्धान्त दिया कि जब प्रकाश किसी वस्तु से परावर्तित होकर आँख तक पहुँचता है तो वह वस्तु दिखाई देती है। लेकिन उस प्रकाश का एक छोटा भाग ही आँख तक पहुंचता है। इसलिए दूर की वस्तुएं साफ नहीं दिखाई देतीं। अगर दूर की वस्तुओं से आने वाले प्रकाश की मात्रा बढ़ जाये तो वह साफ और पास दिखेंगी। यह थ्योरी इमाम के शिष्यों से होती हुई यूरोप पहुंची और इसका प्रयोग कर फ्लैंडर्स के लिटरसे ने पहली दूरबीन बनाई। जिसका उपयोग करते हुए गैलीलियो ने अपना टेलिस्कोप बनाया और अनेकों महत्वपूर्ण खोजें कीं। 

इमाम जाफर सादिक ने अपने एक लेक्चर में बताया कि शक्तिशाली प्रकाश भारी वस्तुओं को भी हिला सकता है। यह बयान शायद लेसर किरणों की बुनियाद था।

इमाम जाफर सादिक का एक अन्य चमत्कारिक सिद्धान्त है कि प्रत्येक पदार्थ का एक विपरीत पदार्थ भी ब्रह्माण्ड में मौजूद है। यह आज की मैटर-एण्टीमैटर थ्योरी की झलक थी जहाँ आज की साइंस भी पूरी तरह नहीं पहुंच पायी है।

इमाम जाफर सादिक ने अरस्तू की इस थ्योरी का खंडन किया कि पृथ्वी रूकी हुई है और सूर्य इसके चारों तरफ चक्कर लगाता है। कापरनिकस और केपलर से बहुत पहले इमाम ने बता दिया था कि दरअसल सूर्य के चारों तरफ पृथ्वी और दूसरे ग्रह चक्कर लगाते हैं। ( कापरनिकस का जन्म 15 वीं सदी में हुआ था।) इसी के साथ इमाम ने ये भी बताया कि पृथ्वी अपने अक्ष के परितः भी चक्कर लगाती है जिससे दिन और रात होते हैं। वास्तव में इस यूनिवर्स में कुछ भी स्थिर नहीं है। सब कुछ गतिमान है। ( इसके 1200 वर्षों बाद आइन्सटीन ने सापेक्षता का सिद्धान्त दिया।) 

यूनिवर्स की उत्पत्ति के बारे में इमाम जाफर सादिक ने बताया कि यूनिवर्स एक ऐसे बिन्दु से उत्पन्न हुआ है जिसके दो विपरीत ध्रुव थे। इस बिन्दु ने गुणित होते हुए परमाणुओं की रचना की। फिर ये परमाणु विस्तारित होकर पूरे यूनिवर्स को अस्तित्व में लाये। यूनिवर्स के बारे में एक अन्य रोचक थ्योरी (जहाँ तक अभी साइंस नहीं पहुंच पायी है।) इमाम जाफर सादिक ने दी कि यूनिवर्स हमेशा एक जैसी अवस्था में नहीं होता है। एक समयान्तराल में यह फैलता है और दूसरे समयान्तराल में यह सिकुड़ता है। वर्तमान में यह फैलने की स्थिति में है। इस बात का सत्यापन खगोलशास्त्रियों द्वारा 1960 में किया गया जब उन्होंने शक्तिशाली टेलीस्कोपों द्वारा आकाशगंगाओं के बीच की दूरी को बढ़ते हुए देखा।

एक और जगह इमाम जाफर सादिक(अ.) फरमाते हैं, ‘...ये जहान जिसमें हम जिंदगी बसर करते हैं, के अलावा और भी जहान हैं जिनमें से अक्सर इस जहान से बड़े हैं और उन जहानों में ऐसे इल्म हैं जो इस जहान के इल्म से शायद मुख्तलिफ हैं।’ इमाम जाफर सादिक (अ.स.) से पूछा गया कि दूसरे जहानों की तादाद क्या है? तो आपने जवाब दिया कि खुदा के अलावा कोई भी दूसरे जहानों की तादाद से वाकिफ नहीं। आप (अ.स.) से पूछा गया कि दूसरे जहानों के ज्ञान और इस जहान के ज्ञान में क्या फर्क है? क्या वहां का ज्ञान सीखा जा सकता है? 

इमाम जाफर सादिक (अ.स.) ने फरमाया दूसरे जहानों में दो किस्म के इल्म हैं। जिनमें से एक किस्म के इल्म इस जहान के इल्म से मिलते जुलते हैं और अगर कोई इस जहान से उन जहानों में जाये तो उस इल्म को सीख सकता है। लेकिन शायद यानि दूसरे जहानों में ऐसे इल्म पाये जायें कि इस दुनिया के लोग उन्हें वरक करने पर कादिर न हों क्योंकि उन उलूम को इस दुनिया के लोगों की अक्ल नहीं समझ सकती।’

देखा जाये तो दुनिया के इल्म (ज्ञान) वही हैं जिनको आज साइंस कुदरत या फिजिक्स के कानून कहकर पुकारती है और इनसान जब इन कानूनों की खोज करता है तो वही उसके ज्ञान में बढ़ोत्तरी होती है। अब यहां इमाम जाफर सादिक (अ.स.) कह रहे हैं कि अलग अलग ब्रह्माण्डों में कुछ कुदरत के कानून एक दूसरे से मिलते जुलते हैं और बहुत से पूरी तरह अलग होते हैं जिनका ज्ञान हमारी अक्ल से बाहर है।

मौजूदा दौर के महान साइंटिस्ट स्टीफन हाकिंग की किताब ‘द ग्रैण्ड डिज़ाईन’ में भी कुछ इसी तरह की थ्योरी पेश की गयी है।

एक मुलाकाती से बात करते हुए इमाम ने कहा, ‘‘तुम्हारा शरीर बहुत छोटी छोटी रचनाओं से मिलकर बना है। ये संरचनाएं इतनी ज्यादा हैं जितना किसी रेगिस्तान में रेत के कण होते है। ये रचनाएं जिस्म में पैदा होती हैं, अपनी संख्या बढ़ाती हैं और फिर मर जाती हैं। यह साफ इशारा कोशिकाओं की तरफ था। जबकि उस समय तक सूक्ष्मदर्शी का कहीं अता पता न था जिससे देखकर बहुत बाद में लीवेन हुक ने कोशिकाओं की जानकारी दी।

इसके बाद कहा, ‘‘जो पत्थर तुम सामने गतिहीन देख रहे हो, उसके अन्दर बहुत तेज गतियाँ हो रही हैं।’’ यह इशारा था अणुओं और परमाणुओं की गति की ओर। उसके बाद कहा ‘ये पत्थर बहुत पहले द्रव अवस्था में था। आज भी अगर इस पत्थर को बहुत आधिक गर्म किया जाये तो यह द्रव अवस्था में आ जायेगा।’

इमाम जाफर सादिक ने माओं को सलाह दी कि उन्हें अपने नवजात शिशुओं को बायीं ओर सुलाना चाहिए। इस सलाह को आज की साइंस पूरी तरह सही मानती है क्योंकि शिशु माँ के गर्भ में दिल की धड़कन सुनने का अभ्यस्त होता है और जब उसे यह धड़कन नहीं सुनाई देती तो वह बेचैन हो जाता है। बायीं तरफ शिशु को सुलाने से यह समस्या नहीं पैदा होती।

इस तरह इमाम जाफर सादिक(अ.) ने अनेकों ऐसी खोजें कीं जो तेरह सौ सालों बाद आज की साइंस शत प्रतिशत सही बता रही है। अभी तक इमाम(अ.) का कोई ऐसा कथन सामने नहीं आया है जिसे साइंस ने झुठला दिया हो।

यह विडम्बना रही कि दुनिया ने इमाम जाफर सादिक(अ.) की खोजों को हमेशा दबाने की कोशिश की। इसके पीछे उस दौर के अरबी शासकों का काफी हाथ रहा, जो अपनी ईष्र्यालू प्रकृति के कारण इमाम(अ.) की खोजों को दुनिया से छुपाने की कोशिश करते रहे। इसके पीछे उनका डर भी एक कारण था। इमाम(अ.) की लोकप्रियता में उन्हें हमेशा अपना सिंहासन डोलता हुआ महसूस होता था।

इन्हीं सब कारणों से अरबी शासक मन्सूर ने 765 ई. में इन्हें जहर देकर शहीद कर दिया और दुनिया को अपने ज्ञान से रोशन करने वाला यह सितारा हमेशा के लिए धरती से दूर हो गया।

Sources :
1. Superman in Islam (Urdu)
2. Tauheed Mufazzal
3. Wikipedia article on Jabir Ibn Hayyan