Tuesday, March 3, 2015

कौन है इस्लाम का सर्वोच्च अधिकारी? (भाग 12)

इमाम मोहम्मद तक़ी(अ.) को उस ज़माने के ज़ालिम बादशाह ने सिर्फ पच्चीस साल की उम्र में शहीद कर दिया था। लेकिन अल्लाह का वादा कि ज़मीन कभी भी धर्म के सर्वोच्च अधिकारी से खाली नहीं रहेगी, उस वक्त भी पूरा हुआ। और इमाम(अ.) की शहादत से पहले नये धर्माधिकारी का जन्म हो चुका था।

इस्लाम के नये धर्माधिकारी थे इमाम अली नक़ी(अ.) जो इमाम मोहम्मद तक़ी(अ.) के बेटे थे। जब इमाम मोहम्मद तक़ी(अ.) की शहादत हुई उस वक्त इमाम अली नक़ी(अ.) की उम्र मात्र सात-आठ साल थी। उस वक्त जो लोग आले मोहम्मद से उनके ज्ञान व लोकप्रियता के कारण दुश्मनी रखते थे उन्होंने तय किया कि इस बच्चे के लिये कोई ऐसा उस्ताद रख दिया जाये जो उन्हें धर्म के सच्चे ज्ञान से अलग झूठे अकीदों को पढ़ाये और साथ ही इस्लाम के सच्चे मानने वालों से उन्हें दूर रखे। इस काम के लिये जुनैद नामक एक उस्ताद को उन लोगों ने नियुक्त कर दिया।
फिर कुछ महीनों के बाद जब उन लोगों ने जुनैद से इमाम अली नक़ी(अ.) का हाल चाल लिया तो जुनैद ने मुंह बनाकर कहा कि यह बच्चा खुद ही मेरा उस्ताद बन चुका है। इसे कुरआन व इस्लाम का ऐसा ज्ञान है जो इस दुनिया में किसी को नहीं।    

इमाम अली नक़ी(अ.) के ज़माने में बादशाहत अपने पूरे आतंकी रूप में आ चुकी थी। उस वक्त मुत्वक्किल की ‘खिलाफत’ थी और वह अत्याचार के मामले में किसी भी हाल में आज की आई.एस. या बोको हराम की ‘खिलाफत’ से कम नहीं थी। मुत्वक्किल ने अपनी हुकूमत में काला लिबास ड्रेस कोड के रूप में लागू कर दिया था और सिर्फ इसलिए लोगों को क़त्ल करा देता था कि वे ये ड्रेस नहीं पहनते थे।

मशहूर शायर व अदीब इब्ने सुकैत मुत्वक्किल के बेटों का उस्ताद था। मुतवक्किल ने उससे पूछा कि तुम्हें मेरे बेटे ज़्यादा प्यारे हैं या हसन(अ.) व हुसैन(अ.)? इब्ने सुकैत ने जवाब दिया कि मुझे तेरे बेटों के मुकाबले में हसन(अ.) व हुसैन(अ.) के गुलाम ज़्यादा प्यारे हैं। नाराज़ होकर मुत्वक्किल ने इब्ने सुकैत की ज़बान गुद्दी से खिंचवाने का हुक्म दे दिया और इस तरह अरब के नामवर, दिलेर व बेबाक शायर की मौत हुई।

इस तरह का मुश्किल दौर था इस्लाम के नये धर्माधिकारी इमाम अली नक़ी(अ.) का दौर, जब इंसाफ व सच कहने का मतलब था अपनी जान गंवाना या थर्रा देने वाले अत्याचारों को सहना। लेकिन इस मुश्किल दौर में भी इमाम(अ.) इस्लाम की सच्चाई का पैगाम ज़माने को देने के अपने मिशन पर कायम रहे।

अपनी तमाम सख्तियों के बावजूद मुत्वक्किल को ये डर सताता रहता था कि कहीं इमाम अली नक़ी(अ.) लोगों के साथ मिलकर बगावत न कर दें और उसका तख्ता न पलट जाये। लिहाज़ा उसने इमाम(अ.) को मदीने से सामरा बुला लिया और फिर इमाम(अ.) दोबारा कभी अपने वतन मदीने न जा सके। और आखिरकार मुअतनर अब्बासी के हुक्म से दिये गये ज़हर द्वारा आपकी शहादत हुई।

इस्लाम का सच्चा धर्माधिकारी नामुमकिन को मुमकिन करके दिखाता है और उसे आने वाले हालात का ज्ञान होता है। मुत्वक्किल ने इमाम(अ.) को मदीने से सामरा बुलाने के लिये यहिया नामक सरदार को तीन सौ सिपाहियों के साथ मदीने भेजा। यहिया के लश्कर में एक कातिब भी था जो इमाम(अ.) का चाहने वाला था। चलते हुए वे एक सुनजान जगह पहुंचे जहाँ दूर दूर तक किसी आबादी का नामोनिशान न था। फौज में मौजूद एक अफसर उस कातिब के साथ बहस करते हुए कहने लगा कि तुम्हारे इमाम अली(अ.) का कहना है कि दुनिया में कोई ऐसी जगह नहीं होगी जिस में कब्र न हो या बाद में क़ब्र न बन जाये। तो बताओ कि इस सुनसान जगह में किसकी कब्र होगी। तुम्हारे इमाम यूं ही कह दिया करते हैं। फिर वहां मौजूद सभी लोग उस कातिब का मज़ाक उड़ाने लगे और वह शर्मिन्दा हो गया। फिर लश्कर आगे बढ़ा और जल्दी ही मदीने में दाखिल हो गया। जब इमाम अली नक़ी(अ.) को मुत्वक्किल के बुलावे का पैगाम मिला तो इमाम ने रवानगी के लिये दो तीन दिन की मोहलत माँगी। जब मोहलत मिल गयी तो इमाम ने दर्ज़ी को बुलाया और उससे गर्म कपड़े और टोपियां सिलने को कहीं। ये सुनकर वहाँ मौजूद लश्कर के लोग हैरत में पड़ गये कि इस सख्त गर्मी के मौसम में इमाम(अ.) गर्म कपड़े सिलवा रहे हैं। 

फिर इमाम(अ.) को लेकर ये काफिला सामरा के लिये रवाना हुआ। और जब ठीक उसी सुनसान जगह पहुंचा तो एकाएक मौसम बदल गया। और वहां बिजली की कड़क के साथ ऐसी बारिश होने लगी कि लोगों ने कभी नहीं देखी थी। साथ ही कड़ाके की ठंड पड़ने लगी। इमाम ने अपने साथ लाये हुए गर्म कपड़े पहने और बरसातियों से अपने व अपने सहाबियों के जिस्म ढांक दिये। जब मौसम साफ हुआ तो लोगों ने देखा कि लश्कर के अस्सी लोग इस तूफान की चपेट में आकर मर चुके थे। अब इमाम(अ.) ने यहिया से फरमाया कि खुदा इसी तरह ज़मीन के हर टुकड़े को मुरदों से भरता है। ये सुनकर यहिया अपने घोड़े से उतरा और इमाम(अ.) के हाथों पर बोसा लेकर बोला कि मैं आज से इमामत पर ईमान लाता हूं।

ये काफिला इमाम(अ.) को लेकर जब सामरा पहुंचा तो मुत्वक्किल ने ऐसी जगह इमाम को ठहराने का हुक्म दिया जहाँ शरीफ लोग नहीं टिकते थे। वह फकीरों के बैठने की जगह थी और निहायत गंदी थी। इमाम(अ.) के एक चाहने वाले ने जब इमाम(अ.) को इस हालत में देखा तो गमगीन हो गया। इमाम(अ.) ने उसे तसल्ली देते हुए फरमाया कि ग़म न करो। खुदा ने हमें जो दरजा दिया है उसे कोई नहीं छीन सकता। ये कहते हुए इमाम(अ.) ने उंगली का इशारा किया तो चाहने वाले की नज़र में बेहतरीन बाग़, सब्ज़ा व नहरें नज़र आने लगीं। ये देखकर उसे इत्मिनान हुआ।             

एक सच्चे धर्माधिकारी की एक पहचान ये होती है कि वह दुनिया में बोली जाने वाली तमाम ज़बानों को जानता है। इमाम अली नक़ी(अ.) के बारे में एक वाकिया ये है कि एक दिन उनके सहाबी अबू हाशिम जब उनसे मिलने आये तो इमाम (अ.) उनसे हिंदी ज़बान में बातें करने लगे। जब अबू हाशिम समझ न सके तो इमाम(अ.) ने पास में पड़ी एक कंकरी उठायी और अपने मुंह में रख ली। फिर वह कंकरी इमाम(अ.) ने अबू हाशिम को देकर उसे चूसने के लिया कहा। जैसे ही अबू हाशिम ने वह कंकरी चूसी वह तिहत्तर ज़बानों के आलिम बन गये जिनमें हिंदी भी शामिल थी।

इस्लाम का सच्चा धर्माधिकारी किसी भी तरह के हालात को बदलने की योग्यता रखता है। और हर मुश्किल को आसान कर सकता है। यूनुस नाम का नगीना तराश सामरा में इमाम(अ.) का पड़ोसी था और बराबर इमाम(अ.) की खिदमत में हाज़िरी दिया करता था। एक बार वह डरता काँपता हुआ आया और बताने लगा कि बादशाह के एक वज़ीर ने मुझे एक क़ीमती नग तराशने के लिये दिया था। वह तराशते वक्त दो टुकड़े हो गया। अब मुझे क़त्ल होने से कोई नहीं बचा सकता। इमाम(अ.) ने मुस्कुराते हुए कहा, जाओ तुम्हें कुछ नहीं होगा। अल्लाह सब ठीक कर देगा।

फिर दूसरे दिन यूनुस फिर आया। अब उसके चेहरे से खुशी छलक रही थी। इमाम(अ.) के पूछने पर उसने माजरा बताया कि वह वज़ीर के बुलाने पर वह जब गया तो वज़ीर ने कहा कि मेरी दो बच्चियां उस नग के लिये आपस में जिद कर रही हैं। क्या तुम उस नग को दो कर सकते हो? हम तुम्हें उसका भरपूर ईनाम देंगे।
इमाम(अ.) ने पूछा कि फिर तुमने क्या जवाब दिया? तो यूनुस ने कहा कि मैंने उससे कहा कि मुझे थोड़ी मोहलत दो ताकि मैं गौर कर सकूं कि इस काम को कैसे करना है। इमाम(अ.) ने फरमाया कि तुमने अच्छा जवाब दिया।

इमाम अली नक़ी(अ.) के कुछ कीमती कौल इस तरह हैं,
ईमान वह है जिसे दिल कुबूल कर ले और आमाल उसकी तस्दीक़ करें।
जो खुदपसन्द (अपने को पसंद करने वाला) होगा उससे ज़्यादा लोग नाराज़ रहेंगे।
बेहूदा बातें बेवकूफों की तफरीह और नादानों का काम है।
जिसने अपनी शख्सियत को ज़लील व रुस्वा किया तुम उसके शर से मुतमईन न रहो। 
अगर कोई साहिबे हक़ बेवकूफी की हरकतें करने लगे तो उसकी हरकतों के कारण उसके हक़ का नूर खामोश हो सकता है।

इमाम अली नक़ी(अ.) अपनी शहादत से पहले अपने बाद के धर्म के सर्वोच्च अधिकारियों की खबर दे चुके थे। सहाबी अबुल क़ासिम को अपने बाद के इमामों की खबर देते हुए इमाम अली नक़ी(अ.) ने फरमाया, मेरे बाद मेरे बेटे ‘हसन’ इमाम होंगे और उनके बाद उनके बेटे। वह दिखाई नहीं देंगे। उनका नाम लेने की इजाज़त नहीं है जब तक कि वह सामने न आ जायें। वह ज़मीन को अद्ल व इंसाफ से उसी तरह भर देंगे जैसे कि वह ज़ुल्म व जोर (अत्याचारों) से भर चुकी होगी।

2 comments:

Sadiq said...

bahot khoob, jazakallah

Zeashan Zaidi said...

Shukriya Sadiq Sahab